लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भः- सर्वोच्च न्यायालय ने दागी सांसद – विधायकों के मामलों में तय की समय सीमा

-प्रमोद भार्गव- supreme-court1_26
विधायिका जब राजनीतिक कुनबों के दागियों पर अंकुश लगाने की इच्छाषक्ति नहीं जता पाई तो सर्वोच्च न्यायालय ने अपराधी सांसदों व विधायकों के मामले एक साल में निपटाने की समय सीमा तय कर दी। यह अनुकरणीय पहल है। अब माननीय एक साल के भीतर ही संसद और विधानसभाओं से बाहर होकर जेल के सींखचों में होंगे। इस त्वरित न्याय का एक पहलू यह भी होगा कि जिन जनप्रतिनिधियों पर झूठे मामले दर्ज हैं, वे इस तय समय-सीमा में दोश मुक्त हो जाएंगे। जाहिर राजनीति एवं निर्वाचन में सुधार की दृश्टि से आ रहे बदलावों में यह एक प्रमुख बदलाव है।
न्यायमूर्ति आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने निचली अदालतों को आगाह किया है कि सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों में आरोप तय होने से एक साल के भीतर फैसला हो जाना चाहिए। ऐसे मामलों में सुनवाई रोजाना हो। खैर, यदि अदालतें सुनवाई पूरी करने में विफल रहती हैं तो उन्हें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को वाजिब कारण बताना होगा। तभी समय-सीमा बढ़ सकेगी। शीर्ष न्यायालय ने यह आदेष ‘पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन’ नामक एक एनजीओ की जनहित याचिका पर दिया है। याचिका में कानून निर्माताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाने की मांग की गई थी। एनजीओ की दलील थी कि सांसद और विधायक अदालती कार्यवाही लंबी खिंचने के कारण संसद और विधानसभाओं के सदस्य बने रहने के साथ ऐसे कानूनों के बनाए जाने में रोड़ा अटकाते हैं, जो विधायिका की पवित्रता बहाल करने वाले होते हैं।
मालूम हो, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में दागी जनप्रतिनिधियों पर नकेल कसने की दृष्टि से दो असरकारी फैसले लिए थे। इनमें एक था, ऐसे सांसद और विधायक जिनके खिलाफ दो साल से अधिक की सजा सुनाई गई है, वे फैसले के दिन से ही अयोग्य घोषित मान लिए जाएंगे।

दूसरा था कि जेल में रहते हुए कोई आरोपी चुनाव नहीं लड़ सकता है। न्यायालय ने इस बाबत संविधान की भावना के अनुरूप दोहरे मानदण्डों को परिभाशित करते हुए सिर्फ जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को खारिज कर दिया था। लेकिन दागियों का वजूद बनाए रखने के लिए देश के सभी परस्पर धुर-विरोधी दल एकमत से अदालत के इस फैसले को संसद में अध्यादेश लाकर बदलने को तैयार हो गए थे, किंतु नाटकीय अंदाज में राहुल गांधी ने एक पत्रकार वार्ता में अचानक उपस्थित होकर दागियों को सुरक्षा कवच देने वाले इस अध्यादेश को फाड़कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया। यदि राहुल ऐसा न करते तो चारा घोटाले में सजा पाए लालू प्रसाद यादव भी लोकसभा का चुनाव लड़ रहे होते ? राहुल के इस कृत्य द्वारा संसद की सर्वोच्चता को ठेंगा दिखाने के बावजूद व्यापक लोक मान्यता और राजनीतिक स्वीकार्यता मिली थी। किंतु राहुल जैसी यह इच्छाशक्ति देश की राजनीति का स्थायी भाव न होने के कारण माननीय दागी राजनीति में भागीदारी बने हुए हैं ?
गौरतलब है कि ‘नेशनल इलेक्शन वॉच’ द्वारा 2013 में कराए एक सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा के 543 में से 162 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले निचली अदालतों में लंबित हैं। इनमें 76 यानी 14 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर और महिला उत्पीड़न से मामले दर्ज हैं। राज्यसभा के कुल 232 सांसदों में से 40 के खिलाफ आपराधिक और 16 के विरुद्ध जघन्य अपराधों से जुड़े मामले दर्ज हैं। इसी तरह कुल 4032 विधायकों में से 1238 मसलन 31 फीसदी के खिलाफ आपराधिक और 15 फीसदी के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं। अदालतों में मामले लंबे समय तक विचाराधीन बने रहने के कारण, आपराधिक पृष्ठभूमि के 65 फीसदी यही राजनेता दोबारा – तिबारा जीतकर विधायिका में अपना हस्तक्षेप बनाए रखने में कामयाब बने रहते हैं। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ के सर्वे के अनुसार 369 सांसद-विधायकों पर महिलाओं को प्रताड़ित व यौन उत्पीड़ित करने के मामले थानों में दर्ज हैं। जांच लंबित होने के कारण इनमें से कई मामलों के चालान ही अदालतों में पेश नहीं किए जा रहे हैं।
दरअसल, हमारे यहां विडंबना यह है कि अपराध भी अपराध की प्रकृति के अनुसार तय न किए जाकर, व्यक्ति की हैसियत के मुताबिक पंजीबद्ध किए जाते हैं। व्यक्ति की पद व पहुंच के प्रभाव से ही मामला कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरता है। इसीलिए कभी-कभी तो यह भी अहसास होने लगता है कि यह वैधानिक प्रक्रिया दोषी ताकतवर को निर्दोष साबित करने की मानसिकता से आगे बढ़ रही है। यही वजह है कि दागी छवि वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती रही है। ऐसे में देश के आम आदमी की मानसिकता में यह भ्रम भी बना रहता है कि राजनीति का आपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण ? जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले से दुर्निवार व संशय के हालात एक साल के भीतर निराकरण के अंजाम तक निचली अदालतों द्वारा पहुंचा दिए जाएंगे।
इस परिप्रेक्ष्य में गौरतलब यह भी है कि अदालतों द्वारा दोषी ठहराए जाने वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या बेहद कम होती है। जबकि लंबित प्रकरणों की संख्या ज्यादा होती है। शक्तिशाली राजनेताओं से जुड़े होने के कारण इनमें से अधिकांश मामले तो पुलिस जांच प्रक्रिया में ही अटके रहते हैं, जो अदालत तक पहुंच भी जाते हैं, उन्हें ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ में वैकल्पिक धाराओं को आधार बनाकर लंबा खींचने का काम धनबल के बूते चलता रहता है। कभी-कभी सुप्रीम और हाईकोर्ट के विरोधाभासी फैसलों की आड़ में भी दागियों को बचा लिया जाता है। ये फैसले न्यायिक प्रक्रिया में रुलिंग का काम करते हैं। तय है, कानूनी विकल्प मामलों को दीर्घकाल तक खींचने का काम करते हैं। लिहाजा जरूरी है कि वैकल्पिक कानूनों को भी एक सीधी रेखा में परिभाशित किया जाए, क्योंकि इन विकल्पों का लाभ उठाकर जनप्रतिनिधि अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल हो जाते हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था में भी यह प्रावधान है कि जब तक दोषी पर दोष सिद्ध न हो जाए तब तक उसे निर्दोष माना जाए।
चुनाव सुधार से जुड़ा अदालत का यह फैसला ठीक उस वक्त आया है, जब निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा तो शुरू कर दी गई है, लेकिन अभी उम्मीदवारों द्वारा आवेदन भरने का सिलसिला शुरू नहीं हुआ है। हालांकि कुछ दलों द्वारा प्रत्याशियों के नामों की घोशणा जरूर कर दी गई है। गोया राजनीतिक दलों को इस फैसले को एक अवसर के रूप में भुनाने की जरूरत है। वे दागियों की इस आदेश के आधार पर उम्मीदवारी खारिज कर सकते हैं। आखिर फैसला एक साल के भीतर आ ही जाना है तो संदिग्ध प्रतिनिधि संसद और विधानसभा में क्यों भेजा जाए ? दल ऐसा करने का साहस दिखाते हैं तो दो फायदे एक साथ होंगे। एक तो सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान बरकरार रहेगा, दूसरे विधायिका से दागी बाहर होते चले जाएंगे। ऐसा होता है तो राजनीतिक दलों के प्रति आम आदमी का भरोसा बढ़ेगा।

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1 Comment on "त्वरित न्याय के दायरे में माननीय"

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mahendra gupta
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संसद तो ऐसा निषेधात्मक बिल कभी पारित करेगी नहीं, उससे उम्मीद करना व्यर्थ ही होगा यह काम तो जुडिसिरी को ही करना होगा सांसद तो अपने पांवों में कुल्हाड़ी मारने से रहे सभी दलों का यही हाल है

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