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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-डॉ. अजय खेमरिया-

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पंचायत दिवस पर पंचायत के कार्यों में पतियों के हस्तक्षेप पर चिंता जताई और दो दिन बाद म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फरमान जारी कर दिया कि प्रदेश के जिन स्थानीय निकायों में महिला प्रधान निर्वाचित हुयी है, वहां उनके पतियों का प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा. बकायदा म.प्र. के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर यह व्यवस्था लागू भी कर दी है, इस सरकारी आदेश के मुताबिक ग्राम पंचायत, जनपद (प्रखंड) पंचायत एवं जिला परिषद में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पति या दूसरे परिजन सरकारी कार्य में हस्तक्षेप करते है या इन निकायों की बैठकों में अनाधिकृत रूप से मौजूद रहते हैं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जायेगी। पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव के अनुसार म.प्र. में सभी महिला प्रधान पंचायतों की कार्यवाही की बकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग की जायेगी यदि इसमें पति या परिजन मौजूद नजर आये तो महिला प्रधानों को पद से हटा दिया जायेगा। यहां उल्लेख करना मुनासिब होगा कि म.प्र. देश में पहला ऐसा राज्य है जहां पंचायतों एवं नगरीय निकायों में 50 फीसदी यानि आधे पद महिलाओं के लिए आरक्षित है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में देश में पहला जेण्डर बजट, शिक्षकों की भर्ती में 50 फीसदी, अन्य सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी पद महिलाओं को आरक्षित है. महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में म.प्र. की शिवराज सरकार के नवाचार देश भर में अनुकरणीय माने जाते है. प्रधानमंत्री का बेटी बचाओ अभियान मूलतः म.प्र. की क्रियान्वित अवधारणा पर आधारित है। लेकिन इस सब सुनहरे पक्ष के बावजूद राजनीतिक मोर्चे पर तस्वीर स्याह ही नजर आती है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व का नैसर्गिक प्रकटीकरण मौजूदा व्यवस्था में असंभव सा लगता है. प्रधानमंत्री ने गुजरात की जिस महिला प्रधान पंचायत का जिक्र अपने भाषण में किया था वह देशव्यापी फलक पर बड़ा मुश्किल है. खासकर म.प्र. में तो फिलवस्तु यह अजूबा है, मैदानी हकीकत यह है कि पिछले डेढ़ दशक से म.प्र. में पंचायती राज पूरी तरह से विफल होकर अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुका है. असल में जिस परिकल्पना का खाका परिवर्तन के लिए प्रधानमंत्री देख रहे हैं, पहले उसकी बुनियाद रखे जाने की जरूरत है. इसकी शुरूआत शासन स्तर से ही होना है और इसके लिए मजबूत संकल्पशक्ति अपरिहार्य है. राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया पंचायती राज के लिए एक रोल मॉडल साबित हो सकती है जिन्होंने सभी विरोधों को खूंटी पर टांगकर राजस्थान में पंच, सरपंच, जनपद(प्रखंड), जिला परिषद प्रमख के लिए एक अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता बकायदा एक अध्यादेश लाकर सख्ती से लागू कर दिया. और इस दृढ़ इच्छा-शक्ति का नतीजा यह हुआ कि पूरे राजस्थान में सभी पदों पर शिक्षित जनप्रतिनिधि चुनकर आ गये. पहले यह कहकर विरोध किया गया कि दलित आदिवासी महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें खाली रह जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ इन वर्गों की भी पढ़ी लिखी महिलायें आगे आयी। इस निर्णय का बुनियादी लाभ यह हुआ कि महिलाओं में पढ़ाई का महत्व स्वयंसिद्ध हुआ अब शायद ही कोई अपनी बेटियों को स्कूल जाने से रोकने का साहस राजस्थान में दिखाये। पढ़े- लिखे प्रतिनिधियों खासकर महिलाओं के आगे आने से राजस्थान में एसपी राज यानि सरपंच पति राज का खात्मा देर सबेरे हो ही जायेगा। अच्छा होगा देश भर में राजस्थान मॉडल को लागू कर दिया जाये। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आधी आबादी के जरिए भारत में जिस परिवर्तन का सपना संजो रहे है वह जल्द साकार हो सके। पंचायतराज के सन्दर्भ में दूसरा काला पक्ष पिछले दस वर्षों में आयी चुनावी धनखर्ची है. म.प्र. का अनुभव यह है कि सरपंच के लिए 25-30 लाख जनपद(ब्लॉक) अध्यक्ष के लिए एक से डेढ़ करोड़ और जिला परिषद अध्यक्ष हेतु 5 से 10 करोड़ रूपयों में धनखर्ची आम हो गयी है. यदि एक ग्राम पंचायत में सभी उम्मीदवारों का खर्चा जोड़ दिया जाये तो यह एक डेढ़ करोड़ रू. कम नहीं आ रहा है. सवाल यह उठता है कि जो सरपंच 25 लाख खर्च करके सरपंची करेगा वह कैसे सामाजिक न्याय, और सामुदायिक विकास के प्रति ईमानदार होगा? ब्लॉक और जिला परिषद प्रमुख के चुनाव इस वर्ष ऐसे हुये मानों पंचायत सदस्यों की खुलेआम नीलामी बोली सजी हो। दावे के साथ कहा जा सकता है कि म.प्र. में 95 फीसदी जिला प्रमुख औसत पांच करोड़ रूपया खर्च कर अध्यक्ष बने हैं। आधे से अनुपात में यही आंकड़ा जनपद(ब्लॉक) अध्यक्षों का है। लाख टके का सवाल है कि क्या सरकारों के पास इस नीलामी बोलियों की जानकारी नहीं होती होगी? निःसंदेह हमारे बेडरूम तक की खबर रखने में सक्षम सरकारों का मुखबिर तंत्र इस नीलामी मंडियों की सूचना भी सरकारों तक देता होगा लेकिन सब चुप है तो सिर्फ इसीलिए कि इस पंचायत के चीरहरण में सब शामिल है। सत्ता के विकेन्द्रीयकरण के नाम पर आज पूरे देश में भ्रष्टाचार का भयंकर विकेन्द्रीयकरण हुआ है. इस खतरनाक स्थिति के लिए सबसे अधिक यदि जिम्मेदार है तो वह कांग्रेस पार्टी है। मैदानी अनुभव के आधार पर हम कांग्रेस सरकार द्वारा ‘महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना’ को लें जिसे हम पंचायतों में भ्रष्टाचार और चुनावी धनखर्ची की होड़ाहोड़ी के लिए जिम्मेदार ठहरा सकते है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एन.ए.सी. ने इस योजना को बनाया था मूल रूप से एन.ए.सी. एन.जी.ओ. टाइप उन वामपंथी लोगो का जमावड़ा था जिनकी निष्ठायें भारत के प्रति संदिग्ध रही है और जिन्हे दिल्ली बैठकर गांव, गरीब, किसान, मजदूर की सब जानकारी है। यह योजना व्यावहारिक रूप से पंचायत प्रतिनिधियों एवं अधिकारियों द्वारा लोकधन की डकैती का संगठित और संसदीय मॉडल है. शुरूआत के पांच साल तक तो नौकरीपेशा, एम.एल.ए., एम.पी. और मृत लोगों के नाम तक से जॉब कार्ड भर के देश भर में करोड़ों रूपया यह रैकेट खा गया। इस योजना के कागजी प्रावधानों के चलते एक भी संरचना गांवों में आज जीवित नजर नही आती है जिसका सामुदायिक विकास से कोई नाता हो। नरेगा, इंदिरा आवास, एस.जी.एस.वाय., वाटरशेड, हरियाली, बी.आर.जी.एफ., समेत तीन दर्जन योजनायें ऐसी है जो अपने प्रावधानों के चलते लोकधन की बर्वादी का जरिया बनी हुयी हैं और इन सबका आविष्कार कांग्रेस राज में हुआ है। अच्छा होगा “खाओ कमाओ” की राजनीतिक मंशा को त्याग कर हमारी सरकारें प्रधानमंत्री सड़क जैसी बुनियादी विकास योजनाओं पर जोर दें। साथ ही पंचायतों में राजस्थान मॉडल को लागू करने में इच्छा शक्ति दिखाये। पढ़े-लिखे मैदानी प्रतिनिधि शेष समाज के लिए स्वतः प्रतिस्पर्धा का निर्माण करेंगे और तब शैक्षणिक मोर्चे पर हमें कठिन चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा। साथ ही एसपी राज यानि सरपंच पति राज से मुक्ति मिल जायेगी एक पढ़ी-लिखी महिला ही सच मायनों में सशक्तिकरण की अधिकारी होती है।

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