लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

बहुत पुरानी बात है। एक रानी के दरबार में राजा नामक एक मुंहलगा दरबारी था। रानी साहिबा मायके संबंधी किसी मजबूरी के चलते गद्दी पर बैठ नहीं सकीं। बेटा छोटा और अनुभवहीन था, इसलिए उन्होंने अपने एक विश्वासपात्र सरदार को ही गद्दी पर बैठा दिया। वे उस राज्य को महारानी की कृपा समझ कर भोगने लगे। वे हर दूसरे-तीसरे दिन जाकर महारानी को सलाम बजाते थे। परदे के आगे सरदार साहब और पीछे महारानी। इस तरह राजकाज चलने लगा।

वह राजा नामक दरबारी था तो बहुत भ्रष्ट; पर मुंहलगा होने के कारण सब चुप रहते थे। महारानी और सरदार साहब के कई भेद उसके पास थे, इसलिए उसे हटाना कठिन था। कहते हैं कि वे अपनी गद्दी के लिए भी उसकी करुणा रूपी निधि पर निर्भर थे। इसलिए कुछ करना तो दूर, उसे कुछ कह भी नहीं सकते थे।

राजा था तो बुद्धिमान; पर वह अन्य दरबारियों की अपेक्षा कुछ अधिक ही भ्रष्ट था। महारानी के सुझाव पर सरदार साहब ने कई बार उसका काम और स्थान बदला; पर वह हर बार गोलमाल करने के तरीके निकाल लेता था। महारानी भी उससे दुखी थीं; पर मजबूरीवश कुछ कर भी नहीं सकती थीं।

जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा, तो सरदार साहब ने उसे समुद्र के किनारे बैठकर आती-जाती लहरें गिनने में लगा दिया। कुछ दिन तो वह चुपचाप वहां बैठा; पर फिर अपने बुद्धिबल से उसने वहां भी पैसा वसूलने का रास्ता खोज लिया।

राजा सुबह-सवेरे ही कागज-कलम लेकर, कुर्सी-मेज डालकर समुद्र के किनारे बैठ जाता। दिखाने के लिए वह कागज पर कुछ लिखता भी रहता। उसने जलयानों और नौकाओं के लिए नियम बना दिया कि वे तट से एक किलोमीटर दूर ही लंगर डालें, जिससे लहरों के गिनने वाले शासनादेश का पालन हो सके।

इस आदेश से जलयान और नाव वालों को बड़ी परेशानी हो गयी। यदि वे तट पर नहीं आएंगे, तो माल और यात्रियों को कैसे उतारे या चढ़ायेंगे। उन्होंने राजा को बहुत समझाया कि यह आदेश अव्यावहारिक है, इसे वापस ले लें; पर राजा को तो अपना मतलब हल करना था।

कई दिन तक दोनों पक्ष बहस करते रहे; पर राजा पीछे हटने को तैयार नहीं था। उसका कहना था कि उसे लहरें गिनने को कहा गया है और जलयान या नौकाओं के किनारे आने से होने वाली उथल-पुथल से इसमें बाधा पड़ती है। इसलिए उन्हें किनारे से दूर रह कर ही अपना काम करना होगा।

आखिर दोनों ने मिलकर बीच का रास्ता निकाला। राजा को हर जलयान और नौका से माल और यात्रियों की संख्या के अनुसार कुछ राशि मिलने लगी। इससे वे तट तक आने लगीं। राजा के साथ-साथ उसके कागजों का पेट भी भरने लगा। महारानी की गद्दी सुरक्षित हो गयी, तो उन्होंने भी आंखें बंद कर लीं। विपक्षियों ने फिर शोर मचाया; पर महारानी कुछ सुनने को तैयार नहीं थीं। हंगामा होता रहा, राज चलता रहा।

ऐसी ही कहानी इन दिनों दिल्ली में भी सुनी जा रही है। उस राजा ने लहरें गिनकर पैसे बनाये थे, तो इस राजा ने हवा की तरंगें बांटकर ही नोट बना लिये। इसमें से उसे, सरदार जी और महारानी को क्या मिला, यह तो वे जानें; पर देश के खजाने से खरबों रु0 लुट गये। विपक्ष सदा की तरह इस बार भी शोर मचा रहा है; पर उसकी दाल को भी काली देखकर प्रजा चुप है।

हाथ हिलाकर हवा में से ही भभूत या मिठाई निकालने वाले बाबा सबने देखे होंगे। लोहा और कांच खाने वाले मदारी भी सड़क पर तमाशा करते मिल जाते हैं; पर ऐसा जादूगर तो आज तक नहीं देखा, जिसने हवा में से नोट कमा लिये हों।

संस्कृत में कहावत है यथा राजा, तथा प्रजा। अंग्रेजी में कहते हैं – People get the government, they deserve. इन दोनों को मिलाकर चूल्हे पर संसद के शून्य सत्र की तरह 22 दिन तक पकाएं। इससे जो व्यंजन बनेगा, वही वर्तमान परिदृश्य है।

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