लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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-गिरीश पंकज

इधर कुछ दिनों से संवेदनशील कुत्ते अपनी मानहानि की बढ़ती घटनाओं से बहुत दुखी थे।

कुछ कुत्ते तो आदमी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की तैयारी भी करने लगे। मुझे किसी ने बताया, कि पिछले दिनों दिल्ली में कुत्तों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन भी हो गया, जिसमें आम कुत्तों ने शिरकत की। खास कुत्तों ने सम्मेलन का बायकाट कर दिया क्योंकि उन्हें आदमजात से कोई शिकायत नहीं। महल में रहने वाले एक कुत्ते से जब सड़क के कुत्ते ने संपर्क किया तो महली कुत्ते ने कहा, कि ” भाई मेरे, इतना सुखी जीवन छोड़ कर मैं बाहर नहीं निकल सकता। देखो, मेरी सुंदर मालकिन मुझे कितना चाहती है। अपने बच्चे की फिक्र नहीं करती और मुझे नहलाती-धुलाती रहती है। उसका बच्चा नौकरानी के साथ खेलता है और मैं अपनी मालकिन के साथ कार में दुनियाकी सैर करता हूँ। वह मुझे अपने साथ सुलाती है, खिलाती है, सहलाती है। मैं भी उसे प्रेम से चाटता हूँ। उसकी गोद में ही बैठे रहता हूँ। इतने सुखी जीवन को छोड़कर मैं बाहर नहीं आ सकता।”

दूसरे महली कुत्ते ने कहा- ”मैं भी तुम लोगों के साथ नहीं जा सकता क्योंकि मेरा मालिक मुझे इंसानों की तरह चाहता है और अपने बच्चों से कुत्तों जैसा व्यवहार करता है।”

खैर महलों में रहने वाले कुत्ते सम्मेलन में शामिल नहीं हुए लेकिन सड़कों पर घूमनेवाले कुत्तों ने अपनी एकजुटता दिखाई और मनुष्यों के खिलाफ जम कर भड़ास निकाली। उसने कहा-माना कि हम कुत्ते हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आदमी जब-तब उन पर टाँग उठाता रहे। आदमी अपनी बिरादरी को गरियाने के लिए हम कुत्तों का सहारा क्यों लेता है? हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। आदमी हैं तो आदमी की तरह रहें। कुत्तापन न दिखाए। ये क्या तमाशा है कि जिसे देखो हमारे खिलाफ जुमले कसता रहता है। हद होती है। पिछले दिनों एक नेता दूसरे नेता के बारे में कह रहा था कि वह कुत्ते की तरह बड़े नेताओं के तलवे चाटता है। अरे भाई तलवे चाटना क्या बुरा काम है। इससे तलवे साफ हो जाते हैं,गुदगुदी भी लगती है। मनोरंजन हो जाता है। एक तरह से हम बड़ा काम करते हैं और आदमी इसे छोटा काम समझता है।”

एक दूसरे कुत्ते ने कहा- ” ये आदमी कहता है कि कुत्ते की तरह क्यों भौंक रहे हो? अरे हमारा भौंकना भी अब मनुष्य का नागवार गुजर रहा है। हम कुत्ते हैं। हमारा काम ही भौंकना है। दरअसल हम गलत लोगों पर भौंकते हैं इसलिए आदमी हमसे नाराज रहता है। वह जब किसी आदमी पर गुस्सा निकालता है तो कहता है कुत्ता कहीं का। अब हम कहेंगे आदमी कहीं का। हम आदमी से बदला ले के रहेंगे।”

सभा में एक शरीफ कुत्ता भी था, उसने कहा, ” देखो बंधुओ, तुम लोग आदमी जैसी हरकतें मत करो। आदमी के भीतर एक साथ कई जानवर विचरते हैं। वह कभी भेडिय़ा हो जाता है,कभी साँप, कभी सियार, कभी लोमड़ी। सुअर भी बन जाता है। तो हमें आदमी नहीं बनना। हम कुत्ते ही बने रहे और अपने धर्म का निर्वाह करें।”

”तो हमारा धर्म क्या है?” एक जूनियर कुत्ते ने पूछा।

इस पर शरीफ सीनियर कुत्ते ने कहा-” हमारा धर्म है जो गलत लोग हैं, उन पर भौंकना। जो हमें रोटी दे,उसकी हिफाजत करना। रात को चोरों से घरों की सुरक्षा करना। यहीं तो हम आदमी से अलग हैं। वह जिस थाली में खाता है,उसी में छेद कर देता है। जो उसकी मदद करता है, उसी की जान ले सकता है। उसी के खिलाफ साजिश करता है। आदमी दुनिया का सबसे खतरनाक जानवर है और वह हमारे खिलाफ टिप्पणियाँ करते रहता है? इसलिए हमें उसके खिलाफ आज प्रस्ताव पास करना ही चाहिए।”

” भौं…भौं…भौं….”

सबने एक साथ चिल्लाना शुरू कर दिया। इस पर शरीफ कुत्ते ने जोर से आवाज लगाई-” खामोश, यह कोई संसद भवन नहीं है,जहाँ आदमी कुत्तों की तरह चिल्लाता रहता है। यह हम कुत्तों की सभा है यहाँ हम आदमी की तरह हरकत न करें।”

” श्रीमान, आपकी बात पर मुझे आपत्ति है। आपने ये क्यों कहा कि आदमी कुत्ते की तरह चिल्लाता है?आप अपने शब्द वापस लें।”

सारे कुत्ते चिल्ला पड़े-”’ हाँ, अपने शब्द वापस लो, वापस लो.”

शरीफ कुत्ते को लगा कि बात तो ठीक है। उसने फ़ौरन अपने शब्द वापस लिए और कहा,” मैं अपना वाक्य सुधार लेता हूँ। आदमी संसद में आदमी की तरह चिल्लाता है। अब तो खुश?”

सारे कुत्तों ने खुश हो कर तालियाँ बजाईं। फिर बारी-बारी से सारे कुत्तों ने अपने-अपने विचार रखें।

सभा समाप्त हो रही थी। अंत में एक प्रस्ताव पारित किया कि भविष्य में अगर किसी भी आदमी या नेता ने हम कुत्तों का उदाहरण दे कर हमें अपमानित करने की कोशिश की तो हम सारे कुत्ते उसके घर के सामने टाँग उठाकर अपना प्रतिवाद दर्ज करेंगे। और उसको घर के बाहर ही नहीं निकलने देंगे। हम कुत्तों का भी सम्मान है। हमारे सम्मान में अगर आदमी ने कोई गुस्ताखी की, तो हम उसे काट खाएँगे। हालांकि कुछ गाँधीवादी कुत्तों ने इस प्रस्ताव को विलोपित कर दिया। वे चाहते थे,कि विरोध अहिंसक किस्म का हो। हम मनुष्य पर केवल भौंके,उसे काटें नहीं। सब लोग इस बात से सहमत थे। आदमी जैसी हरकत न करें और अपनी अलग पहचान बनाएँ। जब आदमी जानवरों-सी हरकतें कर रहा है, तो हम लोग अच्छे मनुष्यों की तरह हरकत करके उसे करारा जवाब दे सकते हैं।

और अंत में ”’दुनिया के कुत्तों एक हों” के नारे के साथ सम्मेलन समाप्त हो गया।

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5 Comments on "व्यंग्य/कुत्तों की मानहानि…….."

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बी एन गोयल
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व्यंग के माध्यम से उधेडी गयी एक कटु वास्तविकता – लेखक बधाई के पात्र

braj kishore singh
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अद्भुत.

sunil patel
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बहुत खूब.

भारत भूषण
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गिरीश जी,
साधूवाद, बहुत ही अच्छा व्यंग्य. पढ़ कर मज़ा आ गया

पंकज झा
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गंभीरली कह रहा हूं सर…..कुत्तों को अपने अपमान का बदला लेना ही होगा. मेनका जी कहाँ हैं आप? इस नए सर्वहाराओं की लड़ाई में कूद जाना चाहिए आपको…इस वर्ग युद्ध में मेनका जी को ही बनना है मार्क्स, माओ और मेकाले. …. !

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