लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


 अब कोई मायने नहीं रखता मजदूर के लिये मजदूर दिवस…………….

आज इस कम्प्यूटर युग में मजदूर को मजदूरी के लाले पडे है। आज मजदूर हर रोज सुबह शाम बढती महंगाई से परेशान है ऐसा नहीं की इस महगॅाई की जद में सिर्फ मजदूर ही आया है इस महगॉई रूपी ज्वालामुखी की तपिश में हर कोई झुलस रहा है छटपटा रहा है खाद्यान्न, सब्जी , फल, व तेलो के दाम इस एक साल में लगभग पचास प्रतिशत बढे है खाने पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ रहे है ऐसे में अगर 1 मई को मजदूर दिवस मनाये तो शाम को मजदूर के घर चूल्हा कैसे जले। रूे ही कारण है कि आज मजदूर दिवस मात्र औपचारिकता बन कर रह गया। कल तक बडी बडी मिले थी, कल कारखाने थे, कल कारखानो एंव औधोगिक इकाईयों में मशीनो का शोर मचा रहता था मजदूर इन मशीनों के शोर में मस्त मौला होकर कभी गीत गाता तो कभी छन्द दोहे गुनगुनाता था। पर आज ये सारी मिले कल कारखाने मजदूरों की सूनी ऑखो और बुझे चूल्हों की तरह वीरान पडे है। जिन यूनियने के लिये मजदूरो ने सडको पर अपना लहू पानी की तरह बहाया था उन सारी यूनियने के झन्डे मजदूरो के बच्चो के कपडों की तरह तार तार हो चूके है। फिर भी 1 मई को हम लोग अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ‘‘मजदूर दिवस ’’ का आयोजन करते है। इस दिन केन्द्र और राज्य सरकारो द्वारा मजदूरो के कल्याणार्थ अनेक योजनाये शुरू की जाती है पर आजादी के 65 साल बाद भी ये सारी योजनाये गरीब मजदूर को एक वक्त पेट भर रोटी नहीं दे सकी।

मई दिवस का इतिहास यू तो बहुत पुराना है, संघर्षों की बहुत लम्बी कहानी है दरअसल अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर मई दिवस की शुरूआत अमेरिका में हुई थी। एक दिन में आठ घन्टे काम करने का श्रमिक आन्दोलन अमेरिका में गृहयुद्व के तुरन्त बाद शुरू हो गया था। अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन ने अगस्त 1866 में अपने अधिवेशन में यह मॉग रखी कि मिल व कारखनो के मालिक मजदूरों से एक दिन में आठ घन्टे का काम ले। चूकि मालिक मजदूरो से लगातार कडी मेहनत गुलामो की तरह करवाते है जो गलत है, निरंतर काम करने से प्रायः ऐसा हो रहा है की मजदूर थकान और कमजोरी के कारण कल कारखानो में अकसर बेहोश होकर गिर जाते है। अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन की इस घोषणा से दबे कुचले गुलामो की जिन्दगी जी रहे मजदूरो को बल मिला और देखते ही देखते यह आन्दोलन पूरे अमेरिका में फैल गया तथा मजदूरो के संगठित होने के कारण शक्तिशाली होता चला गया।

उन्नीसवी शताब्दी के 9वें दर्शक में अमेरिका के लगभग सभी प्रमुख ओधौगिक शहरो में मजदूर आठ घन्टे के कार्य दिवस को अपनी मॉग प्रमुखता से उठाने लगे। मजदूरों के प्रर्दशन और आन्दोलन बढते चले गये। अमेरिका के शिकागो शहर में 03 मई 1886 को लगभग 40 हजार मजदूर अपनी मांगे सरकार से मनवाने के लिये सडकों पर उतर आये। मजदूरो के नारो से पूरा शिकागो शहर गूंज उठा देखते ही देखते प्रर्दशन उग्र हो गया। पुलिस ने बडी बेरहमी से भूखे प्यासे निहत्थे मजदूरों पर गोलियां बरसा दी इस गोलीकाण्ड में घटना स्थल पर 6 मजदूर मारे गये और 40 के लगभग घायल हुए। निर्दोष निहत्थे भूखे प्यासे मासूम मजदूरों का खून जब धरती पर बहा तो प्रदर्शनकारियों में दुगनी ताकत भर गया मजदूरों ने खून से सने अपने साथियो के कपडे उठाये और उन कपडो को परचम बना कर आसमान की तरफ लहरा दिया। तभी से खून से रंगा ये लाल झन्डा मजदूरों के संघर्ष का प्रतीक बन गया।

पुलिस द्वारा निहत्थे बेगुनाह मजदूरो पर की गई इस बर्बर कार्यवाही के मद्दे नजर 04 मई को शिकागो में मजदूरो के साथ साथ शहर की जनता ने भी एक जुलूस निकाला जुलूस के पीछे पीछे चल रही पुलिस की टुक्डी पर किसी शरारती तत्व ने देसी बम फैक दिया जिस के कारण एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई और पॉच पुलिसकर्मी घायल हो गये। इस के बाद पुलिस ने प्रदर्षनकारियो पर अंधाधुंध गोली चला दी आन्दोलन चला रहे नेताओ को पकड पकड कर फॉसी पर लटका दिया गया। इस दमनचक्र के बाद भी मजदूरो का संघर्ष जारी रहा और 1 मई 1890 में इन महान बलिदानियो की स्मृति में पूरे विश्व में ‘‘स्मरण दिवस’’ मनाने का आहवान किया गया और बाद में यह ‘‘मजदूर दिवस’’ के रूप में मनाया जाने लगा।

मजदूरो के प्रदर्शन और आन्दोलनो को देखते हुए अमेरिकी काग्रेस ने आठ घन्टे के कार्य दिवस का कानून 25 जून 1886 लगभग बीस साल मजदूरो और अमेरिकी नेशनल लेबर यूनियन द्वारा चलाये आन्दोलन के बाद संसद में पारित किया। आठ घन्टे कार्य दिवस का कानून 6 अमेरिकी राज्य विधान मंडलो में भी बनाये गये पर शुरू शुरू में मालिकों पर इस का कोई प्रभाव नहीं पडा और न ही मजदूरो को काम के घन्टो में छूट दी गई,लेकिन मजदूर एक दिन में आठ घन्टे कार्य के लिये संघर्ष करते रहे।

आज हम दफतरों ,कारखानों ,दुकानों , प्राईवेट प्रतिष्ठानों, घरो, भट्टों पर आज हम लोग आराम से आठ घन्टे छः घन्टे की ड्यूटी अन्जाम देते है। बाकी आराम या ओवर टाईम करते है। ये सही है कि इन्सान मेहनत करता है तो एक तय सीमा के बाद उस का शरीर थकने लगता है उस के काम करने की क्षमता में गिरावट आने लगती है इस के लिये ये जरूरी है कि वो थोडा आराम करे ताकि अगले दिन फिर से कार्य करने के लिये वो तरोताजा हो सके। ये ‘‘श्रमिक दिवस’’ अथवा ‘‘मजदूर दिवस’’ आखिर क्यो मनाया जाता है। इस का अर्थ आज भी असॅख्य मजदूर नहीं जानता ये दिवस कितनी कुर्बानियो के बाद हासिल हुआ इस का एहसास तक नहीं है हमे।

आज इस कम्प्यूटर युग ने मशीनों की रफ्तार तो तेज कर दी परन्तु कल कारखानो और औधोगिक इकाईयो की रौनक छीन ली मजदूरो से भरी रहने वाली ये मिले कारखाने कम्प्यूटरीकृत होने से एक ओर जहॉ मजदूर बेरोजगार हो गया वही ये इकाईया बेरौनक हो गई। या यू कहा जाये की मजदूर के बगैर बिल्कुल विधवा सी लगती है। मजदूर आज भी मजदूर है चाहे कल उसने ताज महल बनाया हो ताज होटल बनाया हो या फिर संसद भवन,उसे आज भी सुबह उठने पर सब से पहले अपने बच्चो के लिये शाम की रोटी की फिक्र होती है।

 

देश की नय्या को ये खेता हमारे देश में

हर बशर इस का लहू पीता हमारे देश में

तन से लिपटा चीथडा है पेट से पत्थर बधॉ

इस तरहा मजदूर जीता है हमारे देश में

ताज इस का है अजन्ता और एलौरा इस की है

फिर भी ये फुटपाथ पर सोता हमारे देश में।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz