लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

वर्तमान भूमण्डलीकरण के युग ने जहाँ स्थान और समय की दूरी को कम कर दिया है, वहीं महाद्वीपों, देशों और प्रान्तों के अवरोधों को दूर करने में भी काफी सफलता अर्जित की है। यद्यपि यह नाम कुछ ऐसा आभास देता है, मानो इसमें समस्त मानवता का हित समाहित हो, परन्तु वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। इससे पूर्व का युग सामन्तवादी मनोवृत्ति का था, जिसमें बाहुबल से आधिपत्य स्थापित किये जाने में गौरव की अनुभूति होती थी, लेकिन वर्तमान युग पूँजीवादी है, जिसमें दूर बैठे पूँजी के माध्यम से सुदूर स्थित साम्राज्यों को अपने इशारे पर नाचने के लिये विवश किया जाता है। पहले में जहाँ आत्मोत्सर्ग की आवश्यकता होती थी, वहीं दूसरे में बिना किसी उत्सर्ग के केवल पूँजी के बल पर सब कुछ अपने नियन्त्रण में किया जा सकता है। इसलिये आज की स्थिति में मनुष्य का जीवन अधिक संकटपूर्ण बन गया है। परतन्त्र न दिखायी देते हुए भी वास्तव में मनुष्य अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं कर सकता। संभवतः, सभ्यता के इतिहास में शिक्षित मानव इससे पहले कभी इतना पराधीन और विवश नहीं था। इसके मूल में केवल एक कारण है कि आज के शिक्षित मनुष्य को केवल यही सिखाया जा रहा है कि उसे किस प्रकार अपना हित साधना है? यद्यपि स्वार्थ की यह प्रवृत्ति पहले भी विद्यमान थी और कालिदास ने इस तथ्य को अभिज्ञानशाकुंतलम में स्वीकार भी किया है-
परातिसंधानमधीयते यैर्विद्येति ते सन्तु किलाप्तवाचः।
– अभिज्ञानशाकुंतलम 5.25
लोग दूसरों को प्रताड़ित करने के लिये विद्या पढ़ते हैं, लेकिन आज यह प्रवृत्ति कुछ अधिक उग्र रूप धारण करके समस्त मानवता यहाँ तक कि अखिल जड़-चेतन जगत् को आत्मसात् करने को समुद्यत है।

यह परम सत्य है कि मनुष्य की समस्त समस्याओं का समाधान शिक्षा के माध्यम से किया जा सकता है। ज्ञान अर्थात शिक्षा एक ऐसा मार्ग है, जो हमें सत्यासत्य के साथ-साथ हित-अहित के निर्णय करने की कसौटी भी प्रदान करता है। बृहदारण्यकोपनिषद के अनुसार यह ज्ञान ही हमें असत् से सत् की ओर, तमस् से ज्योति की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाला है-
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमयेति।
– बृहदारण्यकोपनिषद 1.3.28
यजुर्वेद में भी कहा है-
विद्ययामृतमश्नुते।- यजुर्वेद,40.14.
अथर्ववेद 3.30.5 के अनुसार यही महान् बनने की आधारशिला है, और अथर्ववेद 7.100.1 के अनुसार यही मनुष्य की विपत्तियों से रक्षा करने की ढाल है। अथर्ववेद में ही इसे कल्याण करने वाला और संसार का स्थायित्व प्रदान करने वाला कहा गया है –
वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा।
– अथर्ववेद 20.137.5
अर्थात- और यही कल्याण करता हुआ आगे-आगे चलता है। समस्त संसार का स्वामित्व प्रदान करने वाला, यदि कोई है, तो वह ज्ञान है।
इसी प्रकार अथर्ववेद में ही बुद्धि के दो कोष बतलाये गये हैं –
गुहा निधी निहितौ ब्राह्मणस्य।- अथर्ववेद 11.5.10
अर्थात- द्युलोक और पृथिवीलोक उस बुद्धि के दो कोष हैं।
इनके सदुपयोग पर ही मनुष्य की समस्त समस्याओं का समाधान निर्भर है।

ध्यातव्य है कि यह जिसमें जितनी अधिक शक्ति निहित होती है, वह उतना भयावह भी होता है। ज्ञान का उपयोग, जहाँ प्राणिमात्र का कल्याण कर सकता है, वहीं वह इस सृष्टि का विनाश करने में भी सक्षम है। यही कारण है कि वर्तमान भौतिकवादी शिक्षा की कोख से जन्मा विज्ञान विनाश का पर्यायवाची सिद्ध हो रहा है। इसलिये ज्ञान या शिक्षा का स्वरूप और उसकी आधारभूमि ऐसी होनी चाहिये, जिसमें से कल्याण के अंकुर फूट सकें। आज की शिक्षा व्यवस्था और उससे उद्भूत होने वाला विज्ञान परिणाम की दृष्टि से मंगलकारी है, यह बात उसकी स्थापना करने वाले विशेषज्ञ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं । सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह स्वार्थी बनकर नहीं चल सकता। ऐसा करने में जहाँ अन्य प्राणियों का जीवन संकट में पड़ सकता है, वहाँ स्वयं उसका अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं है। इसलिये शिक्षा के स्वरूप की विवेचना प्रासंगिक जान पड़ता है, क्योंकि शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ मनुष्य की समस्यायें भी बढ़ती चली जा रही हैं। जो शिक्षा समस्याओं के शमन के लिये थी, आखिर ऐसा क्या हो गया कि वह समस्याओं की जनक सिद्ध होने लगीं ?

वेद में वाक् देवी सरस्वती के विषय में कहा गया है कि वह समस्त यज्ञों को धारण करने वाली है।
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्। यज्ञं द॑धे सरस्वती।।
-ऋग्वेद 1.3.11

कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की विकासयात्रा आवाज उत्पन्न करने वाली वाक् देवी सरस्वती की कृपा से ही सम्भव है। पुरुषार्थ-चतुष्टय के मार्ग में आने वाले समस्त अवरोधों का परिहार यह सरस्वती ही करती है। यदि आज मानव के विकास के मार्ग में बाधाएँ आ रही हैं, तो उनका निराकरण ज्ञान के द्वारा किया जा सकता है, क्योंकि जितने भी शुभकर्म होते हैं, उन सबके मूल में ज्ञान होता है। विना ज्ञान के उचित-अनुचित का विवेक संभव नहीं है। शतपथ-ब्राह्मण अध्ययन-अध्यापन के महत्त्व को प्रतिपादित करता हुआ कहता है-
अथातः स्वाध्यायप्रशंसा। प्रिये स्वाध्यायप्रवचने भवतो युक्तमना भवत्यपराधीनोऽहरहर- र्थांन्त्साधयते सुखं स्वपिति परम चिकित्सक आत्मनो भवति।
– शतपथ ब्राह्मण 11.5.7.1
अर्थात- स्वाध्याय और प्रवचन ये दो अत्यन्त प्रिय कर्म हैं, जो इनको करता है, उसका मन एकाग्र रहता है, वह कभी पराधीन नहीं होता है, उसके कार्य दिनोंदिन सिद्ध होते जाते हैं, वह सदा सुख की नींद सोता है, उससे बढ़कर मनुष्य के अपने रोगों की चिकित्सा करने वाला अन्य कोई नहीं है।
अध्ययन के महत्त्व को और अधिक स्पष्ट करता हुआ शतपथ-ब्राह्मण आगे कहता है –
इन्द्रियसंयमश्चैकारमता च प्रज्ञावृद्धिर्यशो लोकपंक्तिः।
– शतपथ ब्राह्मण 11.5.7.1
अर्थात- इससे इन्द्रिय-संयम, चित्त की एकाग्रता, बुद्धि की वृद्धि, यश का लाभ, लोक का परिपाक अर्थात् वह लोक व्यवहार में परिपक्व हो जाता है।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक साहित्य की दृष्टि में शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे मनुष्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, यहाँ तक कि, विश्व की सभी समस्याओं का निराकरण कर सकता है। आज विश्व के समक्ष अनेक समस्याएँ मुँह बाये खड़ी हैं, जैसे-पर्यावरण-प्रदूषण, जाति, रंग, प्रान्त या देश के आधार पर भेदभाव, धार्मिक असहिष्णुता, निर्धनता, निरक्षरता, जनसंख्या विस्फोट, चिकित्सा का अभाव। ऐसी न जाने कितनी समस्याएँ हैं, जिनसे समस्त विश्व आक्रान्त है, लेकिन खेदजनक बात यह है कि हमारे देश भारत में ये सभी समस्याएँ कुछ अधिक ही उग्र रूप में विद्यमान हैं। उल्लेखनीय है कि यह देश पूर्व मध्यकाल से एक ऐसी समस्या से ग्रस्त रहा है, जिसने इस देश के न केवल मानचित्र को ही खण्डित किया है, वरन् आज भी यह आरक्षणरूपी महास्त्र के द्वारा भारतीय समाज को विखण्डित कर रही है। कभी यह समस्या बौद्ध और जैन सम्प्रदायों के रूप में अभिव्यक्त हुई, कालान्तर में हमारे पराधीन होने पर यह इस्लाम और ईसाइयत के रूप में हमारे समाज को विद्रूप बनाती रही है और आज यह आक्षरण और जात-पात के रूप में राजनीतिज्ञों का हथियार बनकर हमारे मन और मस्तिष्क को प्रदूषित कर रही है। सहस्रों वर्षों से जिस रोग ने भारतीय समाज को कैंसर की भाँति आक्रान्त कर रक्खा है, उसका निराकरण केवल वेद प्रतिपादित शिक्षाव्यवस्था द्वारा ही संभव है।

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