लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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-अशोक गौतम

वे धर्म-निरपेक्ष देश में धर्म के नाम पर हुए दंगा ग्रस्त क्षेत्र का दौरा करते सिसकते धारा 144 लगे हुए चौक पर से गुजर रहे थे कि चौक पर दोनों हाथ आसमान की ओर किए किसीके दहाड़े मार मार रो कुछ मांगने की आवाज ने उनके पांव रोक दिए, ‘या रब्ब! चढ़ादे मुझे किसी विवाद की भेंट! या उठा दे इस जहां से! या रब्ब! घिरा दे मुझे किसी विवाद में और दे दे मेरी जीवन को रवानी। या रब्ब! दे दे मुझे कोई धांसू विवाद और बचा ले मेरी डूबती हुई नौका। या रब्बा……..’ अल्लाह बंदे की ख्वाहिश को सुन मन ही मन सोचने लगे, ‘या रब्ब! ये बंदा है कैसा! यहां तो मर गया मैं भी खुदा से मांगते- मांगते कि हे खुदा! जिंदगी का कोई एक पल तो ऐसा दे कि जिस दिन लगे कि मैं जी रहा हूं। उस पल न कोई वाद हो न कोई विवाद। चाह हो न कोई आह।

यार! ये बंदा है किस धर्म का! किस जात का!! ये बंदा है क्या बंदा!! जो अल्लाह से भागम भागम ,चिल्ल- पों जिंदगी से बचने के बदले विवाद चाहता है, वह भी दोनों हाथ पैर जोड़कर। अपने समाज का तो लगता नहीं। आखिर अल्लाह उस पहुंचे के पास जा पहुंचे, उसके आगे नतमस्तक होते पूछा, ‘भगवन! आप मेरे लोक के तो लगते नहीं। मेरे लोक के होते तो अल्लाह से षांति मांगते। महंगाई से बचने का फार्मूला मांगते। मरते रिष्तों को बचाने का मंत्र मांगते। धर्म के अनुसार बदलते खून के रंग को एक बार फिर खून का रंग होने की दुआ मांगते, पर आप तो….आप कैसे सिध्द पुरूष हो मेरे खुदा! लोग विवादों से बचने के लिए आत्म हत्या किए जा रहे हैं और एक आप हो कि….’

‘मैं लोगों से सौ फुट ऊपर की बला हूं।’

‘मतलब!!’ अल्लाह बंदे को सिर से पांव तक निहारने लगे।

‘राजनीति का टूटा हुआ खिलाड़ी हूं। जनता के कांधों की सवारी हूं। तिल तिल मर रहा हूं। कूड़ादान में पड़ा- पड़ा सड़ रहा हूं। अब तो मरने को मन कर रहा है।’

‘अरे साहब! ऐसा जुल्म मत करो! अगर आप को कुछ हो गया तो सच मानिए ये देश फिर से सोने की चिड़िया होकर फुर्र हो जाएगा। फिर जनता रहेगी कहां??’

‘मजाक मत करो यार! सच्ची को बोल रहा हूं कि आज मेरी न समाज में कोई पूछ रही है न राजनीति में।’

‘क्यों मजाक करते हो सरकार?? अपने समाज में दो ही जनों की तो तूती बोलती है एक आपकी और दूसरे आपके चमचों की। रही बात समाज में किसी तीसरे और के बने रहने की, समाज में जनता के बीच ऐसी जागरुकता तो आने से रही। यहां तो भगवान की बाद में पूजा होती है जनसेवक की पहले। जनसेवक चाहे राजनीति के नाम पर कलंक हो चाहे अपने आप पर।’

‘यही तो रोना है यार! बड़े दिनों से कलंक हीन होकर मर रहा हूं। या मेरे खुदा मेरे नाम पर एक ठो नामचीन कलंक लगा दे। संसद में मेरा खोया रूतबा मुझे एकबार फिर दिला दे। मुझे कलंकित कर बीसियों से आगे की सीट दिला दे। पर यार, तुम कुछ अधिक नहीं बोल गए?’

‘अपने देश में जनता के पास बस एक यही तो अधिकार बचा है। इसी को चाय में चीनी डाल पी मधुमेही हो लेती है। इसी अधिकार को परात में गूंथ उसकी रोटियां बना खा लेती है। इसी अधिकार को देगची में कहीं से चार फट्टियों का जुगाड़ कर उबाल उसका सूप बना पी लेती है। देश तो आपकी मुट्ठी में है। कानून आपकी मुट्ठी में है। लोकतंत्र आपकी मुट्ठी में है। अल्लाह आपकी मुट्ठी में है। राम आपके इशारों पर नाचते हैं। देश की सारी सहूलियतें आपको विरासत में मिली हैं। जनता का मौलिक अधिकार तो गरीबी है, बेरोजगारी है, संसद की चोटी पर लगी तरकारी है।’

‘अच्छा मेरा एक काम कर दोगे?’

मैं तो पैदा ही आपके लिए होता हूं। आपके लिए ही जवान होता हूं और आपके लिए ही बूढ़ा होकर मर जाता हूं। फिर पैदा होता हूं, मरता हूं……अपना तो बस बार बार एक ही काम है -पैदा होना, धक्के खाना, आपके लारे- लप्पों में खुद को उल्लू बनाना, औने-पौने में आपको वोट पाना और आपके द्वारा संसद से की गई घोषणाओं की एक बूंद पाने को चातक हो जाना। कहो क्या काम है मेरे आका?’

‘यार मुझे किसी जिंदादिल विवाद में घिरा दो!’

‘सत्ता में नहीं हो?’

‘सत्ता में होता तो अल्लाह के आगे यों नाक रगड़ता क्या? उसके नाक न रगड़वाता। सत्ता में होना ही अपने आप में विवादों की कड़ाही में होना होता है।’

‘उसके पास विवाद कहां होते हैं साहब! वह तो सभी के लिए विवाद मुक्त ,अपराध मुक्त जीवन की कामना करता है। उसके पास तो दुआएं होती हैं। वह दुआएं देता पैदा होता है और दुआएं देते मर जाता है। न उसके पास मंदिर होता है न मस्जिद। विवाद तो उसके पास तब हो जो एक रात तो छप्पर के नीचे कटे। पर आप विवाद क्यों चाहते हो सर?’

‘जनसेवक बिन विवादों के आज के दौर में वैसे ही एकपल नहीं जी सकता जैसे मछली बिन पानी के जिंदा नहीं रह सकती। जिस तरह आभूषण नारी के सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं उसी तरह जनसेवक के चरित्र में विवाद चार चांद लगाते हैं। जो लोग विवादों से मुक्त जनसेवक को ही असली जनसेवक मानते हैं वे आग को षीतल क्यों नहीं मानते ? विवाद जनसेवक को वैसे ही जीवन देते हैं जैसे खेती को रासायनिक खाद! विवाद आज के जनसेवक का अंगोछा है,उसका झाड़ू है, पोछा है। आज की राजनीति में वही शहंशाह है जो विवादों से स्याह है। विवादों से घिर जाने पर जाते जाते जनसेवक में एकबार फिर प्राणों का संचार हो उठता है। देखते ही देखते वह समाज में चर्चित हो जाता है। चारों ओर वह पूजा जाने लगता है। हर दल उसे सिर आंखों पर लेने के लिए नंगे पांव दौड़ पड़ता है। राम रावण युद्ध में लक्ष्मण के मूर्छित होने पर जो काम संजीवनी ने किया था, विवाद वैसा ही कुछ जनसेवक के लिए करते हैं। या अल्लाह! अगर मैं तेरा नेक बंदा हूं तो घेर दे मुझे विवादों में।’ कहिए, ऐसे में आप उनकी जगह होते तो क्या करते??

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