लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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गिरीश पंकज

हे पुलिसजी के डंडे…. आपको दूर से नमन. आप जैसे तेलपीऊ-डंडे ने इस देश की जो सिरतोड़-फोड़ सेवा की है, उसके आगे हमसब नतमस्तक है.इस डंडे को धारण करने वाली वर्दी को देख कर उसका काफिया वर्दी… बेदर्दी. गुंडागर्दी से भी मिला दिया जाता है. वैसे यह गलत है, अन्याय है. डंडे का जो ”तयशुदा” (?) काम है, वह बखूबी करता है. डंडा परम्परावादी है. परम्पराओं को निभाना परम फ़र्ज़ है. वर्दी का जो काम है, वो तो उसे करना ही पड़ेगा. क्योकि कोई ज्ञानी कवि यह टिप्स पहले ही दे चुका है कि ”दुनिया में हम आये है तो जीना ही पड़ेगा. जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा” न. अंगरेजों के समय से जो आपका गौरवशाली इतिहास रहा है, उसे आपने और अधिक (दुर) गति प्रदान की है. आपके हाथ का डंडा पहले भी सिरफोडू था, और आज भी है. कल भी रहेगा. जसे किसी को सौ सालपहले किसी से प्यार था उसके बारे में उसने साफ़-साफ़ कह दिया था कि ”सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा”.

हे पीत वस्त्रधारिणीपुलिस के कर की शोभा, आपके कुशल-राज में चोर मस्त है, अपराधी मदमस्त है. ये और बात है कि जनता लस्त-पस्त है. आपकी पूरी टीम ”वसूली अभियान” को सफल बनाने में दिन-रात एक कर देती है. यह भी एक बड़ा काम है. ऐसा करने से इस मंहगाई के दौर में घर-बाहर के छोटे-मोटे खर्चे निकल जाते है. इस लिहाज से वसूली को एक पवित्र काम माना जा सकता है. जनता का पैसा आपके किसी काम ही आ रहा है. वसूली अभियान में आपकी सफलता के बारे में क्या कहे. मोटे डंडे को सींक दिखाने जैसा है. लेकिन सच बात कहने में किसको ऐतराज़ हो सकता है?

हे रक्तपिपासुजी,आपके कारण ही पुलिस का वसूली-अभियान सफलता के साथ संचालित होते रहता है. इस सफलता को देख कर ही सरकार इस बात पर विचार कर रही है, कि अब ऐसी पुलिस की भी नियुक्ति की जाय जो, समाज में अपराध पर नियंत्रण का अपना असली काम कर सके. वसूली भी चलती रहे और अपराध-नियंत्रण भी. (अगर ऐसा हो सके तोबड़ी कृपा हो) अभी जो पुलिस है, उसका बस एकीच्च काम है :आमलोगों का रास्ता रोक कर के वसूली. बेहद सरल काम. रस्ते में कोई गाडी खड़ी है, उसे उठाओ और ले जाओ. भले ही गाडी डैमेज हो जाये. रात को बारह बजे किसी भी आदमी को रोक कर उससे बदतमीजी करो. चाहे तो थाने ले जाओ. डंडापूजन कर दो. अपराधी तो पतली गलियों से निकल जाते है. मगर ज़रूरी काम से आने-जाने वाला ‘नालायक आदमी’ आपकी चपेट में आ जाता है. ऐसा करके आप एक बड़ा सन्देश यह देते हैं कि शरीफ आदमी को देर रात को कभी नहीं निकलना चाहिए. रात केवल अपराधियों और पुलिस के कर्मों के लिये ही ईश्वर द्वारा सुनिश्चित की गई है. इस तरह देखा जाये तो डंडाप्रसादजी, आपकी बड़ी सामाजिक उपयोगिता है. आपके कारण आम आदमी को दुःख-तकलीफ, अत्याचार, और तरह-तरह के कष्ट सहने की आदत पड़ जाती है. पुलिस गश्त करती है और पता नहीं कैसे मस्त शातिर चोर-डकैत अपनाकाम करके निकल लेते है. घर के बाहर रखी गाड़ियां आग के हवाले कर दी जाती है और आपके स्वामी (साँप निकल जाने के बाद) केवल लकीर पीटते रह जाते हैं.

हे डंडाशिरोमणि, आपकी कार्य-कुशलता के बारे में क्या कहा जाये. आप धन्य है. उधर अपराध बढ़ रहे हैं और इधर आपको धारण करने वाले की तोंद भी. आपके साथ-साथ आपकी तोंद भी आगे आना चाहती है. यह कितनी बड़ी देश-सेवा है. कि तोंद भी चाहती है, कि वह आगे आये, ”सामने” आये. तोंद को देख कर अपराधी समझ जायेंगे कि आपके खाते-पीते घर के आदमी है. कोई उनको रिश्वत नहीं दे सकता. तोंद होने के कारण अपराधी निश्चिन्त रहते है. पकड़ से भी दूर रहते है. लेकिन आप बैठे-बैठे परमपिता से प्रार्थना ज़रूर करते हैं कि वह चोर को पकड़ा दे. कई बार धुप्पल में चोर हाथ लग जाते है. तो आपकी बल्ले-बल्ले हो जाती है. लाटरी लग जाती है गोया. किस्मत भी आपका साथ देती है. जीवन भर डंडे चलाते, लोगो पर अत्याचार करते-करते आपके स्वामी एक दिन सेवा-निवृत्त हो जाते है. और कोई उनका बालबांका नहीं कर पाता.(अक्सर. अपवाद तो हर जगह होते हैं) इसलिये ऐसे महान डंडे, कानून-व्यवस्था के पंडे, आप का नागरिक अभिनन्दन करके हम बड़े प्रसन्न है. ऐसा करके हम अपने आत्मबल को और मज़बूत कर रहे है. आपकी ”’देश-भक्ति-जन सेवा” अब केवल द्वेष भक्ति-धनसेवा” में बदल चुकी है, लेकिन यह खुशी की बात है कि ”सेवा” तो जारी है. और जो सेवा करता है, उसे मेवा मिलना ही चाहिए. आपको मेवा खाने से कोई नहीं रोक सकता. नीचे से ले कर ऊपर तक एक जाल बिछा है आपके महकमे में यह गीत खूब बजता है,कि ”बाँट के खाओ इस दुनिया में, बाँट के बोझ उठाओ”. तो हे, दुष्टविकासिनी, दुर्बंलप्रहारिणी पुलिसजी के डंडे का अभिनन्दन है…वंदन है ( कृन्दन सहित ) केवल इतना ही अनुरोध है, कि कभी-कभार जनसेवा भी करें ताकि अंगरेजों के ज़माने की पुलिस आज़ादभारत की पुलिस भी लगे.लीजिये, आपकी सेवा में हम फिर आपको तेल पिला रहे है. लेकिन संभालके, कहीं हमारा सिर ही न फूट जाये. हम हैं आपके-भुक्तभोगी नागरिक.

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