लेखक परिचय

रामस्‍वरूप रावतसरे

रामस्‍वरूप रावतसरे

एक जागरूक पत्रकार और कर्मठ समाजसेवी रामस्वरूप रावतसरे गत 20 वर्षों से लगातार लेखन के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के संगठन मंत्री रामस्वरूप जी ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं मे अपनी लेखन कला की छटा बिखेरी है। संप्रति- सहायक सम्पादक (भारतीय पक्ष मासिक पत्रिका)

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प्रणव दा ने देश का बजट पेश किया तो लगा कि इस बार हमारी सारी समस्याओं का निदान अपने आप ही हो जावेगा क्योंकि पहली बार बजट गांव व गरीब के लिये पेश किया गया है। हम बजट को ध्यान में रख कर यह विचार कर रहे थे बजट के गांव में आ जाने से हमारे गांव का स्वरूप क्या होगा और जब बजट घर के दरवाजे में प्रवेश करेगा तो हम भी गांव के लम्बरदार की तरह मूंछों पर ताव देने की स्थिति में आ जावेगें। घर की समस्याएं गांव के बाहर खडी खिसियाती नजर आयेगीं।

हमने पलक झपकते ही अब तक पूर्ण नहीं हो पाई उन सारी अपेक्षाओं आशाओं को पूरा करने के साथ साथ उन्हें घर में किस प्रकार सजाया जावेगा, इसका पूरा खाका तैयार कर लिया। हम अपनी खुशी का इजहार करने के लिये बेगम को आवाज दे ही रहे थे कि तभी चितवन का आगमन हुआ। वह बोला चचा आज सालों बाद पहली बार आपके चेहरे पर खुशी देख रहा हूं ऐसा क्या मिल गया। हमने अपना मुखारबिन्द खोलते हुए चितवन को बताया ”प्रणव दा ने पहली बार गांव व गरीब को समर्पित बजट पेश किया है” चितवन तमक कर बोला तो क्या हुआ। हमने कहा इस बजट से हमारे सारे दुख दलिद्दर हवा हो जायेगें समझें। चितवन बोला अब समझा चचा कि आपके अलसाये चेहरे पर खयाली पुलाव क्यों पक रहे है।

बजट तो भारत के आजाद होने के बाद से ही आता रहा है। चचा बजट पेश करते समय वित्त मंत्री तुम जैसों का कितना ध्यान मे रखते है, कहा नही जा सकता पर अपनी पार्टी के भविष्य को अवश्‍य ध्यान में रखते है और उसी के अनुसार जनता की सुविधाओं का पिटारा खोला जाता है। अखबार इनके बजटीय उदगारों से भर जाते है। समीक्षक शब्दों व आकडों के माध्यम से अपनी भडास निकाल लेते है। सत्ता पक्ष बतीसी दिखाता बजट को बहुत अच्छा बताता है, तो विपक्ष भौहें चढाता हुआ, बजट को अब तक का निकृष्ट बताता है ये दोनो ही जनता द्वारा चुने हुए होते है। उस जनता द्वारा जिसके लिए बजट पेश किया जाता है।

गत 59 वर्षो से यही सिलसिला चला आ रहा है। हर साल अरबों-खरबों का बजट पेश करने तथा जन सुविधार्थ घोषणाएं करने के उपरान्त भी चचा देश का का 80 प्रतिशत भाग वही खडा है जो आजादी के समय खडा था। फिर यह बजट जो हर साल पेश किया जाता है, किसकी सुविधा के लिए पेश कर खर्च किया जाता रहा है। जो घोषणायें बजट में की जाती है वें पूरी क्यों नहीं होती? इसके पीछे कारण क्या रहता है ?चचा इस ओर शायद ही बजट पेश करते समय किसी मंत्री संतरी का ध्यान गया हों।

चचा तुम्हें पता होगा जब किसी भी संस्थान या उपक्रम का सालाना लेखा-जोखा तैयार किया जाता है। उसमें उपलब्धियों के साथ-साथ खामियों पर भी रिपोर्ट होती है और उसे हर सम्भवपूर्ण किया जाकर लाभ की स्थिति में लाया जाता है। यही कारण रहता है कि लगभग संस्थान उतरोतर उन्नति की और बढते जाते है पर केन्द्र या राज्य का बजट जो आम जनता कि सुविधा के लिये महिनों की मेहनत के बाद पेश होता है, वह निजी उपक्रमों की तरह उपलब्धियों को क्यों नही पूरा कर पाता? और तो और इस बात पर शायद ही सोचा जाता होगा कि जो लक्ष्य पूर्व बजट वर्ष में निर्धारित किये थे, वे पूर्ण क्यों नहीं हुए और उसके लिये कौन जिम्मेदार है? साल खत्म होता है, नये बजटीय आंकडों का खेल षुरू हो जाता है। स्कूल ,महाविद्यालय, चिकित्सालय, चिकित्सकीय सुविधाएं, सडकें, पानी, बिजली, आवागमन के साधन, संचार के साधन, और भी ना जाने क्या-क्या की सख्या बताई जाती है पर नया बजट पेश करते समय यह नही बताया जाता की इनमें से गत वर्ष में कितना कार्य पूर्ण हो गया है और कितना शेष रह गया है। और उस काम के नहीं होने के पीछे क्या कारण रहे है। 

चचा तुम्हे मालूम होना चाहिये सरकार एवं सरकारी उपक्रमों में जो बजट पेश होता है उसमें राशि होती ही नहीं है, आने की संभावना को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाता है। जब हमारे पास राशि है ही नहीं और हम संभावना के आधार पर घोषणाएं कर रहे है, वे कितनी पूर्ण होगी यह इसी बात से अन्दाजा लगाया जा सकता है। खैर, यह बजट बनाने वालों का कमाल है कि वे खजाने में राशि का अभाव होते हुये भी उसे इस बाजीगिरी से पेश करते है कि साल भर तक तुम जैसे तो क्या जनता के चुने हुये नुमाइन्दे तक भरमाये रहते है। फिर अगले साल बजट आ जाता है। यों करते-करते पांच साल का समय पूर्ण हो जाता है। और फिर लच्छेदार भाषणों के जरिये जनता को बताया जाता है कि हमने उसके लिये इतने हजार किलोमीटर सड़कें बनाई, विद्यालय और चिकित्सालय खोले आदि-आदि। ये सड़कें कहां बनी, विद्यालय और चिकित्सालय कहां खुले, इसका लेखा उनके पास नहीं होता। हो भी कैसे। यदि धरातल पर कुछ किया होता तो आज हम 62 सालों के बाद भी भिखमंगों की श्रेणी में नही आते।

चचा हर वर्ष गांव व गरीब का उत्थान करने के लिये बजट राशि का प्रावधान होता है लेकिन आज तक गांव व गरीब का उत्थान नहीं हो पाया है। यह अलग बात है कि गांव व गरीब के नाम पर बजट पास करने वालों के वारे न्यारे होते आ रहे है। सज्जन लोग कहते है कि गांव व गरीब की दुहाई देकर चुनाव जीतने वालों की चले तो यथा स्थिति कायम रहनी चाहिये ताकि उनका संसद व विधानसभाओं में पंहुघ्चना सुनिश्चित रहे। इसके भी आगे उनकी सोच है जो चुनाव जिताने के लिये अपने संसाधन व धन इन नेताओं को उपलब्ध कराते है, वे यह चाहते है कि गरीब व गांव रहना ही नहीं चाहिये। जहां ये बसे है, भूखे प्यासे रहकर अपना जीवन काट रहे है, यह देश के लिये अभिशाप है, इनके बने रहने से विदेशों में भारत की छवी गरीब व भिखमंगें की बनी हुई है। इन्हें हटा कर आलिशान इमारतें व कारखाने लगाये जाये ताकि भारत की छवी सुधरने के साथ साथ करोड़ों की आमदनी हो और गरीब का प्रवेश नही रहे।

चचा हमारे नेता गरीबी को एक अभिशाप मानते आ रहे है, आधी से ज्यादा शताब्दी निकल जाने के बाद भी हमारे यहां से गरीबी नहीं गई। गांव व गरीबी खत्म होते गये , भूख से, बीमारी से, बेरोजगारी से, और यह क्रम सतत् जारी है। सरकारें आती है, बजट पेश करते समय गांव व गरीबों के लिये घडियाली आंसू बहाती है। बस बजट का पास होना और गांव व गरीबों का फेल होना हर वर्ष जारी रहता है। बजट में गरीब के नाम पर रखा गया निवाला उससे भी ज्यादा भुखे लोग खाते रहे है जो महंगी कारों में घूमते है और अट्टालिकाओं में रहते है।

यदि गांव व गरीब के लिये बजट तय किया जाता है तो उसका अन्त तक का हिसाब भी आना चाहिये। पर यह तब हो जब गांव व गरीब का प्रतिनिधित्व करने वाला सच्चा व्यक्ति वहां पर मौजूद हों। हर बजट वर्ष में गांव व गरीब के लिये योजनायें बनाई जाती है, पर उनका रूख गांव व गरीब की ओर नही होकर शहरों की ओर या प्रभावशाली लोगों की ओर हो जाता है या ये योजनाएं कागजों में ही पूर्ण होकर रह जाती है। चचा तुम्हारे दुख दरिद्दर तभी दूर हो सकते है जब बजट बनाने वाले गांव के अर्थशास्त्र को समझ कर उसे फलने-फूलने दे और उसमें सरकारी सहायता की खाद व पानी को लगाने दे। लेकिन ये आज तक पाश्‍चात्य अर्थशास्त्र व गणित के आधार पर गांव व गरीब का दुख दूर करने के प्रयत्न करते रहे है। जिन्होंने गांव व गरीब को उन्नत करने के स्थान पर अवनत किया है। हमारी धरती जो कभी सोना उगलती थी, विदेशी सोच के चलते बंजर पडी है, ग्रामीण व किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे है। चचा शुरू से ही यदि गांव आधारित विकास को बल दिया जा कर बजट बनाये जाते तो आज हम विकास में श्रेष्ठता के शिखर पर होते और नितियां आयात नही निर्यात करते। इसलिये चचा प्रणव दा द्वारा दिखाये गये स्वप्नों से निकल कर बाहर आयों, ठीक रहेगा।

-रामस्वरूप रावतसरे

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