लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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उस वक्त सुबह के सात की बजे ही सूरज घरवाली की तरह सिर पर चढ़ आया था। चारपाई पर पड़े पड़े योगा करके हटा ही था कि मोबाइल की घंटी बज उठी। पड़ोसी का ही होगा। वही बेचारा हर सुबह परेषानी में उठता है और रात को परेशानी में ही सो जाता है। मोबाइल उठाया तो बगल का पड़ोसी ही था। पर नंबर फिर बदला हुआ। क्या दिन आ गए यारो! अब पड़ोस से भी मोबाइल के थू्र जुड़ना पड़ रहा है। गए दिन वे अब जब पड़ोस तो मुहल्ले वाले को भी जो बुलाना होता था तो छत पर चढ़कर पुरजोर आवाज दे लेते थे। इस बहाने गला भी साफ हो जाता था और छत पर से जवानी में जरा इधर उधर भी झांक लेते थे। क्या मजाल कोई असभ्य कहे। पर अब तो अगर अपने ही घर में जरा सा ऊंचे बोल दो तो हंगामा हो जाता है। बच्चे भी कहने लग जाते हैं कि देखो न, दादू को बोलने का भी मैनर नहीं। फोन आन होते ही उसने पूछा, ‘और क्या हाल हैं? रात कैसे कटी?’

‘ठीक वैसी ही जैसे चार साल से खांसते हुए कट रही है। तू बता, आज रात को ठीक रहा कि परेशान ही रहा? एक बात कहूं, अब छोड़ परे परेषान होना। अब तो यार तेरे पास सबकुछ है।’

‘तभी तो यार परेषान हूं। असल में मैं इसलिए परेषान रहता हूं कि मुझे परेशानी ही कोई नहीं है।’

‘तूने सिम फिर बदल लिया?’

‘अब इस उम्र में और तो कुछ बदल नहीं सकता इसलिए सिम बदल कर ही संतोश कर लेता हूं। बीवी बदलने से तो अब रहा।’ उसने जिस पीड़ा से कहा मुझे उस पर बहुत दया आई। पर मैं अब दया के अतिरिक्त किसीके लिए और कुछ कर नहीं सकता। हाय रे बुढ़ापे! तेरे आते हुए बंदे को कैसे कैसे दिन देखने पड़ते हैं? उसने फोन पर ही करवट लेते कहा, पता नहीं ऊंट किस करवट बैठा होगा,’ आज बाजार में आज सिम के सिवाय और मिलता ही क्या है? सब्जी वाले के पास जाओ तो उसके पास सब्जी कम सिम ढेर। चक्की वाले के पास जाओ तो चक्की वाले के पास आटा खत्म पर सिम जितने मन करे ले आओ। आज सब्जी महंगी, सिम सस्ते, आटा महंगा, सिम सस्ते। आटा मुट्ठी में आए या न, पर कर लो दुनिया मुट्ठी में। बैंगन तक तो हाथ से निकला जा रहा है पर वे कहते हैं कि कर लो दुनिया मुट्ठी में। और तो और भैया! पान, बीड़ी वालों ने भी पान-बीड़ी के साथ सिम फ्री बांटने षुरू कर दिए हैं। एक पान लो, सिम फ्री! एक सिगरेट के साथ सिम फ्री। करते रहो रात रात भर फ्री बात! काश यार, आज की डेट में जवान होते।’

‘तो कौन सा तीर मार लेता?’

‘यार कम से कम रात रात भर तो बिसतर पर पलटियां खा खा कर तो प्यार मुहबबत की बातें करता रहता।’

‘किससे?’

‘अपनी फियांसी से।’

‘और सुबह दफ्तर में जाकर कुर्सी पर सोता रहता। अरे तू पागल तो नहीं हो रहा है! सपने लेने तो नरक के ले । स्वर्ग तो लाख जुगाड़ करने के बाद भी तुझे नहीं मिलेगा।’

‘लगे शर्त? अच्छा चल एक बात बता?’ उसने जिस जोश में कहा तो मैं डर गया। बंदा महा जुगाड़ू जो ठहरा। अगर जुगाड़ लड़ा गया तो? उसके पास बड़े से बड़े घाघ को पटाने के भी ऐसे मंत्र है कि बंदा चूं न कर पाए,हां, बोल।’

‘आजकल क्या कर रहा है?’

‘झक मार रहा हूं।’

‘तूने और जिंदगी में किया भी क्या! जो बंदा जवानी में भी झक ही मारता रहा हो उससे अब उम्मीद ही क्या की जा सकती है? अच्छा बोल, एक जांच आयोग को सदस्य की जरूरत है। पूछ रहे थे कोई नहीं मिल रहा, तेरा नाम दे दूं जो तू हां कहे तो, घर की किच किच से भी कुछ देर को मुक्ति मिल जाया करेगी और बाहर निकलने का मौका भी मिल जाएगा, वैसे भी घर में सारा दिन पड़ा पड़ा सबकी गालियां सुनता रहता है’, उसने कहा तो पहले तो लगा कि शायद बंदा सुबह सुबह मुझे खींचने के मूड में है पर मैं चुप रहा तो उसने ही फिर कहा, ‘यार मजाक नहीं, सच्ची को कह रहा हूं। उन्हें जांच आयोग के लिए बंदे नहीं मिल रहे।’

‘पर यार! मैं तो आज की डेट में अपने घर का सदस्य भी नहीं हूं। मैं तो यहां भी फालतू हो गया हूं और तू कहता है कि… मेरा दोस्त है तो कम से कम सुबह सुबह मुझसे मसखरी तो न कर। इसके लिए तो सारा दिन पड़ा है।’

‘मजाक नहीं यार! टेक इट सीरियसली! क्या है न कि देश में जांच आयोग इतने हो गए हैं कि अब और जांच आयोग बनाने के लिए सरकार को बंदे ही नहीं मिल रहे।’

‘सो तो ठीक है पर यार मैं करूंगा क्या????’

‘करना तूने क्या! बैठक वाले दिन चाय षाय, लंच लुंच मारा और आ गए। ऊपर से आमदनी और बढ़ जाएगी। पहले वालों ने कौन से तीर मार लिए? लोकतंत्र है तो सरकार है। पक्ष है तो विपक्ष है। सरकार है तो घोटाले हैं। सरकार है तो उसके बंदे हैं। न चाहते हुए भी सरकार का एक एक बंदा अपने नीचे सौ सौ घोटाले दबाए बैठा है। जनता की मांग सरकार ठुकरा दे तो ठुकरा दे, पर विपक्ष की मांग ठुकरा उसे मरना है क्या? सरकार को लग रहा है कि अब विपक्ष की मांग पर विपक्ष का मान का रखने के लिए जांच आयोगों पर भी जांच आयोग बैठाने चाहिएं, और वह हर हाल में बैठाएगी भी। कुर्सी पर वह तभी बनी रह सकती है। सरकार में बने रहने के लिए, विपक्ष को दबाए रखने के लिए वह कुछ भी कर सकती है। बिना वोट के सरकार तो बनती नहीं। वोटों के लिए वह कुछ भी कर सकती है। पर यहां बंदे पहले ही कम पड़ रहे हैं, अब सरकार भी क्या करे? किसीने किसीकी दीवार पर शू शू कर दिया तो विपक्ष ने कर दी न्यायिक जांच की मांग। अच्छा चल, बैलेंस कम है, अब और नहीं। जल्दी हां दे तो कर दूं तेरा नाम आगे? तो ले मैंने कह दिया कि तू तैयार है। बधाई हो यार! अब तू भी जांच आयोग का मेंबर हो गया। अच्छा तो, दिन में तैयार रहना, इसी खुशी में चाट वाले के पास गोलगप्पे खाएंगे।’

चल यार! जिंदगी में कुछ तो बना।

-अशोक गौतम

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4 Comments on "व्यंग्य/ चल यार! जिंदगी में कुछ तो बना"

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kamlesh
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मजा आ गया . बेहतर रचना के लिए बधाई.

dr.anil sharama
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एक सशक्त व्यंग्य रचना के लिए बधाई. लिखते रहें, समाज जागेगा जरूर.

ram cahnd
Guest

करारा वयंग्य है . मजा आ गया. बधाई. कोई जाग सके तो जागे.

chekov
Guest

accha vayngy hai aaj ki vayvastha par.

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