लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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उसके बीसियों बार अपने बेटे के माध्यम से बुलाने पर मैं कुढ़ा, जला भुना उसके घर पहुंचा। हालांकि वह मेरा इमीजिएट पड़ोसी है। कहते हैं कि पेट और पड़ोस कभी खराब नहीं होने चाहिए। पर कहीं भी देख लो, आजकल और तो सब जगह सब ठीक है पर ये दो ही चीजें ठीक नहीं।उसके घर पहुंचते ही पाया कि वह कुर्सी पर निढाल पड़ा है और उसकी श्रीमती अपनी चुनरी के पल्लू से भरे दिसंबर में उसे हवा कर रही है। बेटा बाप की जेब से सिगरेट निकाल बाथरूम में रेल चलाए बैठा है। बड़े दिनों बाद दाव लगा होगा बेचारे का।

मैं सच कहूं तो किसी चीज में मैं माहिर हूं या नहीं, पर अभिनय करने में बहुत माहिर हूं। मेरा दिमाग इतना शातिर है कि मैं वक्त की नजाकत को पलक झपकने से पहले ही पहचान लेता हूं और उससे भी पहले अभिनय शुरू कर देता हूं, पूरी संजीदगी के साथ।

उसे कुर्सी पर निढाल देख मेरे मन में लड्डू फूटे। फूटने भी चाहिए थे। जिसके मन में पड़ोसी को परेशान देख लड्डू न फूटें लानत है उस पड़ोसी पर।

‘क्या हो गया भाभी इनको?’ कह मैं दिखावे को अपने होशोहवास खो बैठा। पर भीतर से मैं अपने को पहले से भी अधिक भरा-भरा महसूस कर रहा था।

‘क्या बताऊं भाई साहब! दफ्तर से जबसे आए हैं न कुछ खा रहे हैं न कुछ पी रहे हैं, न ही कुछ बोल रहे हैं। बस बुत बने बैठे हैं। पता नहीं इनको किसकी नजर लग गई? आप ही कुछ पूछिए न इनसे?’

मैंने उसकी पत्नी को बाहर जाने का इशारा किया। इसलिए कि जानता हूं अधिकतर केसों में चुप्पी साधे पति पत्नी के सामने सच कहने से कतराता है। उसकी पत्नी के बाहर जाते ही मैंने उससे पूछा,’क्या बात है यार! इतना गुमसुम क्यों? तू तो दफ्तर से भरी जेब लिए धमाल मचाते आने वालों में से है। आज तुझे क्या हो गया? कुछ उटपटांग खाकर तो नहीं आया आज?’ मेरी पूरी हमदर्दी से पूछने के बाद भी वह बिलकुल वैसे ही रहा। आखिर मैंने फिर उससे पूछा,’ कहीं किसीने आहत होकर तेरे रिश्वत मांगने पर पैसे सबके सामने मुंह पर तो नहीं दे मारे?’

‘नहीं!’ उसकी हल्क से मरी ही सही जुबान निकली तो खुशी हुई।

‘तो दफ्तर में फिर किसीसे छेड़छाड़ तो नहीं कर आया और जूता खाकर आया हो।’ आप सोच रहे होंगे कि मैं उसके चरित्र के बखिए आप के सामने उधेड़ रहा हूं। नहीं भाई साहब, ऐसा करना मेरा इरादा कतई नहीं। जिनके चरित्र में बखिए हो ही नहीं उन्हें उधेड़ना क्या!

‘नहीं!’

‘तो कहीं रिश्वत लेते हुए रिश्वत निरोधक दस्ते से कहा सुनी तो नहीं हो गई?’

नहीं न यार! उन्होंने ही तो आज तक रिश्वत लेने के लिए विवश किया है। न ये रिश्वत निरोधक दस्ता होता, न मुझे रिश्वत लेने की आदत पड़ती।’

‘तो पत्नी के आगे तेरी चुप्पी का आखिर कारण क्या है?’

‘मत पूछ यार कि मेरी चुप्पी का कारण क्या है।’ कह उसने मुंह दूसरी ओर को फेर लिया। ठीक वैसे ही जैसे अक्सर विवाह के दो चार साल बाद हर पति अपनी पत्नी की ओर से मुंह फेर लेता है।

‘अच्छा चल, मैं नहीं पूछता कारण! पर तुझे हुआ क्या है?’

‘यार आज दफ्तर में एक गैर सरकारी रिश्वत हटाओ संस्था के कुछ कार्यकर्ता आए थे।’

‘तो बिना रिश्वत दिए काम करवा कर चले गए होंगे? उसीका मलाल होगा तुझे?’

‘नहीं, उन्होंने आज रिश्वत लिए बिना काम करने की कसम खिला दी।’ कह वह फफकने लगा।

‘और तूने वह कसम दिल से लगा ली?’ मुझे उस पर उस वक्त बहुत गुस्सा आया। यार हद हो गई! मैं इसे जितना नालायक समझता था ये तो उससे भी कहीं अधिक नालायक निकला।

‘क्या करता, मैं ही सबसे आगे खड़ा था।’

‘तो??’

‘तो क्या! खानी पड़ी। अब सोच रहा हूं कल से दफ्तर जाऊंगा कैसे? जाऊंगा ही तो जाकर करूंगा क्या!’ मामला सच्ची को नाजुक लगा। कच्चे रेशम के धागे से भी अधिक नाजुक। मुझे लगा बंदे की बरसों पहले मरी आत्मा यकायक कैसे जिंदा हो उठी? अव्वल तो आज के दौर में किसीकी मरी आत्मा जागती नहीं पर अगर करिश्मे से किसीकी मरी हुई आत्मा जाग उठे तो आपका नैतिक कर्तव्य बनता है कि आप उसे मारने की पूरी कोशिश करें। इससे बढ़कर मृत्यु लोक में और कोई पुण्य नहीं।

‘तो क्या हो गया! खाते तो हम पता नहीं जिंदगी भर क्या क्या हैं, पर उसे याद रखते हैं क्या!’

‘क्या मतलब तेरा?’ उसका लो होता बीपी धीरे धीरे ठीक आने लगा।

‘हम किसी से उधार लेते हैं?’

‘हां तो!’

‘क्या कह कर लेते हैं?’

‘कि कसम खाता हूं यार! इस हाथ लिया ,उस हाथ दे दूंगा।’

‘पर उधार लेकर कसम भूल जाते हैं न!’

‘हां!’

‘अच्छा चल बोल! तूने अग्नि को साक्षी मानकर आदर्श पति होने की कसम खाई थी?’

‘हां, तो..’

‘पर निभाई?’ कुछ कहने के बदले वह चुप रहा। चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरता हुआ।

‘नेता संसद में जाने के बाद देश बचाने की शपथ खाता है कि नहीं?’

‘हां!’

‘पर कसम खाने के तुरंत बाद क्या करता है?’

‘देश को खाना शुरू कर देता है।’

‘हर पंद्रह अगस्त को हम बड़े जोर शोर के साथ क्या कसम खाते हैं?’

‘कि देश की अखंडता को, अक्ष्क्षुण्ता को आंच नहीं आने देंगे।’

‘और उसी सांझ से क्या शुरू हो जाता है?’

‘देश को खंड खंड करने का अभियान।’

‘इस अभियान में कौन सज्जन होते हैं?’

‘जिन्होंने मंच पर सीना चौड़ा करके शपथ खाई होती है।’ अब वह काफी नार्मल लग रहा था।

‘पेपरों के दिनों में स्कूलों में क्या होता है?’

‘स्कूल के टीचरों सहित बच्चों के मां बाप मंच पर खड़े होकर परीक्षाओं में नकल रोकने की पुरजोर कसम खाते हैं।’

‘गुड! और अगले दिन क्या होता है?’

‘वही सब अपने अपने शिष्यों को,बच्चों को नकल करवाने के लिए जी जान से जुट जाते हैं।’

‘तो हे इस सृष्टि के सबसे अनमोल प्राणी इस सबसे क्या निष्कर्ष निकलता है?’

‘कि कसमों के हित में कसम खाओ और उसके तुरंत बाद अपने हित में शुरू हो जाओ। कसम की इज्जत भी रहे और अपनी भी। अपने यहां कसम खाना मतलब कसम खाना है रस्म निभाना भर है, बस।’

‘क्योंकि इसी में हर नागरिक की भलाई है। असल में जो यहां अवसर मिलते ही कसमें खाते हैं वही असल में अपना भविष्य बनाते हैं। इसलिए उठ, कसम खा, पचा और सगर्व अगली कसम खाने के लिए तैयार हो जा।’ उसने जोर का ठहाका लगाया तो उसकी पत्नी बदहवास सी बाहर से दौड़ी दौड़ी आई। वह मेरे तत्व ज्ञान से इतना प्रभावित हुआ कि अपनी पत्नी के लाख मेरी ओर संकेत करने के बाद भी मेरे पांव छूने के बदले अपनी पत्नी के पांव में लोटने लगा।

-अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.
E mail a_gautamindia@rediffmail.com

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