लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

भारत में किराये की कोख का चलन दिन-प्रति-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि बे-औलाद दंपत्ति के लिए औलाद प्राप्त करने का सुख जीवन के लिए सबसे अहम् होता है, पर ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ (आईवीएफ) की पद्धत्ति से औलाद प्राप्त करना प्रकृति के नियमों के खिलाफ है। बावजूद इसके विज्ञान की रथ पर सवार इंसान अपने फायदे के लिए प्रकृति के कायदे-कानून की अनदेखी करने में सबसे आगे है।

सच कहा जाए तो हमारा समाज भी किराये के कोख से पैदा बच्चे को मान्यता नहीं देता है। आर्थिक रुप से समर्थ इंसान किराये की कोख के लिए गरीब महिला का चयन कर सकता है, परन्तु गरीब आदमी संतान सुख के लिए अपने रिश्‍तेदारों का चुनाव करने के लिए मजबूर होता है। फलत: रिश्‍तों में इस तरह से उलझन आती है कि शारीरिक तौर पर कभी बच्चे की नानी बच्चे की माँ बन जाती है तो कभी मौसी। अगर अनजान औरत भी ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ पद्धत्ति से बच्चे को पैदा करती है, तब भी उसका बच्चे के साथ मानसिक और मनोवैज्ञानिक लगाव तो हो ही जाता है। फिर भी बच्चा पैदा होने के बाद बच्चे के आनुवांशिक माता-पिता बच्चे को अपने साथ लेकर चले जाते हैं और नौ महीने तक बच्चे को अपने कोख में पालने वाली माँ हमेशा के लिए बच्चे की सूरत देखने से महरुम हो जाती है।

भारत में कानून भी ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ पद्धत्ति से बच्चे को पैदा करने की इजाजत नहीं देता है। इसके पीछे मूल कारण है यहाँ का निवर्तमान कानून। आज भी हम अंग्रेजों द्वारा बनाये गए कानून के अनुसार न्याय देने का काम कर रहे हैं। जबकि जमाना चाँद पर पहुँच चुका है। विडम्बना ही है कि भारतीय कानून में बदलते परिवेश के अनुसार स्वत:-स्फूर्त तरीके से कभी भी संशोधन नहीं किया जाता है। किराये की कोख से पैदा हुए बच्चे से जुड़ी हुई विसंगतियाँ इतनी अधिक हैं कि इस मुद्दे पर नये कानून बनाने की अविलंब आवश्‍यकता है।

यह समस्या इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि भारत में किराये के कोख का इस्तेमाल भारतीयों से कहीं अधिक विदेषी कर रहे हैं। दरअसल भारत में ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ की पद्धत्ति से औलाद प्राप्त करना अमेरिका और यूरोप से सस्ता एवं सुरक्षित है।

आज किराये की कोख पद्धत्ति से बच्चे प्राप्त करना भारत के मुम्बई और गुजरात में उघोग का दर्जा हासिल कर चुका है। आहिस्ता-आहिस्ता यह तकनीक भारत के अन्य प्रांतों में भी लोकप्रिय हो रही है। फिलवक्त भारत में किराये की कोख का बाजार एक हजार करोड़ से लेकर पांच हजार करोड़ के बीच का है।

इस तकनीक से देश-विदेश के बहुत सारे बे-औलाद परिवार आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं, पर समस्या उन विदेषी बे-औलाद परिवारों के लिए है, जो अभी तक औलाद के सुख से वंचित हैं।

किसी स्पष्ट कानून के अभाव में विदेशी भारत आकर किराये की कोख से बच्चे का सुख तो प्राप्त कर लेते हैं, किन्तु भारतीय कानून की उलझनों की वजह से वे अपने बच्चे को अपने देश नहीं ले जा पाते हैं। सबसे बड़ी परेषानी बच्चे की नागरिकता को लेकर है। ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ की पद्धत्ति से पैदा बच्चे की नागरिकता को रेखांकित या परिभाषित करना बेहद मुश्किल होता है। इसके कारण बच्चे का भविष्य अंधकारमय हो जाता है।

शायद इन उलझनों के कारण ही 15 जुलाई को 8 यूरोपीय देषों (जर्मनी, फ्रांस, पोलैंड, चेक गणराज्य, इटली, नीदरलैंड, बेल्जियम और स्पेन) ने ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ पद्धत्ति से बच्चा पैदा करवाने वाले भारत के डॉक्टरों से कहा है कि उनके वाणिज्य दूतावास की सहमति के बिना उनके नागरिकों को ‘किराये की कोख’ की सुविधा उपलब्ध नहीं करवायें। उनके इस आग्रह के पीछे तर्क यह है कि इन देषों में किराये पर कोख लेना अवैध है साथ ही इस पद्धत्ति से पैदा बच्चों की नागरिकता को लेकर विवाद भी उत्पन्न होता है। इसलिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना उचित नहीं है।

‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ पद्धत्ति से बच्चा पैदा करवाने वाले भारत के अस्तपतालों ने इन देशों के इस सकारात्मक कदम का स्वागत किया है। जाहिर है कि किराये की कोख को लेकर अनेकानेक नैतिक मुद्दे भारत में अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।

कई सालों से किराये की कोख से जुड़े हुए कानूनों पर लगातार काम करने वाले कानूनी विशेषज्ञ श्री अमित खरकानिस के मतानुसार भारत के कानून विशेषज्ञों को यथाशीघ्र इस मामले को दृष्टिगत करके स्पष्ट कानून बनाना चाहिए।

श्री खरकानिस का मानना है कि किराये की कोख के बढ़ते चलन को भी भारत में रोकना चाहिए। जीवन में पैसों का महत्व तो है, लेकिन वह सबकुछ कदापि नहीं हो सकता है। लिहाजा इस मुद्दे पर तत्काल पहल करते हुए नियंत्रण व नियमन के कार्य को प्राथमिकता देनी चाहिए, क्योंकि यह कदम पूर्ण रुप से बच्चों के हित व उनके उज्जवल भविष्य से जुड़ा हुआ है।

श्री खरकानिस के अनुसार डॉक्टरों एवं इसतरह की सुविधा को उपलब्ध करवाने वाले अस्तपतालों को यह भी ख्याल रखना चाहिए कि ‘किराये की कोख’ पर विश्‍व के कई देशों में रोक लगा हुआ है। अस्तु थोड़े से पैसों के चक्कर में वे बच्चों का भविष्य अंधकारमय नहीं बनाएं। यह काम गैरकानूनी और समाज के लिए अहितकर है।

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