लेखक परिचय

संजय ग्रोवर

संजय ग्रोवर

व्‍यंगकार एवं गज़लकार।

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संजय ग्रोवर

वह एक-एकसे पूछ रहा था।

जनता से क्या पूछना था, वह हमेशा से भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ थी।

विपक्षी दल से पूछा,

‘‘मैंने ही तो सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था।’’ उनके नेता ने बताया।

उसने शासक दल से भी पूछ लिया,

‘‘हम आज़ादी के बाद से ही इसके खि़लाफ़ कटिबद्ध हैं। जल्द ही हम एक बिल ला रहे हैं।’’

शासक दल विपक्ष से कम उत्साहित नहीं दिख रहा था।

उसने गठबंधित दलों से पूछ मारा,

‘‘भ्रष्टाचार का ख़ात्मा होना ही चाहिए।’’ सबने एक स्वर से कहा।

उसने सेना से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।

पुलिस से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।

उसने चोर से पूछा, वह भी खि़लाफ़ था।

उसने सीमेंट से पूछा, वह खि़लाफ़ था।

उसने बालू से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।

उसने करेंसी से पूछा, वह खि़लाफ़ थी।

उसने जाली करेंसी से पूछा, वह भी खि़लाफ़ थी।

क्या ठोस, क्सा द्रव्य, क्या गैस…….सारा देश भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ धरने पर था।

‘कमाल का माहौल क्रिएट हुआ है !’ वह बुदबुदाया।

‘आप भी आईए न भाईसाहब, क्या आप भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ नहीं हैं !?’ एक धरनाकारी ने उससे कहा।

’’बिलकुल हूं, मैं क्या देश से अलग हूं, आपसे अलग हूं।’’ उसने पूरी विनम्रता से कहा।

‘‘हां, लगते तो बिलकुल हमारे जैसे हो। आओ बैठो न हमारे साथ।’ लोगों ने मनुहार की।

वह आराम से उनके बीच जा बैठा। बात-चीत होने लगी। उसने कुछ नए स्लोगन भी सुझाए। थोड़ी ही देर में लगने लगा कि वह उनसे अलग कभी था ही नहीं।

‘‘आपका नाम क्या है भाईसाहब ?’’ यूंही किसीने पूछ लिया।

‘‘भ्रष्टाचार’’ उसने निर्विकार भाव से बताया।

पहले तो किसीने ध्यान न दिया।

‘‘क्या’’ एकाएक कोई चौंका।

‘‘यह वक्त इन बातों को सोचने का नहीं कि कौन क्या है, हर किसीका समर्थन क़ीमती है’’ किसीने कहा और बहस शुरु हो गई।

‘‘नहीं, नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है !? निकालो साले को यहां से’’, रोष से जिसने यह कहा था वही हैरानी से बोला, ‘‘अरे! पर वह गया कहां ?’’

‘‘अभी तो यहीं था!’’

‘‘मैंने अभी उसे विपक्षी दल के पास बैठे देखा था।’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ! बिलकुल अभी मैंने उसे मंच पर देखा।’’

‘‘पागल हुआ है क्या ? वह सत्ताधारियों के बीच है, जाकर पकड़ उसे!’’

‘‘नहीं है वहां, वे कह रहे हैं कि वह ठेकेदारों के बीच जाकर बैठ गया है।’’

‘‘हट! अभी तो मैंने उसे मीडिया में देखा।’’

‘‘ओफ्फ़ो, साला कहां छुप गया जाकर !?’’

‘‘ढूंढो, किसी तरह ढूंढो उसे।’’

‘‘कैसे ढूंढूं ? उस कोने में जाता हूं तो वहां से वह इसी कोने में दिखाई देता है। यहां आता हूं तो आप कहते हैं वहां चला गया !’’

‘‘पर इतना तो पक्का है कि वह है हमारे ही बीच। सामने तो कहीं दिख नहीं रहा।’’

अब मुश्क़िल यह हो गयी थी कि सारा देश जिसके खि़लाफ़ धरने पर बैठा था वह सामने कहीं दिख नहीं रहा था और अपने बीच उसे ढूंढ पाने में लोग सक्षम नहीं थे।

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