लेखक परिचय

संजय कुमार

संजय कुमार

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।समाचार संपादक, आकाशवाणी, पटना पत्रकारिता : शुरूआत वर्ष 1989 से। राष्ट्रीय व स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, विविध विषयों पर ढेरों आलेख, रिपोर्ट-समाचार, फीचर आदि प्रकाशित। आकाशवाणी: वार्ता /रेडियो नाटकों में भागीदारी। पत्रिकाओं में कई कहानी/ कविताएं प्रकाशित। चर्चित साहित्यिक पत्रिका वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कमलेश्‍वर कहानी प्रतियोगिता में कहानी ''आकाश पर मत थूको'' चयनित व प्रकाशित। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा ''नवोदित साहित्य सम्मानसहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से सम्मानित। सम्प्रति: आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत।

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संजय कुमार

बिहार में महाराष्ट्र की तरह दलित आंदोलन तो नहीं दिखता है, लेकिन यहां की जमीन, दलित उत्पीड़न-जुल्म-सितम और दलित चेतना-अवचेतना से भरी पड़ी है। देशा के अन्य भागों की तरह बिहार के दलित अभी भी हाशिए पर हैं। दलित आंदोलन को लेकर महाराष्ट्र की तरह कोई बड़ा आंदोलन यंहा नहीं दिखता है। लेकिन दलित का दर्द। दलित की पीड़ा, यहां साफ झलकती है। जहां तक दलित आंदोलन को गति देने में या आंदोलन में साहित्य की भूमिका की बात है तो देखा जाए तो ज्यादा प्रभावशाली नहीं दिखता है। दलित आंदोलन से जुड़े लोगों का साफ मानना है कि यहंा ऐसा कुछ नहीं। मतलब, बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य है ?

हालांकि ऐसा नहीं है कि बिहार में दलित आंदोलन को गति देने में यहां के सहित्यकारों ने अहम् भूमिका नहीं निभायी हो। दलित और गैर दलित साहित्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं से समय-समय पर गति प्रदान करने की पूरजोर कोशिश की है, लेकिन वह धार-तेवर नहीं दिखता जो दिखना चाहिए था। एक दौऱ में बिहार में दलित आंदोलन को साहित्यकारों ने उठाया भी था लेकिन धीरे-धीरे उसमें ठहराव आने लगा और आज उसमें इतना ठहराव आ गया है कि बिहार के दलित आंदोलन में यहंा के गैर और दलित साहित्यकारों की गोलबंदी नहीं के बराबर दिखती है। हालांकि, दलित आंदोलन और दलित पीड़ा को व्यवस्था, सामाज के सामने लाने की पहल वर्षों पहले हुई थी, वह भी एक दलित के माध्यम से।

बिहार के दलित आंदोलन में हीरा डोम की भूमिका काफी सराहनीय और आज भी मजबूती लिए हुए है। हीरा डोम ने दलितों की पीड़ा संवेदना को (अपनी कविता) ‘‘अछुत की शिकायत’’ से की थी। भोजपुरी में लिखी यह कविता सरस्वती के 1914 के अंक में प्रकाशित हुई थी। इस कविता में उस समय जो दलितों की पीड़ा थी, समाज में भेदभाव था, दलित को लेकर अमानवीय व्यवहार था, उसे कविता में पीरोकर हीरा डोम ने सरकार और भगवान को घेरने की सार्थक कोशिश तो की थी। साथ ही, समाज को भी कठघरे में लाकर खड़ा किया था। हीरा डोम ने दलितों के साथ गैर बराबरी के व्यवहार को इतनी मजबूती से उठाया था कि उसके एक-एक शब्द आज भी प्रसांगिक तो है ही और दलित आंदोलन से जुड़े लोगों के समक्ष सवाल भी खड़े करते हैं कि, वर्षों बाद भी आज बिहार में दलितों के साथ वहीं व्यवहार हो रहा है जो हीरा डोम के दौर में था या उससे पहले। सरकार बदली, व्यवस्थाएं बदली, लोग बदले, समाज और देश बदला लेकिन समाज के अंदर बराबरी और गैरबराबरी का दंष नहीं हटा। दलितों की पीड़ा आज भी बिहार में या फिर दिनो-दिन घटनाओं में साफ झलकती है। मंदिर में घुसने का सवाल हो या दलितों के साथ बलात्कार, उत्पीड़न या यों कहें हर जुल्म-सितम जारी है। कहने के लिए सरकार / व्यवस्था में दलितों का राजनीतिकरण कर दिया है। दलितों के विकास और समाज के मुख्यधारा से जोड़ने के लिए महादलित आयोग बना दिया गया है लेकिन, साल दर साल गुजरता जा रहा है। दलित की पीड़ा संवेदना जस की तस है। हमारे साहित्यकार बंधु भी ठस से मस नहीं हो रहे हैं। एक दौर था जब यहां के गैर दलित साहित्यकारों ने दलित संवेदना को उठाते हुए कई रचनात्मक कार्य किये और समाज को सोचने पर विमर्श कर दिया। चर्चित कथाकार मधुकर सिंह की कहानी दुश्मन आज भी उतना ही प्रसांगिक है जितना उन्होंने उस दौर में लिखी थी। मधुकर सिंह ने लगातार दलित पिछड़ों को केंद्र बनाकर रचनाकर्म करते रहे। मधुकर सिंह के बाद मिथलेश्वर, राजेन्द्र प्रसाद, प्रेम कुमार मणि, रामधारी सिंह दिवाकर, कामेंदुु शिशिर, रामयतन यादव सहित कई लेखकों ने अपनी रचनाक्रम से दलित आंदोलन को एक आयाम देने की कोशिश की है। इस दिशा में कुछ लोग तो काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोग वही पर राजनीति की वैशाखी पकड़ चुके हैं। उनका लेखन कुंद हो चुका है। कहने के लिए वे लिख तो रहे हैं, लेकिन जो तेवर वर्षों पहले उनके लेखन में दलित संवेदना को लेकर थी वह अब नहीं दिखती है। जहां तक दलित लेखकों का सवाल है तो बिहार में दलित लेखकों का आंदोलन से भी उतना जुड़ाव नहीं हुआ जितना होना चाहिए। लगातार कोई लेखन नहीं हो रहा है। छिटपुट तौर पर दलित संवेदना को उठाते हुए आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। दलित लेखकों ने बाबूलाल मधुकर, रामाशंकर आर्या, बुद्ध शरण हंस, मुसाफिर बैठा, सुकन पासवान प्रज्ञा चक्ष्युु,, राकेष प्रियदर्शी, सहित कई रचनाकर हैं जो लिख तो रहे हैं लेकिन लगातार लिखते हुए दलित आंदोलन को जमीनी हकीकत नहीं दे पा रहे हैं।

बिहार में दलित आंदोलन को गति देने में साहित्यकारों की भूमिका के ठहराव पर मुसाफिर बैठा कहते हैं कि लेखक आज मुद्दों को छोड़कर लिख रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बिहार में दलित आंदोलन की जरूरत नहीं है यहां भी दलितों के साथ वह सब कुछ हो रहा है जो अन्य जगहों पर। वर्षों से यहंा के दलित, पीड़ित उपेक्षित हैं। जहां तक साहित्यकारों की भूमिका की बात है तो ऐसा लगता है कि सबकुछ बाजारवाद की चपेट में है और ऐसे में देखा जाए तो बिहार में न तो दलित आंदोलन दिखता है और न ही आंदोलन से जुड़ा साहित्य। दलित आंदोलन से जुड़े शिव कुमार कांत का मानना है कि वर्तमान दलित आंदोलन में भी कमी है और दलित साहित्यकार की भूमिका का इसमें घोर अभाव है। देखा जाए तो इससे जुड़े दलित साहित्यकार, दलित समाज का दर्पण नहीं बनाकर आर्थिक दर्पण बना रहे हैं और जब साहित्य में आर्थिक दर्पण दिखेगा तो वैसे में साहित्य कभी भी सामाजिक आंदोलन का दर्पण नहीं बन सकता। जैसे एच.एल. दुसाध ने डायभरसीटी पुस्तक लिख है और उसमें दलितों के आर्थिक समस्या को उठाया है।

बिहार का कथा साहित्य काफी मजबूत स्थिति में हैं। देश भर में छपने वाले साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में 75 प्रतिशत लेखक बिहार और उत्तर प्रदेश से होते हैं। इसमें बिहार की संख्या काफी होती है। पत्र-पत्रिकाओं के संपादक इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। अब सवाल उठता है कि कथा साहित्य में बिहार इतना समृद्ध होते हुए भी दलित चेतना, संवेदना और आंदोलन से क्यों नहीं जुड़ पाया। हालात यह है कि बिहार में दलित रचनाधर्मी को चिन्हित करना मुश्किल है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे निपटने की पहल तक नहीं हुई। न दलित वर्ग से और न ही गैर दलित वर्ग से। बिहार की जमीन उर्वरक तो है और इसकी पड़ताल होनी ही चाहिये कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। कभी कभी दलित व गैर दलित संस्थाओं द्वारा सेमिनार/गोष्ठी भर कर देने से कुछ नहीं होगा। एक अलग से दलित सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत यहां महसूस की जा रही है। दलित आंदोलन की गुंजाइश रहने के बावजूद यहां कुछ नहीं होने के पीछे केवल बिहार के दलित व गैर दलित साहित्यकारों/ चिंतकों को दोषी नहीं माना जा सकता है। देखा जाये तो बिहार के बाहर के दलित व गैर दलित साहित्यकारों/ चिंतकों ने भी इस दिशा में कोई कारगर पहल की शुरूआत यहां आ कर नहीं की।

दलित आंदोलन के लिए विचारधारा व जन जागृति से जुड़े मुद्दे चाहिए लेकिन इन सभी चीजों की कमी बिहार में साफ दिखती है। बिहार में दलित आंदोलन को फैलने से राजनीतिक पार्टियों से जुड़े कुछ हरिजन नेताओं पर आरोप लगाया जाता रहा है कि उनकी वजह से बिहार में दलित आंदोलन की गति अवरूद्ध हुई। बिहार में बाबा साहेब के आंदोलन को रोकने का प्रयास हुआ था। जब वर्ष 1952 में पटना के गांधी मैदान में बाबा साहेब डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर सभा को संबोधित करने आये थे, तब इस सभा में कुछ तथाकथित राजनीतिक दलों से जुड़े दलित नेताओं ने बखेड़ा खड़ा कर दिया था। सभा के दौरान बाबा साहेब पर पत्थर तक भेंके गये थे। बिहार में दलित आंदोलन को पीछे धकेलने के लिए यह घटना काफी थी। दलित आंदोलान के साथ यह राजनीति यही नहीं रूकी, बल्कि जारी रही। राजनीतिक पार्टियों पर आरोप लगता रहा कि एक साजिश के तहत दलितों का इस्तेमाल हर दल ने वोट बैंक के तौर पर किया। बिहार के सत्ता में दलित भागीदारी नहीं के बराबर रही। हालांकि बिहार की सत्ता पर दलित मुख्यमंत्री भी आसीन हुए, देश-राज्य की सत्ता में बिहार से कई दलित राजनेता शिखर पर पहुंचे, लेकिन उन्होंने राजनीति में दलित भागीदारी पर कोई कारगर प्रयास नहीं किया। राजनीतिक उदासनीता की वजह से ही आज बिहार में दलित आंदोलन हाशिये पर है। बिहार में अगड़ा-पिछड़ा की राजनीति तो खूब हुई लेकिन दलित उपेक्षित रहे। इसकी वजह साफ है राजीतिक उदासनीता और इसमें रचनाधर्मी भी शामिल रहे।

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1 Comment on "बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य"

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अभिषेक पुरोहित
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har dusari lain m dalit dalit करने का बाद भी आप जैसे चिन्तक जातिवादी नहीं होते ,ओउर ham pathak agar is par nakaratm kament kar de तो पल में जातिवादी हो जाते है वैसे अपने सही लिखा है की नेताओ ने दलितों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया व् बदले में कुछ diya नहीं न उनके जीवन स्तर को उठाने में कोई सार्थक पहल की ,ज्यादा अस्म्तोश होता तो आरक्षण का शिफुका छोड़ देते है par yah नहीं batate है की jab nokariya ही नहीं है तो फायदा कैसे milega?/ jab adhikansh bachche bich में hi पढाई छोड़ देते… Read more »
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