लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

लगता है, उत्तर प्रदेश के नेताओं को वर्ष 2011 को बेसब्री से इंतजार था। नया साल शुरू होते ही प्रदेश में राजनैतिक सरगर्मियां एकदम तेज हो गई हैं। छोटे-बड़े सभी दलों में मैराथन बैठकों का दौर चल पड़ा है। चार साल तक ‘आराम’ करने के बाद अचानक विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को जनता की सुधि आई तो मतदाता भी मौके की नजाकत भांप कर नखरने दिखाने लग गया। जनता से करीबी दिखने के लिए गॉव की चौपाल से लेकर शहर की नुक्ड़कों तक पर नेताओं के चेहरे देखे जा सकते हैं। चेहरा नहीं तो पोस्टर से ही काम चलाने वालों की भी कमी नहीं है,लेकिन नेताओं और मतदाताओं के बीच विश्वास की जो खाई पिछले कई सालों से गहरा रही थी,वह कम होने के बजाए चौड़ी ही होती जा रही है।

नेताओ की तेजी के संद्रर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि अगर शहर से लेकर गांव तक में नेताओं के बैनर-पोस्टर लगाने पर टैक्स लगा दिया जाए तो निश्चित ही सरकार का राजस्व मालामाल हो जाएगा। अपने-अपने हिसाब से जनता को लुभाने या कहा जाए बेवकूफ बनाने का खेल जो शुरू हो गया है। भाजपा जहां अयोध्या से आगे निकल कर मंहगाई, आकंवाद और भ्रष्टाचार के बहाने केन्द्र और प्रदेश की माया सरकार को घेरने में लगी है, वहीं कांग्रेस के पास प्रदेश सरकार की आलोचना करने का कोई ठोस मुद्दा नहीं है। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को पता है कि भले ही केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन सरकार हो लेकिन उसके कारनामों की चर्चा आगामी विधान सभा चुनाव में हो गई तो जितनी सीट आने की उम्मीद हैं उसकी आधी हो जाएंगी।बिहार चुनाव के बाद कांग्रेसियों को अपने चमत्कारी युवराज पर भी ज्यादा भरोसा नहीं रह गया है।

भाजपा और कांग्रेस तो राष्ट्रीय दल हैं,उनकी उत्तर प्रदेश में भले ही सरकार न हो लेकिन देश के अन्य राज्यों में तो उनका राज चल ही रहा है,लेकिन समाजवादी पार्टी के लिए तो उत्तर प्रदेश से ही सहारा है। अगर बहत्तर वर्षीय मुलायम को अबकी सत्ता हासिल नहीं हुई तो उनके लिए आगे कुछ करने को शायद ही बचे। एक तरफ उम्र का तकाजा और दूसरी तरफ पुराने संगी-साथियों का सपा से किनारा कर लेना यह दो ऐसे मुद्दे हैं जो मुलायम के लिए 2012 में ‘भारी’ साबित हो सकते हैं। आज स्थिति यह है कि उनकी पार्टी परिवार तक ही सीमित होकर रह गई है। पार्टी में करीब-करीब सभी महत्वपूर्ण पदों पर उनके परिवार के लोग ही बैठे हैं। मुलायम अपने को पिछड़ों और मुसलमानों का नेता समझते थे लेकिन इस समय वह दावे से यह नहीं कह सकते हैं कि उनके साथ कौन खड़ा है।

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2012 के बारें में एक बात खुलकर कही जा रही है कि अबकी बार के विधान सभा चुनावों में कुछ सीटों को छोड़कर कहीं भी जातिपात का कार्ड नहीं चलेगा। फैसला माया सरकार के काम करने के तौर तरीकों पर होगा। बात विकास की भी चलेगी और भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठेगा, लेकिन मुलायम हैं कि मंदिर-मस्जिद की राजनीति से ऊपर ही नहीं उठ पा रहे हैं। उनके ऊपर तो मानों मुल्ला मुलामय बनने का भूत सवार हो। सत्ता की दूरी ने उनका विवेक हर लिया है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक एक ही राग में अलापने से उनकों करीब से जानने समझने वाले भी काफी हैरान हैं। मुसलमानों को लुभाने के लिए वह ऐसे-ऐसे मुद्दों को हवा दे रहें हैं जिसकी जरूरत मुसलमान भी नहीं समझता हैं। मुलायम का अयोध्या कांड से काफी करीबी नाता रहा है। इस विवादित मुद्दों को हवा देने का काम जितना कांग्रेस-भाजपा ने किया उससे कम हाथ मुलायम का भी नहीं रहा। इस मसले पर वह कभी अदालत के फैसले का सम्मान करने की बात कहते तो कभी इसे मुसलमानों में भय पैदा करने वाला बता देते। हद तो तब हो गई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया। हिन्दू-मुस्लमान दोनों ने ही इसे सहजता से यह सोच कर स्वीकार कर लिया कि जो पक्ष संतुष्ट नहीं होगा,उसके लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता है,लेकिन मुलायम ने अदालत के आदेश ठेंगा दिखाते हुए कह दिया कि इस फैसले से देश का मुसलमान ठगा रह गया। मुलायम को उम्मीद थी कि उनके इस बयान से मुसलमान उनके साथ हो जाएगा लेकिन हुआ इसके उल्ट। उल्टे मुसलमान ही पूछने लगे कि वह अमन-चैन क्यों बिगाड़ना चाहते हैं।मुलायम को समझते देर नहीं लगी कि पासा उल्टा पड़ गया है,इसलिए उन्होनें तुरंत चुप्पी का लबादा ओड़ लिया। इससे पहले मुलायम कल्याण को साथ लेने के लिए मुसलमानो से माफी मांग कर चर्चा बटोर चुके थे।

मुलायम के लिए परेशानी की बात यह है कि माया सरकार ऐसा कुछ नहीं कर रही है जिसके आधार पर वह मुसलमानों के हमदर्द बन सके। आजम की वापसी भी इसी लिए हुई थी,लेकिन यह तीर भी निशाने पर नहीं बैठा।अब जबकि उनके हत्थे कुछ नहीं आया तो वह दिल्ली के जंगपुरा स्थित नूर मस्जिद को ध्वस्त करने के मामले को हवा देने में लग गए जिसे अदालती आदेश के बाद गिराया गया था। मस्जिद दिल्ली मे गिरी लेकिन मुलायम ने आश्चर्यजनक रूप से प्रेस कांफे्रस लखनऊ में करके इसका विरोध जताया। इतना ही नहीं उन्होंने इस घटना को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस से जोड़ दिया।शायद उन्हें इस बात का अहसास था कि नूर मस्जिद भले ही दिल्ली में गिरी हो लेकिन इसका विरोध अगर वह दिल्ली की बजाए लखनऊ में करेगें तो उसका असर मुस्लिम समाज पर ज्यादा पड़ेगा।नूर मस्जिद विवादित थी,इसी लिए गिराई गई थी। इस मस्जिद की तरह पहले भी हिन्दू-मुसलमानों-सिख-इसाइयों के धार्मिक स्थलों को किसी न किसी वजह से गिराया जाता रहा ह। भारत ऐसा कोई अकेला देश नहीं है। अरब देशों के साथ-साथ करीब-करीब सभी देशों की सरकारें अपने विकास के एजेंडे को पूरा करने के लिए इस तरह के फैसले लेती रहती हैं,लेकिन इतनी सी बात मुलायम के समझ में नहीं आती। उनका यह कहना कि नूर मस्जिद गिरा कर दिल्ली सरकार ने भारतीय संविधान मे मुसलमानो के अपनी संस्कूति और भाषा को सुरक्षित रखने के मौलिक अधिकार का हनन किया है ,न केवल गैरजिम्मेदाराना है बल्कि उकसाने वाला भी है।

समय आ गया है कि मुलायम अपने राजनैतिक चश्में का नंबर बदलें,ताकि उनको जमीनी हकीकत का पता चल सके। लगता ऐसा है कि ‘धरती पुत्र’ मुलायम का जमीनी राजनीति से नाता टूट गया हैं।उनकी ‘हल्ला बोल’ स्टाइल की धमक अब कहीं सुनाई और दिखाई नहीं देती। प्रेस नोट के सहारे राजनीति करने वाली भाजपा का हश्र देखने के बाद भी अगर किसी नेता या दल की आंखे न खुले तो इसका मतलब यही लगाना चाहिए कि उसके लिए भी आगे की राजनीतिक राह आसान नही होगी।माया सरकार की कई विफलताओं ने प्रदेश की जनता का जीना मुहाल कर रखा है,लेकिन उन मुद्दों को उछालने के बजाए मुलायम ‘मुल्ला मुलायम’ बनकर शार्टकट से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने का सपना देख रहें हैं जो पूरा होने वाला नहीं लगता है। यूपी विधान सभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर रही है, लेकिन प्रत्याशियों के चयन का तरीका घिसा-पिटा जातिगत समीकरणों वाला ही है।माया जहां सर्वसमाज की बात कर रही हैं,वहीं मुलायम एक वर्ग विशेष तक ही सिमटे हुए हैं। मुलायम को अगर मजबूती के साथ 2012 के विधान सभा चुनाव में दस्तक देना हैं तो उन्हें ध्यान रखना होगा कि वह वो गलतियां न दोहराएं जिसके चलते उनकी सत्ता चली गई थी।

मुलायम शासनकाल की याद आते ही एक ऐसा नक्शा उभर कर आता है,जहां बाहुबलियों और अराजक तत्वों का बोलबाला था और मुलायम प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष रूप से उनके संरक्षणदाता बने हुए थे। यही वजह थी कई मोर्चो पर अच्छा काम करने के बाद भी प्रदेश की जनता ने कानून-व्यवस्था के बिगड़े हालात के चलते उनसे तौबा कर ली थी।माया ने भले ही 2007 में सत्ता तक पहुंचने के लिए कई दागियों का सहारा लिया था,लेकिन एक बार मजबूत स्थिति में आने के बाद उन्होंने अपनी छवि सुधारने में देर नहीं लगाई। बसपा के दागी नेताओं से या तो उन्होंने किनारा कर लिया या फिर उनके जेल में डाल दिया।तमाम कानूनी-कायदों की धज्जियां उड़ाने के बाद भी मायावती अपने शाासनकाल में लगातार जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल रहीं कि प्रदेश में कानून से ऊपर कोई नहीं है। मात्र चार-पांच बसपा नेताओं को उनकी आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ जेल की सलाखों के पीछे भेजकर माया न केवल प्रदेश की जनता बल्कि मीडिया को भी लुभाने में सफल रहीं।

बात कानून व्यवस्था के बाद सबसे जवलंत मुद्दे मंहगाई की कि जाए तो, इसके कोई संदेह नहीं हैं कि मंहगाई ऐसा मुद्दा है जिसके लिए केन्द्र और राज्य सरकार बराबर की दोषी होती हैं,लेकिन बसपा सरकार ने ऐसा चक्र चलाया कि मंहगाई का सारा ठीकरा केन्द्र के सिर पर फूट गया और माया सरकार पाक-साफ निकल गई।जबकि माया सरकार चाहती तो जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ अभियान चला कर न केवल मंहगाई के मुद्दे पर केन्द्र की मदद कर सकती थी, प्रदेश की जनता को भी इससे राहत मिलती लेकिन इस मुद्दे पर एक बार भी समाजवादी पार्टी ने बसपा सरकार को घेरने की कोशिश नहीं की। हो सकता है कि यह उनकी राजनैतिक मजबूरी हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीतिक मुकाम हासिल करने के लिए कुछ कड़वे घूंट भी दवा समझ कर पीने पड़ते हैं।

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1 Comment on "सपा की सोच में खोट"

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अहतशाम "अकेला"
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अहतशाम "अकेला"

सपा की सोच में खोट के साथ साथ आपकी सोच में भी खोट नज़र आया
लेख को सही दिशा देने के बाद लेखक महोदय भटक गए
बेचारे मुलायम के खिलाफ ज़हर उगलना शुरू कर दिया
लेख संतुलित होता तो अच्छा लगता
(धन्यवाद)

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