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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-भारतेन्दु मिश्र-  nirala
युग बीत गया, निराला की कविता नहीं रीती। वो आज भी प्रासंगिक हैं। उनके गीत कालजयी हैं। छन्दोबद्ध कवियों को निराला से बहुत कुछ सीखना है। सन-1923 में निराला का पहला कविता संग्रह – अनामिका- प्रकाशित हुआ। अनामिका में ही अधिवास शीर्षक एक कविता है जिसमें निराला कहते हैं-
मैंने मैं शैली अपनायी
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पड़ी हृदय में झट उमड़ वेदना आयी।

यह कविता सन 1923 या उससे कुछ पहले की ही होनी चाहिए,बहरहाल निराला की कविता का प्रयोजन उनकी इन्ही पंक्तियों से साफ झलकता है कि निराला दुखदग्ध मनुष्य की वेदना के कवि हैं। असल में निराला करुणा के कवि हैं। सरोज स्मृति हिन्दी का पहला शोक गीत है। घनघोर शोक की दशा में भी निराला छन्द नहीं तोडते। वे दुख को गरल समझकर पी जाने वाले सिद्ध कवि हैं। वे असहाय दीन दुखियों के दुखों के गीतकार हैं। यह वह समय था जब अधिकांश रचनाकार स्वतंत्रता की लड़ाई के गीत लिख रहे थे। हालांकि कुछ कवि धर्म और दर्शन की पहेलियां सुलझाने में भी लगे थे। निराला की इसी जमीन पर पढ़ीस और बंशीधर शुक्ल जैसे किसान चेतना के कवि भी इसी समय में हुए। यह वह समय था जब भारतीय जीवन मे बहुत तेजी से बदलाव हो रहे थे, लेकिन निराला ने छन्द नहीं छोड़ा बल्कि वो तो नए से नए छन्दविधान को स्वर देने में लगे थे। अत: निराला छन्द साधना के कवि हैं। जब वो कहते हैं – मैंने मैं शैली अपनायी- तो इसका अर्थ यही है कि वो अपने समय के छायावादी कवियों से हटकर अपना मार्ग बना रहे थे। यहीं से उनकी मौलिकता का अन्दाज लगाया जा सकता है। निराला के इसी वाक्य को लेकर कुछ आलोचकों ने उन्हें छन्दमुक्त कविता का प्रवर्तक और स्वच्छन्दतावादी कवि सिद्ध करने की कोशिश की है, जबकि यह पूरा सच नहीं था। यदि ऐसा होता तो निराला छन्दहीन कविताएं ही रचते रहते। निराला तो संवाद धर्मी गीत लिख रहे थे।
-बांधों न नाव इस ठांव बन्धु /पूछेगा सारा गांव बन्धु। जैसे अनेक गीत निराला ने रचे हैं। किसान चेतना और ग्राम्य जीवन के बहुत से चित्र निराला के गीतों की शक्ति बनकर उभरते हैं।
निराला की रचनावली में जो कविताएं संकलित हैं, उन्हें देखकर यह साफ हो जाता है कि वे अंत तक छन्दोबद्ध कविताएं ही लिखते रहे, बल्कि निराला नए छन्दों का सृजन भी करते रहे। कविता की अखण्ड लय ही निराला की साधना का मूल है। वे उन विरल कवियों में से हैं जिन्हे संगीत का भी पूरा ज्ञान है। वे राग रागनियों में निबद्ध गीतों की रचना भी करते हैं। उनके अनेक गीतों का सुर ताल सधा हुआ है। वे पक्के राग मे भी गाये जाते हैं। वे सहज रूप में ही नवगीत की परिभाषा देते हुए चलते हैं-
नवगति नव लय ताल छन्द नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दे।… वर दे वीणावादिनि वर दे।
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ने अपनी पुस्तक –अनकहा निराला- में इस बात पर विशेष बल दिया है और निराला के गीतों मे प्रयुक्त रागों की विस्तार से चर्चा करते हुए वे कहते हैं-‘वैसे तो निराला जी ने चित्र और संगीत हीन एक पंक्ति भी नहीं लिखी ,किंतु कभी कभी उनमें कुछ ऐसा लोकोत्तर अनोखापन आ गया है कि देखते ही बनता है। पृ.194(अनकहा निराला) निराला महाप्राण हैं क्योंकि उनके गीतों में दीन जन के प्राण बजते हुए सुने जा सकते हैं। निर्धन लाचार लोगों की पीडा का स्वर उनके गीतो मे सुना जा सकता है। वे छायावाद के निरे सुकुमार कवि नहीं हैं, वे रहस्यवाद के चमत्कारी कवि भी नहीं हैं। वे तो प्रगतिशील चेतना के गीतकार हैं। छायावादोत्तर -नवगीत,जनगीत आदि अनेक प्रगतिशील आन्दोलनो को उर्वर भूमि निराला के गीतों से ही मिलती है। संवेदना का जो मार्मिक विस्तार निराला अपने गीतों द्वारा कर चुके हैं उससे बहुत कुछ आगे हमारे गीतकार नहीं बढ़ पाये हैं। वैचारिक स्तर पर निराला समाज के अतिदीन दुखी दलित और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के दुखों की समीक्षा ही नहीं करते बल्कि सामंतों को टोकते हुए चलते हैं। सन 1929 के आसपास लिखे गये गीत का अंश देखिए-
छोड दो जीवन यों न मलो
ऐठ अकड़ उसके पथ से तुम रथ पर यों न चलो।
यह पूरा गीत उस समय के सामंतवादी ठाठ के खिलाफ आम आदमी के साथ खड़े हुए निराला की गवाही देता है। यह है निराला की काव्य चेतना सामंतवादी ऐठ अकड के खिलाफ दलित जन का समर्थन करती है। निराला यहां सच्चे समाजवादी दिखाई देते हैं। दीन दुखी जन के हित में निराला किसी हठयोगी की तरह डटे हुए दिखाई देते हैं तो कहीं ईश्वर से प्रार्थना करते हुए तुलसी जैसे संत कवियों के समीप खड़े मिलते हैं- दलित जन पर करो करुणा दीनता पर उतर आये प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा। ध्यान देने की बात यह है कि निराला का भक्तिभाव स्वर्ग मोक्ष प्राप्त करने वाला नहीं है। वे तो अपने सब संचित फल लुटाने वाले हैं।भिक्षुक शीर्षक कविता भी उनकी प्रारम्भिक कविताओ में है। भिक्षुक की लाचारी का इतना सजीव चित्रण सम्भवत: हिन्दी कविता में निराला से पहले अन्यत्र नहीं मिलता। कलेजे के दो टुकड़े करने वाला मार्मिक दृश्य अपना कलेजा चीर कर निराला देखते हैं और दिखाते हैं। करुणा ही चीत्कार करती है निराला की कविता में। इस पूरी कविता को पढ़ने के बाद उनके समय की भुखमरी से उत्पन्न लाचारी का स्पष्ट आकलन किया जा सकता है। निराला का भिक्षुक आजकल जैसा पेशेवर भिखारी नहीं है-
वह आता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता।
भीख मांगने वाले आज भी कम नहीं हुए हैं बल्कि पेशेवर हो गये हैं। विचारधाराएं और सरकारें दम तोड़ चुकी हैं। निराला के भिक्षुक के मन में पश्चाताप है। यह बोध ही उसे पेशेवर भिखारियों से अलग करता है। शायद इसीलिए निराला की करुणा फूटकर बह निकली है। निराला कल्पना की कोई गुलाबी उड़ान के कवि नहीं हैं। वे असल में जनकवि भी हैं, महाप्राणत्व की प्रतिष्ठा भी उन्हीं में है। यह कविता निराला के श्रेष्ठ प्रगीतों में से एक है। निराला अपने समय में छायावादी रोमानियत को फलांग कर आगे बढ़े हैं। अपने समय मे वैचारिक स्तर पर आगे बढ़ना ही तो प्रगतिशीलता है। किसी दल की सदस्यता लेकर किसी खेमे में शामिल होकर निराला प्रगतिशील नहीं बने, बल्कि वे तो प्रगति शीलता के अग्रदूत हैं। इसी क्रम में पत्थर तोड़ती महिला बिम्ब देखें-
वह तोड़ती पत्थर
देखते देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर।
हिन्दी में इस तरह की छान्दसिक कविताएं निराला से पहले नहीं लिखी गयीं जिनमें मज्दूर महिला का श्रम सौन्दर्य अंकित हो। ऐसे प्रगीत लिखना तो बहुत बड़ी साधना की बात है। उनके गीतों में बिम्बों और प्रतीकों के भटकाऊ जंगल नहीं हैं। उनकी कविताओं में अंत: सलिला की तरह लय धड़कती है। वे सीधी सादी भाषा में सुकोमल और भीषण संवेदना के मर्मस्पर्शी कवि हैं। इसीलिए जानकी वल्लभ शास्त्री उन्हें विरोधो के सामंजस्य का कवि कहते हैं। सुकोमल संवेदना की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रणय और दाम्पत्य के विरल गीत अपने समय में निराला ने रचे हैं, गृहरति व्यंजना का स्वर देखें-
सुख का दिन डूबे डूब जाय
तुमसे न सहज मन ऊब जाय।
खुल जाय न गांठ मिली मन की
लुट जाय न राशि उठी धन की
सारा जग रूठे रूठ जाय।
जहां सहज सौन्दर्य की उन्नत राशि है और जिस दाम्पत्य में एक मन के साथ दूसरे मन की गांठ कसी है, वह बना रहे बेशक काल्पनिक या अनिर्वचनीय सुख का दिन डूबता है तो डूब जाये। फिर तो निराला सारी दुनिया की भी बात नहीं मानते। दाम्पत्य बोध का ऐसा सुन्दर गीत अन्यत्र हिन्दी मैंने नहीं पढ़ा। इसी प्रकार एक और गीत में दाम्पत्य बोध का निराला का यही स्वर दृष्टव्य है। निराला यहां भी अपने समकालीनों से अलग अपनी पहचान के साथ खड़े हैं-
जैसे हम हैं वैसे ही रहे लिए हाथ एक दूसरे का अतिशय सुख के सागर में बहें।
एक और चित्र देखें-
पिय के हाथ जागाये जागी
ऐसी मैं सो गयी अभागी।
सहयोग साहचर्य और बहुत कुछ संत मत के निकट के सुन्दर चित्र निराला की कविता मे साफ तौर से दिखाई देते हैं जो अपनी सहजता और अनुभूति के कारण आकर्षक लगते हैं। निराला बहुआयामी कवि हैं उनकी कविता के अनेक स्तर हैं उनकी कविता के अनेक स्वर हैं। वो किसी एक विचार या विचारधारा में बंधकर नहीं चलते। जो नई राह बनाते हैं वो बनी बनायी राह पर कैसे चल सकते हैं। हम कह सकते हैं कि निराला वसुधैव कुटुम्बकं के कवि हैं। जानकी वल्लभ शास्त्री के अनुसार-“ निराला अद्वैतवादी भी हैं, द्वैतवादी भी हैं, भक्त भी हैं और ज्ञानी भी और क्रांतिकारी भी, लौह प्रहार तथा ललकार भी और और आत्म परमात्म मिलन की मधुर झंकार भी।वह वैयक्तिक अनुभूतियों के स्वर्ग में विचरने वाला मुक्त विहग भी हैऔर पतनोन्मुख रूढ प्रिय संस्कृति की विहग बालिका के लिए भयंकर बाज भी,उसमें लौकिक प्रेम की ललक भी है और आध्यात्मिक भूमि पर अनुभूति का आत्मपुलक भी, निराला विरोधों का स्वयं सामंजस्य और सामंजस्यों का विरोध हैं।“ (पृ.117 अनकहा निराला)
यहां साफ शब्दों में कहें तो निराला सिद्ध रचनाकार साबित होते हैं। वो कुशल रचनाकार की तरह सब विचारधाराओं में से जन्नोन्मुखी संवेदना का चुनाव करते हैं। कुछ कबीर की तरह ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ वाली मुद्रा में। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण निराला आधुनिक युग के विशिष्त और युग प्रवर्तक कवि हैं। उनके गीतों को भी मार्क्स, फ्रायड, लोहिया या विवेकानन्द, अम्बेडकर अथवा गान्धी में से किसी एक की विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। निराला इन सभी अपने समय के महापुरुषों के विचारों को सुन समझकर अपनी राह बनाते हैं, सम्भवत: इसीलिए वो कहते हैं-“मैंने मैं शैली अपनायी”। निराला को जब जो अपने रचनासमय के लिए उपयुक्त जान पड़ा उसे गृहण किया और जो अनुपयुक्त जान पड़ा उसे छो़ड दिया।
निरला की रचनावली और विशेषकर आराधना में प्रकाशित गीतों को पढ़ने से लगता है निराला भक्त कवि हैं। निराला के गीतों मे सूर तुलसी मीरा आदि भक्त कवियों की सी संवेदना की तड़प विद्यमान है।यद्यपि वो धार्मिक कर्मकाण्ड वाली आस्था के कवि नहीं हैं, जहां एक ओर कहीं वो अपने गीतों में नाम जपने का संकेत देते हैं तो वहीं दूसरी ताल ठोककर खड़े होते हैं। राम की शक्ति पूजा में निराला की ओजस्विता और काव्य शक्ति की अनेक भंगिमाएं स्पष्ट होती हैं तो दूसरी ओर उनके अनेक गीत सहजा भक्ति के मार्ग का अवलम्बन करते हैं। उदाहरणार्थ-
नाचो हे रुद्र ताल/आंचो जग ऋजु अराल।
दुख के सुख पियो ज्वाला/शंकर के स्मर-शर की हाला।
कामरूप हरो काम/जपूं नाम राम-राम।
वर दे वीणा वादिनि वर दे
भारति जय विजय करे/कनक शस्य-कमल धरे।
यह अपने निजी सुख स्वार्थ पूर्ति या स्वर्ग सुख की कामना या ईश्वर से वरदान मांगने की निरी मानवीय मुद्रा नहीं है। यह निराला का युगधर्म भी है और व्यक्तिगत जीवन का सत्य भी। निराला के गीतो के पुनर्पाठ और नयी पाठचर्या की आवश्यकता है। उनकी छन्दसिक रचनाएं ही उनके मनोभावों के भेद खोल सकती हैं। वे निरे
प्रयोगवादी भी नहीं हैं। निराला साफ करते हैं अपने भक्ति भाव को और कहते हैं-
नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणो पर मां
मेरे श्रम संचित सब फल।
आम तौर पर भक्ति और प्रगति दोनों पृथक मार्ग हैं किंतु निराला की भक्ति में उनकी प्रगतिशीलता साफ नजर आती है-जब वो कहते हैं नर जीवन के स्वार्थ सकल अर्थात मनुष्य जीवन के असंख्य छोटे बड़े व्यक्तिगत स्वार्थ सबका बलिदान करता हूं। इसके आगे कहते हैं– श्रम संचित सब फल, अर्थात अपने परिश्रम से अर्जित कर्मफल का ही अर्पण है। किसी अन्य पूर्वज या अनुज द्वारा अर्जित किसी फल या सम्पदा की बात नहीं कर रहे हैं, निराला क्योंकि मनुष्य का अपने श्रम द्वारा अर्जित फल पर ही नैतिक अधिकार होता है। इसके बदले में किसी फल की कामना तो है ही नहीं। हम इसे निराला की राष्ट्रीय चेतना के रूप में भी व्याख्यायित कर सकते हैं। तात्पर्य यह कि निराला के गीतो में कथ्य और संवेदना के जितने स्तर हैं कदाचित ही किसी दूसरे कवि के पास हों। अत: यह मान लेना कि केवल वैचारिकता के आग्रह में निराला ने छन्द तोड दिया,सही नहीं है। इस बात को स्वयं उनके गीत ही प्रमाणित करते हैं जहां वो नए शिल्प में नयी लय लेकर उपस्थित होते हैं। निराला अपनी सर्जना से तमाम छन्दविरोधियों को उत्तर देते है जैसे शक्ति पूजा में उन्होंने राम को सन्देश दिलाया है-“आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर।“ वो सिद्धावस्था के जाग्रत कवि हैं। इसीलिए निराला नयी कविता ही नहीं नवगीत,जनगीत जैसे आन्दोलनो के प्रेरणा पुरुष के रूप में देखे जाते हैं। नवगीत जनगीत जैसे आन्दोलनो की जो पृष्ठभूमि सन 1950 के आसपास तैयार हो रही थी निराला उस दिशा में 1943 मे ही सार्थक प्रयोग कर चुके थे। बाद में अणिमा में संकलित उनका यह गीत देखिए-
चूंकि यहां दाना है इसीलिए दीन है, दीवाना है। लोग हैं महफिल है नग्में हैं, साज है, दिलदार है और दिल है शम्मा है, परवाना है। निराला अपने समाज के उपेक्षित जन के लिए अपनी कविता के औजार से लड़ते रहे। युगदृष्टा साहित्यकार हमेशा से ही अपने समय की समालोचना में उपेक्षा का शिकार रहा है। निराला भी शिकार हुए तब निराला ने अपने समय के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को सम्बोधित यह गीत लिखा-
जब से एफ.ए.फेल हुआ है/हमारे कालेज का बचुआ
नाक दबाकर सम्पुट साधै/महादेव जी को आराधै
भंग छानकर रोज रात को/ खाता माल पुआ
बाल्मीकि को बाबा मानै/नाना व्यासदेव को जानै
चाचा महिषासुर को, दुर्गा जी को सगी बुआ
हिन्दी का लिक्खाड बड़ा वह/जब देखो तब अड़ा पड़ा वह
छायावाद रहस्यवाद के/भावो का बटुआ
धीरे-धीरे रगड़-रगड़कर/श्री गणेश से झगड़-झगड़कर
नत्थाराम बन गया है अब /पहले का नथुआ।
जिस कवि मे आलोचक से आंख मिलाकर बात करने और ताल ठोंककर दो हाथ करने की क्षमता होगी वही निराला के स्वाभिमान और उनके गीत की लय को पकड़ सकता है। बाद में शुक्ल जी ने निराला जी को पढ़ा भी और उनपर लिखा भी। समर्थ रचनाकार आलोचना की बैसाखी के सहारे खड़ा नहीं होता। निराला को अपनी रचना पर दृढ़ विस्वास था। यह आत्मविश्वास ही उनकी मैं शैली है। कहना न होगा कि निराला के गीत कहीं न कहीं कालिदास, जयदेव, तो कहीं तुलसी मीरा, तो कहीं गुरुदेव रवीन्द्र की गीत परम्परा को आगे बढ़ाते हैं। निराला के गीत इस सीमा तक अपने कथ्य भाषिक-व्यंजना और सवेदना से नए हैं कि बाद के गीतोन्मुख तमाम आन्दोलन उनकी रचनाशीलता का परिविस्तार ही साबित होते हैं। निराला के परवर्ती प्रमुख कवियों में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि सभी प्रगतिशीलों ने भी गीत की शक्ति विस्तार ही दिया। निराला के नवगीतो की बानगी देखें- मानव जहां बैल घोड़ा है, कैसा तन मन का जोड़ा है। तथा- बान कूटता है ऐसे बैठे ठाले सुख का राज लूटता है। मुक्तिबोध कविता में जिस मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा करते हैं और डॉ. रामविलास शर्मा जिस श्रम सौन्दर्य की बात करते हैं उसकी रूपरेखा हिन्दी नवगीत के शिल्प में निराला की देन है। विशेषता यह भी है कि निराला का चिंतन भारतीय काव्यमूल्यों से अनुप्राणित है। अत: उनके गीतों की विवेचना भी भारतीय परिवेष में विकसित मूल्यों के आधार पर ही की जा सकती है। निराला की कविता में वाक्य और अर्थ कहीं लंगड़ाता नहीं है। विराम और अर्धविराम चिन्हों तक का प्रयोग निराला करते चलते हैं।
तात्पर्य यह कि वो अपने पाठ्य को लेकर पूरी तरह सजग हैं। यही कारण है कि निराला के गीत पाठ्य और श्रव्य दोनो रूपों मे सहृदयों को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं। निराला ने अपनी कविता के जो मानदण्ड बनाये वो निभाये। इसे ही उन्होंने मैं शैली कहा है। घनघोर निराशा की स्थिति में भी वह आशा की किरण खोज ही लेते हैं।आसन्न मृत्यु की स्थिति में संकट की स्थिति में भी निराला गीत का साथ नहीं छोड़ते। अपनी अंतिम गीत रचना में वो कहते हैं-
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
आशा का प्रदीप जलता है हृदय कुंज में
अन्धकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है
दिंड्निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र –पुंज में।
सम्भवत; यही निराला की अंतिम रचना है जो अगस्त 1961 के आसपास रची गयी और सान्ध्यकाकली में संकलित है। इस कविता में भी दिंड्निर्णय ध्रुव से कहकर अपने अटल विश्वास को दृढ़ करते हैं। निराला अपनी रचनाशीलता की आग को अपनी मुट्ठी में जीवन पर्यंत कसे रहे। तात्पर्य यह है कि निराला की स्वच्छन्दता को छन्दहीनता से जोड़कर देखना अनुचित है। निराला के यहां छन्द कमजोरी नहीं है। वह तो सहृदय को आच्छादित करने या हृदयव्यापी बनाने के अर्थ में है। छन्दों के अनंत रूप हैं निराला की कविता में-कहीं लयांविति के रूप में कहीं सांगीतिक लय के रूप में कहीं संवाद धर्मिता के रूप में वो प्रकट होते चलते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा से बेहतर शायद ही कोई निराला को जान पाया हो। शर्मा जी ने भी निराला की प्रशस्ति अपने एक गीत से ही की थी-
यह कवि अपराजेय निराला जिसको मिला गरल का प्याला
ढहा और तन टूट चुका है पर जिसका माथा न झुका है
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती लेकिन अभी संभाले थाती
और उठाये विजय पताका यह कवि है अपनी जनता का।
निराला अपराजेय हैं क्योंकि वह अपनी रचनाशीलता से लगातार जनता से जुड़े रहे हैं। निराला समर्थ गीतकार हैं जो टूटकर भी लगातार आत्मस्वाभिमान से उन्नत मस्तक होकर अपनी जनता के दुखों को अपने गीतों से मांजते रहे।
उनका छन्दसौष्ठव और वाक्य विन्यास देखकर उनकी काव्य प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। निराला की गीत परम्परा का विस्तार प्रगतिशील कवियों ने भी किया। बाद में यही परम्परा आगे जाकर नवगीत और जनगीत के रूप में प्रतिफलित हुई जिसके परिणाम स्वरूप राजेन्द्रप्रसाद सिंह,शम्भुनाथ सिंह,मुकुट बिहारी सरोज, रमेश रंजक, ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, नईम, उमाकांत मालवीय, देवेन्द्रशर्मा इन्द्र, माहेश्वर तिवारी जैसे अनेक नवगीतकार जनगीतकार उभरे। नवगीत आन्दोलन के बाद छायावादी गीत परम्परा का लगभग अवसान हो गया। निराला की समर्थ गीत प्रतिभा कहीं न कहीं नवगीतकारो को लागातार प्रेरणा देती रही।नई पीढी के नवगीतकारो मे संवेदना के स्तर पर और नई जमीन देखने को मिलती है किंतु छन्दहीन कवितावादियों ने काव्यं गीतेन हन्यते की गलत व्याख्या करके अपनी सुविधा के आधार पर हिन्दी कविता का बहुत आहित किया। दूसरी ओर नये कवियों मे जो नवगीत लिख रहे हैं उनमें वाक्य गठन,भाषिक रचना,तथा सहज सरल जीवन को मुखरित करने वाली समर्थ छन्द रचना का अभाव दिखता है। नये कवि के पास समय नहीं है।साधना और अभ्यास की कमी इसका मूल कारण है। किसी भी संवेदना को छन्द में प्रस्तुत किया जा सकता है बशर्ते साधना और अभ्यास किया जाये। निराला अपनी रचनाओ को बार बार मांजते हुए आगे बढ़ते हैं वो कहीं स्वयं को दुहराते नहीं, विचार- भाव- भाषा-शिल्प आदि के प्रयोग उनके यहां नए हैं। निराला के बहुत से गीत हैं जिनकी गहन विवेचना होनी चाहिए। यहां इस लेख में निराला के गीतो की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करना भर ही मेरा उद्देश्य है। निराला के यहां जीवन और कविता में फर्क नहीं है। यही कारण है कि निराला के गीत आज के समय में भी प्रासंगिक हैं उनकी छन्दसिकता और जनपक्षधरता की दृष्टि से भी उनके पुनर्पाठ की आवश्यकता बनी हुई है।

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