लेखक परिचय

जगमोहन फुटेला

जगमोहन फुटेला

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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जगमोहन फुटेला 

किरण बेदी कह रहीं हैं कि खुद को कष्ट देकर जो पैसे उन्होंने हवाई टिकटों से बचाए हैं, अब (पर्दाफ़ाश होने के बाद) वे वापिस कर देंगी. भाई लोग कह रहे हैं कि वे इंसान हैं और गलती चूंकि इंसान से हो ही सकती है और पैसे भी जब वे वापिस दे ही रहीं हैं तो किस्सा ख़त्म समझा जाना चाहिए. कुछ भाई लोगों को लगता है कि अब इसके बाद उनके इस बचत कर्मकांड के बारे में कुछ भी कहना अन्ना आन्दोलन को बदनाम करने की कोशिश है.

वाह, क्या तर्क है? अरे भई, अगर किरण बेदी इंसान हैं तो क्या राजा और कनिमोजी नहीं हैं? क्या फर्क है इनमें और उनमें? क्या कहेंगे आप अगर कल वो भी पैसे वापिस दे दें? उन दोनों ने तो माना भी नहीं है. न अदालत ने ही उन्हें दोषी ठहरा दिया है. किरण ने मान भी लिया कि हाँ, लिए थे पैसे ज़्यादा. बचाए भी थे. उनके ये कह देने से कि ट्रस्ट के लिए बचाए थे क्या उन्हें उनके अपराध से मुक्त कर देता है? क्या झूठ या हेराफेरी (या खुद को इकानामी क्लास में सफ़र करा कर) ट्रस्ट के लिए ही सही पैसे बटोरना कानूनी और नैतिक रूप से उचित है? जो फिर कहेंगे कि हाँ (जब दे ही रहीं हैं पैसे वापिस) तो उन्हें बता दें किसी भी अपरोक्ष तरीके से किसी के लिए भी धनसंचय करना है तो अपराध ही.

और फिर उनके खिलाफ उठने वाली कोई भी आवाज़, कोई भी सवाल या किसी के मन में आया कोई भी संशय अन्ना आन्दोलन की बदनामी कैसे है? क्या किरण बेदी ने ट्रस्ट अन्ना के लिए बनाया? ये यात्राएं उन के लिए कीं? या पूछा था अन्ना से कि ऐसे पैसे बचाऊँ या नहीं? …और क्या किरण बेदी गलत हों तो भी सही हैं क्योंकि वे अन्ना के साथ हैं? शायद यही वो कारण है कि किरन बेदी गलत भी हों तो उन्हें सही ठहराने या फिर उन्हें माफ़ कर देने की बातें तो कही ही जा रहीं हैं.

सच बात तो ये है कि आज किरण बेदी जैसे प्रकरणों पर कुछ भी कह पाना संभव या कहें कि एक तरह से खतरे से खाली नहीं रह गया है. हालात ये हो गए हो हैं कि पब्लिक परसेप्शन के खिलाफ कुछ लिखने, बोलने वाले की बोलती बंद की जा सकती है. जनता जब अंधभक्त हो कर अन्ना आन्दोलन के साथ थी तो सरकार की बोलती बंद थी. किसी भी मंत्री का घर घेर लेने के सुझाव थे. मनीष तिवारी को अपनी उस प्रेस कांफ्रेंस के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी जो निश्चित ही उन से खुद कांग्रेस ने करवाई होगी. यानी खुद कांग्रेस ने माफ़ी मांगी. इस लिए नहीं कि कांग्रेस या मनीष तिवारी के मन में एकाएक कोई बहुत बड़ी श्रद्धा या आस्था जाग पड़ी थी अन्ना या आन्दोलन के लिए. वो डर था. आज किरण बेदी डरी हुई हैं. क्योंकि हम सब डर के माहौल में जी रहे हैं. गौर से देखिये तो आप पाएंगे कि आन्दोलन के आजू बाजू एक तरह का आतंक उपजने लगा है. सरकार ने आन्दोलन, टीम के किसी सदस्य के खिलाफ कुछ बोला नहीं कि घेराव. अखबार ने कुछ छापा नहीं कि बहिष्कार. उधर खुद आन्दोलन से जुड़े लोग भी एक तरह की दहशत या कहीं कुछ भी हो सकने की आशंका के साथ जी रहे है. ये तो गनीमत है कि प्रशांत भूषन पे हमला करने वाले दूर दूर तक भी कांग्रेसी नहीं निकले. वरना बवाल खड़ा हो जाता. न सिर्फ अन्ना टीम की तरफ से, बल्कि विपक्षी पार्टियों की तरफ से भी.

हम सब जैसे बारूद के ढेर पे आ बैठे हैं. सच पूछिए मैं तो सुबह नहा धो के अपनी प्रभु साधना में सब से पहले सब से ज्यादा, अन्ना के स्वास्थ्य और लम्बी आयु की कामना करता हूँ. भगवान् करे उन्हें मेरी भी उमर लगे. लेकिन मैं डरता हूँ कि खुदा न खास्ता उन्हें कहीं स्वाभाविक रूप से भी कुछ हो गया तो आज के माहौल में एक छोटी सी भ्रान्ति भी देश को दावानल में झोंक देगी. मेरा आग्रह ये है कि हम भावना की बजाय तर्क की बात करें. तर्क की बात ये है कि भ्रष्टाचार बातों, कसमों या ह्रदय परिवर्तनों से भी ख़त्म नहीं होगा. कानून चाहिए. जिस देश में लोग अपनी खुद की हिफाज़त के लिए हेलमेट न पहनने के लिए भी बहाने ढूंढ लेते हों वहां कानून तो चाहिए. कैसा हो ये अलग बहस का विषय है. लेकिन वो अभी आया नहीं और अब रिकाल का अधिकार भी चाहिए. क्या आगे से आगे से बढ़ते नहीं जा रहे हम? जिस देश की आधी आबादी दस्तखत करना तक न जानती हो, उसे मालूम है कि अपने सांसद को क्यों वापिस बुलाने जा रही है वो? मान के चलिए कि अगर मिला तो रिकाल का अधिकार दिलाएंगे अन्ना, मगर उसका इस्तेमाल हर महीने करेंगे विरोधी नेता. और तब आप चला लेना इस देश में कोई संसद या लोकतंत्र. मुझे तो नहीं लगता कि बहुत पढ़े लिखे भी मेरी इस आशंका से सहमत होंगे. जो कभी पढ़ते ही नहीं, न जानते देश या लोकतंत्र के बारे में मतदान के दिन के अलावा वे क्या समझेंगे आज कि ये आन्दोलन या ये देश किधर की ओर अग्रसर है.

यकीनन इस देश में बेहतरी या किन्हीं अच्छे बदलावों के लिए कमर कसने वाले अरविन्द केजरीवालों की तारीफ़ और हिफाज़त की जानी चाहिए. लेकिन उनका भी फ़र्ज़ बनता है कि वे भोली भाली जनता को भावुक कर वो सब न करें जिसका कि जनादेश उन्हें नहीं मिला हुआ है. ये सही है उनकी बात कि संविधान के प्रिएम्बल में संविधान भारत की जनता में निहित होने की बात कही गई है. इस अर्थ में निश्चित रूप से संविधान और उसमें निहित संप्रभुता भारत की जनता को समर्पित है. ध्यान दें, जनता को! अन्ना, केजरीवाल, उनकी टीम या उनके लिए नारे लगाने वाली भीड़ को नहीं, जनता को! देश की सारी जनता को. माफ़ करेंगे ये महानुभाव. ये सारी जनता नहीं हैं. कल आपके साथ लाखों लोग आ के खड़े हो जाएँ किसी चाइना स्क्वेयर या तहरीक चौक की तरह. तो भी वो आन्दोलन तो हो सकता है. विद्रोह भी हो सकता है. जनता द्वारा परिभाषित, प्रत्याक्षित, निर्वाचित और इसी लिए संविधान सम्मत कोई नीति-निर्णय नहीं हो सकता. इस देश के अस्तित्व के लिए अगर लोकतंत्र ही श्रेष्ठ प्रणाली है औ उसके संविधान में किसी भी बदलाव के लिए प्रावधान और प्रक्रिया भी उसी के तहद अपनानी पड़ेगी. उसके लिए ज़रूरी है कि चिंतन, मनन और संवाद हो. और वो होना तो किसी आन्दोलन के साए में भी नहीं चाहिए. धमकियों के आतंक में तो कतई नहीं होना चाहिए. मगर दुर्भाग्य से हो वही रहा है. असहनशीलता इसी लिए है. पलटवार भी इसी लिए है और चरित्रहनन भी इसी लिए.

इसी लिए ये और भी ज़रूरी है कि, आन्दोलन की सफलता की खातिर भी, किरण बेदियों का चरित्र और आचरण शक शुबह के दायरे से बाहर हो. गलत या सही, उन पे भी अब भरोसा उठा तो ये और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा. अन्ना के ज़रिये जो देश हित और राष्ट्रीयता जो की भावना पैदा हुई है वो कमज़ोर होगी. ये नहीं होनी चाहिए. किसी भी कीमत पर. ऐसे में ज़रूरी है कि किरण बेदी के आचरण और ट्रस्ट के आय व्यय की पड़ताल हो. बेहतर है वे स्वयं इसकी मांग करें. उनको बचाने की कोई भी कोशिश या व्याख्या करना किसी को भी नैतिक रूप से कमज़ोर और कठघरे में खड़ा करेगा.

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16 Comments on "आज किरण को माफ़ करें, कल कनिमोझी को!"

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इंसान
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जगमोहन जी, आपने देशद्रोही की परिभाषा पूछ मुझ अधेड़ उम्र के साधारण व्यक्ति को असमंजस में डाल दिया है| स्वतंत्रता के चौसंठ वर्षों बाद देश और देशवासियों की दयनीय स्थिति में देशद्रोही की परिभाषा कही सुनी नहीं बल्कि देखी जा सकती है| आज वैश्विक उपभोक्तावाद के चलते स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात से ही शासन व समाज के सभी वर्गों में मध्यमता और अयोग्यता की जगह अब सर्वव्यापी भ्रष्टाचार और अनैतिकता ने ले ली है| फलस्वरूप, आज भारत में १९४७ की पैंतीस करोड जनसंख्या के दोगुना से कहीं अधिक लोग मात्र बीस रूपए दैनिक आय पर निर्भर हैं| यदि आपको मेरी… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
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जगमोहन फुटेला जी आप वरिष्ठ पत्रकार हैं। अच्छा लिखते हैं लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि सब आपकी बात से सहमत हों। एक लघुकथा से अपनी बात कहना चाहता हूं। एक राजा ने एक चोर को मामूली चोरी के आरोप में फांसी की सज़ा सुना दी थी। चोर से जब अंतिम इच्छा पूछी गयी तो उसने कहा कि उसको वह फांसी दे जिसने जीवन में कभी चोरी नहीं की हो। एक एक करके सब कभी न कभी अपनी चोरी को याद करके पीछे हटते गये। नतीजा यह हुआ कि खुद राजा भी बचपन में चोरी की बात याद करके इस काम… Read more »
इंसान
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अपने लेख के बचाव में जगमोहन फुटेला का कहना है कि “मैं अच्छा बुरा जो भी पत्रकार हूँ और वही मुझे रहना है|” पत्रकारिता की आचारनीति का दिवालियापन है आपका लेख| मैं समझता हूं कि आज पनवाड़ी की दुकान पर लोग विषय उपयुक्त अच्छा कह सुन लेते हैं| लेख में आपके विचारों पर पाठकों की अस्वीकार-सूचक टिप्पणियां बदलते समय की प्रतीक हैं| लोगों में राष्ट्र प्रेम जाग रहा है और हिसार क्या वे समस्त भारत में भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों का विरोध कर देश में सुशासन लाने में सहायक होंगे| समय आ पहुंचा है कि मीडिया भी अपनी मर्यादा में रहते… Read more »
जगमोहन फुटेला
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इंसान जी, आपका एक मत है मेरा दूसरा और सब का उन जैसा. ये कहाँ का औचित्य है कि जो आपसे सहमत नहीं है वो देशद्रोही या उस तरह के तत्वों के साथ है. कृपया ये देशद्रोह की परिभाषा और अभी जिनके खिलाफ आप का आन्दोलन है उन देशद्रोहियों की सूची जारी कर दें ताकि उनसे किनारा कर सकें…नहीं, तो हमें लेखन और अभिव्यक्ति के आतंकवाद से बचना चाहिए. मैं फिर कहता हूँ कि मैं अन्ना के विचार से तो सहमत हूँ लेकिन उनके ‘हिसार’ से सहमत नहीं हूँ. कांग्रेस के उम्मीदवार को वहां कुल डेढ़ लाख वोट मिले. जीतने… Read more »
Sanjay
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आइए हम अन्ना का (दिग्विजय की तरह )सम्मान करें ???????

डॉ. मधुसूदन
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लेखक जगमोहन जी विस्तार सहित स्पष्टीकरण देनें के लिए|
पाठकों, जग मोहन जी ने अपनी बात रखी| यह दृष्टिकोण उन्हों ने लेख में भी स्पष्ट किया होता, तो प्रश्न खड़ा नहीं होता|
पर==>
मैं मानता हूँ, की जब तक, अन्ना स्वत: चुनाव में खड़े हो कर, अपने लिए मत माँगते नहीं है, तब तक उनका विरोध वास्तव में, राजनैतिक नहीं माना जाना चाहिए|

जगमोहन फुटेला
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मैं आप सभी मित्रों का आभारी हूँ. आखिर एक बहस तो चली. हम भी सोचते, समझते, लिखते हैं तो मतभेद तो होंगे. लेकिन इस पे हम में कोई दो राय नहीं हैं कि सत्ता और सिविल सोसायटी के बीच मतभेद कडवाहट की हद तक हैं. वे एक दूसरे का अनादर करते हुए भी लगते हैं. सत्ता अगर सिविल सोसायटी सदस्यों के चरित्र हनन पे तुली है तो इमानदारी से हमें मानना होगा कि हिसार भी सिविल सोसायटी ने अन्यथा चाहा नहीं होगा. उसके लिए ये एक पीड़ादायक निर्णय रहा होगा. इस लिए भी कि जाने अनजाने आप किसी एक पार्टी… Read more »
Sanjay
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राजनैतिक रैलियों में भीड़ नेताओं के चमचे अपने खर्चे पर लातें हैं. बस या जीप की मुफ्त सवारी करवाते हैं. जबकि अन्नाजी / स्वामी रामदेवजी के आंदोलोनो में अपने पैसे से. अगर आप इतना भी अन्तेर नहीं जानते हैं तो नादान हैं . कांग्रेस के दिग्विजय तथा उसके खास दोस्त लालू यादव के शासन में मध्यप्रदेश और बिहार का सत्यानाश हो गया था. टीवी चैनलों को ४ जून के तत्काल बाद १७०० करोड़ का भारत निर्माण का रसगुल्ला खिलाया था ताकि रामलीला मैदान का सच देश की जनता को दिखाया न जा सके. आप भी टीवी चैनल की सौ बार… Read more »
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