लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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अशोक गौतम

गण उठ, महंगाई का रोना छोड़। महंगाई का रोना बहुत रो लिया। पहले मां बच्चे को रोने से पहले खुद दूध देती थी। तब देश में लोकतंत्र नहीं था। अब समय बदल गया है। बच्चा रोता है तो भी मां उसे दूध देने के लिए सौ नखरे करती है। मां और तंत्र को अब बच्चे से अधिक अपनी फिगर का ख्याल है। उसे बच्चे से अधिक प्यारी अपनी फिगर है। अब रोते बच्चे को दूध पिलाने के दिन गए। अब रोते गण को लोरी सुना सुलाने के दिन गए। आज मां के पास बच्चे को दूध पिलाने का ही काम नहीं। और भी सैंकड़ों काम हैं। अत: हे गण! अब रोने का नया ढंग ढूंढ। सच कहना गण! एक ही तरह का रोना रोकर तुम बोर नहीं होते क्या? देख, तंत्र तेरा एक ही तरह का राग सुन सुनकर थक गया है। जो तू मुझसे पूछे तो मैं दिल पर हाथ रख कर कहूं कि मैं तो एक ही तरह का रोना रोकर दो मिनट से अधिक नहीं चल पाता। बहुत बोर हो जाता हूं। इसलिए रोने के रोज नए आयाम तलाशता हूं ताकि लोग मेरे रोने को पुराना रोना कह दुत्कार न दें। एक ही तरह का रोना रोज-रोज रोने का क्या लाभ! रोज नया रोने से रोने में ताजगी और आकर्षण दोनों बने रहते हैं। नहीं पता तो जमाने से सीख। जिस रोने में आकर्षण नहीं उसे आज की डेट में मुआ भी नहीं उठाता। और फिर तंत्र तो ठहरा तंत्र!!

देख, मां! तेरा एमए बेटा रिक्षा चलाकर आने वाला है। बेचारा पता नहीं दिन भर कहां-कहां भटका होगा? खेतों से उखड़ने का एक यही तो मजा है। उसके स्वागत के लिए चूल्हा जला। चूल्हे का मन रखने के लिए चूल्हा जला। चाहे कुछ मत पका। तंत्र का आदेश है कि हर घर में हर वक्त चूल्हा जले। भले ही उस पर कुछ न पके। तंत्र को चूल्हे से धुआं उठना पसंद है। इसलिए मन से उठता धुआं रोक पर उसका मन रखने के लिए चूल्हे से धुआं उठने दे। रसोई से धुआं न उठा तो तंत्र जुर्माना लगाएगा। रसोई से धुआं न उठा तो तंत्र जेल भिजवाएगा। देगची की इज्जत का ध्यान कर। तवे को और मत जला। उसे चूल्हे के सिर पर बैठ जलने दे।

देख गण! तुम तंत्र पर बेबुनियाद आरोप लगाते फिरते हो कि तंत्र को तुम्हारी फिक्र नहीं? अरे बाबा! तंत्र तुम्हारी फिक्र ही तो करता रहता है आठ पहर चौबीस घंटे। वह तुम्हारी फिक्र में ही सोता है और रात भर तुम्हारी फिक्र में ही पलटियां खा सुबह तुम्हारी फिक्र में ही जाग जाता है। अगर तंत्र तुम्हारी फिक्र न करे तो दूसरे दिन बिन काम हो जाए। अरे बावले! तंत्र को अपने से अधिक तो तुम्हारी चिंता रहती है। कल वह मुझसे कसम खा कह रहा था।

सुन गण! हर चीज का निरंतर बढ़ते रहना विकास का सूचक है। स्थिरता मौत की निशानी है। तू भी गतिशील बन। देख, देश में हर चीज आगे बढ़ रही है। तेरी उम्र भी तो निरंतर बढ़ रही है! वह रूक सकती तो तंत्र बहादुर महंगाई को भी रोक लेगा। देश में रिश्‍वत खोरी, बेराजगारी, लूटमार निरंतर बढ़ रहे हैं। मजा आ रहा है। देश में मिलावट, आत्महत्याएं, बलात्कार दु्रतगति से बढ़ रहे हैं। सत युग बढ़ कर द्वापर हो गया। द्वापर आगे बढ़ा तो त्रेता हो गया। त्रेता आगे बढ़ा तो कलियुग हो गया। वन माफिया आगे बढ़ रहा है। भू माफिया आगे बढ़ रहा है। देख तो सांसदों के वेतन झटके में कितने आगे बढ़ गए! ऐसे में मेरी समझ में तेरी एक बात नहीं आती कि तू महंगाई को आगे बढ़ने क्यों नहीं दे रहा है गण! आखिर तेरी महंगाई से दुश्‍मनी है क्या! तुझे नहीं लगता कि सभी की तरह महंगाई भी फूले-फले? देश में सभी को आगे बढ़ने का अधिकार है। देश में भय, भूख, भ्रष्‍टाचार सब तो आगे बढ़ रहे हैं। आगे नहीं बढ़ रही है तो बस तेरी सोच! इसलिए हे गण तू भी अपनी सोच को आगे बढ़ा। चल, मजे से गणतंत्र दिवस का सीधा प्रसारण टांगों पर टांगें रखे देख। भूख प्यास की परवाह मत कर! वैसे आगे की बात कहूं गण! रोज- रोज रोटी खाकर कौन अमर हो लिया? योगा कर। भूख पर विजय प्राप्त कर। विजयी बन! तेजस्वी बन!

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1 Comment on "व्यंग्य/ हे गण, न उदास कर मन!!"

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लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार
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अशोक गौतम जी साहित्य जोग
व्यंग्य/ हे गण, न उदास कर मन लेख के लिए बहुत बहुत बधाई आपका लेख प्रसंसनीय है ”””

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