लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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साहब जी! जीव इस धरती पर आकर, जनसेवक हो अगर अपने मंदिर न बनवा पाए तो नरक को जाए, इसी डर से उन्होंने जनसेवा के सारे काम छोड़ जनता की पेट पर जन सेवा के बहाने लात मार गली-गली शौचालयों के बदले अपने मंदिर बनवा डाले तो स्वर्ग का रास्ता दिखा। उनको लगा कि उनका चुनाव जीतना अब सार्थक हुआ। कहते तो वे ये रहे कि ये मंदिर उन्होंने सेल्फ फाइनांस स्कीम के अंतर्गत बनवाये हैं ताकि जो गरीब सचिवालय न पहुंच सकें वे वहीं उनकी पूजा कर पुण्य प्राप्त कर लिया करें जिससे देश के धन- बल का नुकसान न हो। जनता खुले आसमान तले हो, मंदिरों में उनकी मूर्तियां स्थापित हो रही हों तो ऐसे में पूजा करने का अपना ही स्वर्गिक आनंद होता है!

उनके मंदिरों की अटूट शृंखला के अंतर्गत आज उनके भव्य मंदिर का लोकार्पण होना था। शुभावसर पर देवलोक से सभी आदि- अनादि देवाताओं को सादर आमंत्रित किया गया था। राजधानी के सारे सरकारी-गैर सरकारी गेस्ट हाउस मुख्य अतिथियों के लिए बुक हो चुके थे। सरकारी खजाने से सभी अखबारों में सरकार की इस उपलब्धि के हफ्ते भर से पूरे पेज के विज्ञापन चल रहे थे ताकि विपक्ष के जो देवता गलती से छूट रहे हों वे विज्ञापन देख कर कार्यक्रम में आने की कृपा कर सरकार की जनता के प्रति आस्था को देख सरकार को आशीर्वाद देने के लिए विवश हो उठें। विपक्ष को उंगली उठाने का कोई सुअवसर तो सुअवसर, अवसर भर न मिले। देवताओं को भी पता चल जाए कि आज की सरकार उनसे किसी भी मायने में पीछे नहीं है।

निमंत्रण पा शिव- पार्वती भी हिमालय को छोड़ सरकार के इस कार्यक्रम में आ पहुंचे। पार्वती ने राजधानी में विकास देखा तो इस विकास के आगे उन्हें इंद्र का स्वर्गलोक भी फीका लगा। प्रभु! इतना भ्रष्‍टाचार होने के बाद भी इतना विकास! पार्वती कार्यक्रम समारोह स्थल पर अखबार में छपे समय के हिसाब से पहुंचने को आतुर थीं पर षिव तो ठहरे घुम्मकड़! उन्हें सब पता था। सो मजे से राजधानी की गलियों में घूमना चाह रहे थे। उनके मन की बात को जान पार्वती ने शिव से कहा, ‘प्रभु, देखो तो सामने की घड़ी! समारोह का वक्त हो रहा है। अब छोड़ो घूमना और चलो । कहीं ऐसा न हो कि बैठने को जगह न मिले और खड़े- खड़े ही कार्यक्रम देखना पड़े।’

‘मैं सरकारी कार्यक्रमों के बारे में अच्छी तरह से जानता हूं देवि! घबराने की कोई जरूरत नहीं। अगर ये सुबह के दस बजे होने हों तो रात के दस बजे भी हो जांए तो गनीमत समझो,’ कह वे आइसक्रीम पार्लर की ओर बढ़े तो पार्वती की चिंता कम हुई॥ इतनी ठंडी आइसक्रीम!! हा! मजा आ गया। अब तो हिमालय से भी बर्फ रूठने लगी है। अमरनाथ में मेरा शिवलिंग तक बनाने के लिए दिल्ली की कंपनियां बर्फ का टेंडर दे रही हैं। धन्य हो विकास!

पार्वती पैदल घूम राजधानी की रौनक का आनंद लेना चाहती थीं पर शिव को राजधानी की रेल पेल का पता था। आदमी तो आदमी, यहां तो बीमारियां भी पैदल चलने से डरती हैं सो उन्होंने पार्वती को मेट्रो में चलने को कहा।

और वे दोनों मेट्रो में बैठ घूमने का आनंद लेने लगे।

अचानक पार्वती ने झुग्गी बस्ती में जश्‍न देखा तो उनके विस्मय की सीमा न रही। पार्वती को विस्मित हो देख शिव ने समझा कि मेट्रो में पार्वती पहली बार बैठी है सो इतनी हैरान है पर जब पार्वती ने झुग्गी बस्ती की ओर इशारा किया तो उन्होंने पूछा, ‘उस ओर क्या इशारा कर रही हो? गंभीर होकर बैठी रहो वरना ये लोग हमें गंवार समझेंगे।’

‘वह देखो सामने।’

‘क्या है?’

‘झुग्गी बस्ती।’

‘तो क्या हो गया? झुग्गी बस्तियां इस देश की भाग्य रेखाएं हैं। विकास और गरीबी एक सिक्के के दो पहलू होते हें।’

‘पर वहां पर जश्‍न हो रहा है!’

‘तो जष्न पर क्या लोकतंत्र में सरमाएदारों का ही हक होता है? साम्यवाद में साम्यवादी ही पूंजीपति होते हैं।’

‘वह तो मालूम है, पर ये जश्‍न मना क्यों रहे हैं?’

‘राशन की दूकान पर राशन आ गया होगा महीनों बाद, ‘शिव ने सहजता से कहा पर पार्वती को जश्‍न के कारण को जानने की जिज्ञासा हुई और उन्होंने शिव को न चाहते हुए भी वहीं मेट्रो से उतार दिया।

वे दोनों मेट्रो से उतर सीधे झुग्गी बस्ती में जा पहुंचे। झुग्गी बस्ती वाले कम्युनल रस पिए लग रहे थे। खुमार था कि सभी के सिर चढ़कर बोल रहा था। झुग्गी बस्ती में जश्‍न! वह भी ऐसा! ऐसा तो स्वर्गलोक में देवताओं के भी नहीं होता। एक प्रोग्राम में गया था वहां, प्रोग्राम के लाइव कवरेज के लिए। पार्वती तो ये सब देख विस्मित थीं ही, शिव भी चौंके बिना न रह सके। आखिर उन्होंने जश्‍न में नाच- नाच कर, गिर- गिर कर थकने के बाद किनारे बैठे एक मरिअल से पूछा,’ भाई साहब! ओ भाई साहब!!’

‘क्या बात है?’

‘ये क्या हो रहा है?’

‘देख नहीं रहे? अंधे हो?’

‘नहीं, बस्ती में नया हूं। क्या यहां सरकार ने जनहित में ठेका खोल दिया?’

‘यहां ठेके की क्या आवश्‍यकता! यहां तो हर झुग्गी में ही शराब बनती बिकती है। पुलिस वाले यहीं पीने आते हैं, ‘उसने उठने की बेकार सी कोशिश की कि फिर गिर पड़ा।

‘तो क्या यहां किसी की शादी- बरबादी है?’

‘साहब, क्यों गाली दे रहे हो। अब किसके पास फालतू का वक्त बचा है ये सब करने का! अब तो लिव इन रिलेशन का दौर है। जब तक निभा, निभा। नहीं तो तू कौन तो मैं कौन!’

‘तो ये धमाल क्यों??’

‘महीने बाद बस्ती में पानी आया है। नेता के पास सौ चक्कर लगाने के बाद। इसलिए जश्‍न है साहब। ओ कलुआ! लाना साहब को एक… अपने घरवाली….’, उसने कहा और वहीं लुढ़क गया।

‘पानी!!!!’ पार्वती हैरान रह गईं।

‘हां बहन जी!’

उदास हो पार्वती ने शिव से पूछा,’ प्रभु, ये क्या? गंगा के देश में पानी का भी ये हाल?’

‘देवि, छोड़ो सबकी बातें! अब ये बात पुरानी। कार्यक्रम का वक्त हो रहा है। वक्त लगा तो सरकार से अपने मंदिर के जीर्णोद्धार के बजट की बात भी कर लेंगे। अब वहां पुजारी का बैठना तो रिस्की है ही मूर्तियों का वहां रहना भी खतरे से खाली नहीं।’

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