लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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sweet-हे मेरे देश के दीवाली के दिन राम के चौदह बरस का बनवास काट कर आने की खुशी में रात भर जुआ खेलने वाले जुआरियो! हे मेरे देश के दीवाली के नाम पर मातहतों का गला काट कर गिफ्टों के नाम पर शूगर के पेशेंट होने के बाद भी अपना घर मिठाइयों से भरने के बाद उन्हें पुन: हलवाइयों के पास उसी रेट में बेचने वाले परमादरणीय अफसरो! हे मेरे देश के आदरणीय नकली मिठाइयां राम के सकुशल लौट आने की खुशी में जनता को सीना चौड़ाकर बेचने वाले हलवाइयो! आप सभी को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होगी कि यद्यिप मेरे पास आटा दाल को खरीदने के बाद न तो जुआ खेलने के लिए अबकि दीवाली को पैसे बचे थे और न ही मैं अपने साहब को मिठाई का डिब्बा ही अगली दीवाली तक सेफ रहने के लिए ले जा सका। फिर भी मैंने अबके दीवाली धूमधाम से मनाई। जैसे अबके बरस साहब को झेला, अगले बरस भी झेल लूंगा। झेलना ही अब मेरी नियति है। मेरे तो साहब ही साहब हैं मसलन- पानी वाले साहब, बिजली वाले साहब, टेलीफोन वाले साहब, गैस वाले साहब, मुहल्ले में सफाई करने आने वाले साहब । असल में क्या है न कि अब मुझे हरेक को झेलने की आदत सी पड़ गई है। जो दिन बिना किसी को झेले निकल जाए तो लगता है जैसे आज कम्बखत दिन जिआ ही नहीं।

अबके अकेले ही राम के आने की खुशी में नकली घी के दीए जला रहा था कि सच्ची को राम आ धमके। बेटा पत्नी और बेटी जो लक्ष्मी के स्वागत के लिए दरवाजे से मेरी पैंट के पर्स तक रंगोली बना रहे थे ने रंगोली बनाते बनाते जोर से आवाज दी,’ सुनते हो, कोई आंगन में आया है।’

मैं चौंका! कौन हो सकता है? दीवाली को मेरे घर कौन आने की हिम्मत कर सकता है? आज तो हरेक के घर जाने का हक मेरा ही बनता है खीलें बताशे लेकर । सच कहूं! ये हल्की फुल्की और ऊपर से ईमानदारी से होने वाली नौकरी नौकर को कहीं का भी नहीं छोड़ती।

मैंने थाली में रखे दीए वहीं रखे और बाहर आ गया। देखा तो पहचानते देर न लगी। राम! हाय राम। राम लौट आए! पर अकेले ही। साथ में न लक्ष्मण न सीता। चलो राम तो आए! मेरे लिए ये ही क्या कम था। साथ में लक्ष्मण ,सीता होते तो सच कहूं उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता।

परिवार के लोग वैसे ही सब कुछ भुला तन्मयता से लक्ष्मी के स्वागत के लिए रंगोली बनाने में जुटे रहे यह जानते हुए भी कि हमारे वर्ग वाले लक्ष्मी के स्वागत के लिए कितनी ही तैयारियां क्यों न कर लें, वह कुलमिलाकर आज तक जाती साम्यवादियों के यहां ही रही है और हमारे वर्ग वालों के हाथ लाले से उधार लक्ष्मी के पूजन के लिए लाई सामग्री के सिवाय और कुछ न आया है।

‘धन भाग हमारे जो आज आप पार्टी की लक्ष्मण रेखा तोड़ मेरे घर पधारे। मेरा तो आज रिश्वत न लेना सफल हो गया।’ कुछ कहने के बदले वे मंद मंद मुस्कराते रहे । अचानक मेरी नजर उनके खाली तरकश पर पड़ी तो मैंने फिर पूछा, ‘भगवन!, ये तरकश खाली क्यों? मंहगाई का दौर या तीसरे विश्वयुध्द से बचने के लिए ?’

‘सुनो दोस्त! मैं किसी भी युध्द के लिए उत्तरदाई नहीं। उत्तरदाई तो तुम हो।’

‘तो ये तरकश खाली क्यों?’

‘मेरी पार्टी ने आपस में ही एक दूसरे पर तीर चला मेरा तरकश खाली कर दिया है।’ कह वे उदास हो गए। उदासी भी इनकी सच्ची थी साहब! जिन से उम्मीद हो और वे ही आपस में घमासान छेड़े हों तो उदास तो मन हो ही जाता है। आखिर उनके पास भी तो दिल है। क्या हुआ जो भगवान हैं!

‘चलो अंदर बैठो।’ मैंने कहा तो वे मुकर गए,’ नहीं अभी नहीं। अभी तो तुम लोग लक्ष्मी के स्वागत में व्यस्त हो। मैं तो यहां से गुजर रहा था, तुम दीए जलाते दीखे तो सोचा तुमसे मिलता चलूं।’

‘तो कहां जा रहे हैं आप? मेरे साहब के घर?’

‘मैं अब ब्रांड अंबेसडर होने जा रहा हूं!’ उन्होंने कहा तो मेरे सिर के ऊपर से आसमान सरका। पैरों के नीचे से जमीन तो बहुत पहले ही सरक चुकी थी।

‘कल ब्रांड अंबेसडर गणेश मिले थे, बेचारों के पास सांस लेने को भी वक्त नहीं। बाजार ने उन्हें पचासों ब्रांडों का ब्रांड अंबेसडर बना उनको माल बेचने का जिम्मा सौंप रखा है। यही हाल लक्ष्मी का भी है। पिछले हफ्ते मिली थीं, निवेदन किया था कि अबके लक्ष्मी पूजन को मेरे घर आना तो बेचारी असहाय हो बोलीं, ‘सारी! माफ करना लक्ष्मीनंद! आऊं कहां से? ये सामान देख रहे हो! पूरा कलिजुग बेचूं तो भी खत्म न हो। बाजार ने तो मेरी भूख प्यास सब छीन दी है। सोते सोते भी ग्राहकों को ही ढूंढती रहती हूं।’ बाजार को मस्त मौला शिवजी के हाथों में कुछ और थमाने को बाजार को न मिला तो उसने उनको ब्रांडेड धूप का ब्रांड अंबेसडर बना उनके हाथों में धूप थमा दिया मतलब! फिल्मी नायक नायिकाओं से काम न बना तो अब अवतार के सुपुर्द बाजार। एक तरफ सरकार धूम्रपान पर पाबंदी लगाती है तो दूसरी ओर अपनी कंपनी की शक्ति से बीड़ियां पिलाती है। अब जब अवतारी बाजार की जकड़ में आ ही गए तो आपको भी बधाई। पर क्या बेचोगे आप?? मर्यादाएं, आदर्श, मूल्य….. ‘

‘धार्मिक टूरिज्म को विकसित करने का जिम्मा दे रहे हैं मुझे। दे पाऊंगा क्या मैं उन्हें बिजनेस??’

‘तो मेनका कब बाजार में ब्रांड अंबेसडर होकर आ रही हैं??’

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