लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव- aap

अपनी जिद, जुनून और जज्बे को साथ लेकर आम आदमी सत्ता की कीचड़ में सफाई के लिए खड़ा हो गया है। वह दलित और वंचित तबके का आम आदमी ही होता है, जो गटरों में गहरे धंसकर अधिकतम गंदगी को साफ करके पवित्रतम जलस्त्रोतों को पीने लायक बनाए रखता है। भ्रष्टाचार ने उन सभी प्रशासनिक हलकों को गंदा कर दिया है। इनकी जबावदेही ईमानदार प्रशासनिक व्यवस्था देने की थी जिससे आम आदमी का ज्यादातर जीवन सुखी बना रहता। लेकिन नेता, नौकरशाह और ठेकेदार के भ्रष्ट गठजोड़ ने आम आदमी से जुड़े महकमों को इतना जटिल व दल-दल से भर दिया कि आज आम आदमी उसके किनारे पर खड़ा होने से ही घबराता है। ऐसे में यदि दिल्ली राज्य के मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल शपथ लेने के बाद कह रहे हैं ‘अन्ना हजारे कह रहे थे कि राजनीति कीचड़ है इससे दूर रहो। लेकिन मैं उन्हें समझता था कि कीचड़ में घुसकर ही सफाई करनी होगी‘। अब साहस जुटाकर अरविंद सत्ता की कीचड़ में धंसे हैं तो जनतंत्र को सुरक्षा देने वाले जो खबरपालिका और स्वंयसेवी संगठनो जैसे कारगर माध्ययम हैं, उनका दायित्व बनता है कि वे अरविंद को प्रोत्साहन की रस्सियों से थामे रहें। क्योंकि वैसे ही कांग्रेस और भाजपा के रूप में उनके एक और कुआं, तो दूसरी ओर खाई है। हालांकि मीडिया के माध्यम से अबतक इन दोनों नाथों को नाथने में अरविंद और उनकी आम आदमी पार्टी सफल रहे हैं। अलबत्ता यह रचनात्मक सहयोग अरविंद की इस अग्नि-परीक्षा में पूरे समय बना रहना जरूरी है, क्योंकि वे कांग्रेस के समर्थन से अल्पमत सरकार चला रहे हैं।

जनमत के सहारे आम आदमी का समर्थन जुटाकर भ्रष्टाचार से मुक्ति व जनपक्षीय सरोकरों को अनेक दल और नेता प्राथमिकता देते रहे हैं। वामदलों की बुनियाद तो इन्हीं सरोकरों पर टिकी थी, लेकिन वे न तो जनपक्षीय अपेक्षाओं पर खरा उतर पाए और न ही दीर्घकालिक राजनीति से जुड़े होने के बावजूद पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे सीमांत प्रदेशों से बाहर निकल पाए। दलित, वंचित व सर्वहारा वामदलों के घोषणा पत्रों में तो प्रमुखता से रहे, लेकिन वे गरीब के लिए रोड़ा बने वैध-अवैध स्थापित मानदंडों को नहीं तोड़ पाए। इसके उलट बंगाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने लड़ी। यही नहीं ममता बनर्जी ने आम आदमी के हितों के लिए संघर्ष व प्रतिरोध लगातार 35 साल किया, तब जाकर वे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी और आज भी वे पूरी जीवटता से जनपक्षीय सरोकारों की अग्रदूत बनी हुई हैं। निम्न व मध्य वर्ग के सरोकरों से समझौता नहीं करने के चलते ही मामता ने रेल किराया बढ़ाए जाने पर केंद्रीय सत्ता में भागीदार अपनी ही पार्टी के रेल मंत्री अरविंद त्रिवेदी से इस्तीफा लिया और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को लेकर डॉ मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली संप्रग सरकार से समर्थन भी वापस लेने में कोई देर नहीं की थी। भ्रष्टाचार और महंगाई के विरूद्ध निर्णय लेने की इसी हिम्मत व सक्षमता ने तृणमूल को बंगाल में हुए ग्राम पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में जीत के सहरे से नवाजा।

अरविंद केजरीवाल जनपक्षीय मुद्दों को व्यवस्था परिर्वतन के माध्यम से हल करने की पैरवी करते हुए दिल्ली की गद्दी पर बैठे हैं। उनसे व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद इसलिए बढ़ी है क्योंकि उनकी कथनी और करनी में अब तक एकरूपता देखने में आती रही है। इसलिए लगता है, वे जन-अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे। हालांकि उनकी कार्यशैली को पारंपरिक या वंशवाद की विरासत से आगे बढ़ने वाले राजनेता बड़बोलापन मानकर नकारते रहे हैं, क्योंकि वे भयभीत हैं कि उनकी पारंपरिक विरासत में सेंध न लग जाए ? वैसे भारतीय राजनीति में नए लोगों का राजनीतिक पटल पर उदय होना कोई नहीं बात नहीं है। जेपी अंदोलन से जहां लालू, मुलायम, नीतीश और शरद यादव जैसे नेता निकले, वहीं कांशीराम के डीएस-4 जैसे आंदोलन से बहुजन समाज पार्टी और मायावती उभरी। लेकिन ये सत्ता पर काबिज होने के जनपक्षीय सरोकारों से दूरी बढ़ाकर जातीय व सांप्रदायिक बे-मेल गठबंधनों और आभिजात्य वैभव का शिकार हो गए। इनका जनपक्षीय विषमताओं का निदान, महज आरक्षण के विधानों में सिमटकर रह गया। लालू, मूलायम और मायावती तो खुद अनुपातहीन संपत्ति और भ्रष्टाचार के जंजाल में फंस गए। यही हश्र कांग्रेस और उसके ज्यादातर गठबंधन के सहयोगियों का हुआ, जबकि भ्रष्टाचार से लड़ाई का मुद्दा इनकी प्रमुख प्राथमिकता होना चाहिए था। भारतीय लोकतंत्र की यह विषेशता है कि जब निर्वाचित प्रतिनिधियों और जनता के बीच दूरी बढ़ जाती है, तो मतदाता बदलाव की मानसिकता बना लेता है। आप की भ्रष्टाचार के विरूद्ध ताकतवर उपस्थिति ने ऐसे हालात बना दिए हैं कि राहुल गांधी महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार द्वारा खारिज कर दिए गए आदर्श सोसाइटी घोटाले प्रकरण पर तीखा तंज क हुए पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। चारा घोटाले में सजा पाए लालू यादव को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा फजीहत झेलनी पड़ रही है। कांग्रेस के मंच से तरफदारी के बावजूद, लालू को कांग्रेस घास नहीं डाल रही ? कांग्रेस भ्रष्टाचार के दागों से पीछा छुड़ाने के लिए तब आमदा हुई है, जब चिड़िया सारा खेत चुग गई है।

अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को नागरिक समाज द्वारा किए आंदोलन से जो अप्रत्याशित सफलता मिली है, वह जनलोकपाल लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी लड़ाई का परिणाम है। इस लड़ाई में आप के संकल्प और तेवर जिस तरह से सत्ता संभालने के बाद अनवरत बने हुए हैं, उन्हें देखते हुए दिल्ली की नौकरशाही के चेहरे पर बैचेनी की शिकन उभर आई हैं। अन्यथा ज्यादातर राजनेता सत्ता पर काबिज हो जाने के बाद नौकरशाही के सुर में सुर मिलाने लग जाते हैं। लेकिन केजरीवाल ने परंपरा के विपरीत जाते हुए ऐलान किया कि ‘कोई कर्मचारी आप से काम की रिश्वत मांगता है तो उससे सेटिंग कीजिए और उसे रंगे हाथों पकड़वाने में मदद कीजिए‘। संविधान व गोपीयनता की शपथ लेने के बाद देश के इतिहास में भ्रष्टाचार से लड़ने की ऐसी हिम्मत शायद अब तक किसी अन्य मुख्यमंत्री ने नहीं दिखाई। हालांकि यह संवाद उन्हीं के संकल्प का दोहराव है। हमारे देश के राजनेताओं की यह चरित्रजन्य विडंबना रही है कि सत्ता हाथ आने के बाद अकसर वे दोहरे चाल, चरित्र और चेहरे के शिकार हो जाते हैं। वे नौकरशाही के चरित्र और मंशा के अनुरूप अपने चरित्र और मंशा का ढालने लग जाते हैं। विधायिका और कार्यपालिका की यही एकरूपता भ्रष्टाचार करने के  परस्पर सहयोगी कारक बन जाता हैं। जबकि जनहितैषी मसलों के परिपेक्ष्य में विधायिका और कार्यपालिका भेद प्रत्यक्ष दिखता रहना चाहिए ? जैसा कि अरविंद अपनी कार्य-पद्धति से प्रगट कर रहे हैं।

चूंकि अरविंद खुद एक भ्रष्ट संस्था में आधिकारी रहे हैं, इसलिए वे अच्छे से जानते होंगे कि भ्रष्टाचार से मुक्ति की ढींगें हांकने से कहीं ज्यादा कठिन उसे नियंत्रित कर पाना है ? इसी तथ्य के मद्देनजर अरविंद भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की बात कह रहे हैं। और इस हेतु नौकरशाही को साधने की बात भी कह रहे हैं। उन्होंने साफ तौर से कहा कि ‘अधिकारी वही रहेंगे, सिर्फ अदला-बदली की जाएगी। इसलिए ईमानदार अधिकारियों से अपील है कि अपना  साथ देकर देश की सेवा में भागीदार बनें‘। दरअसल, राजनीति के शुद्धीकरण की कोशिशों के साथ अब यह जरूरी हो गया है कि बड़े पैमाने पा प्रशासनिक सुधारों की दिशा में उल्लेखनीय पहल हो ? क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा के सभी छोटे-बड़े स्त्रोत नौकरशाही के गर्भ से ही निकलते हैं। हालांकि आप को भी अपनी वाणी को थोड़ा उदार बनाने की जरूरत है जिससे विधायिका और कार्यपालिका के बीच अनावश्यक दूरी न बनी रहे ? हालांकि अरविंद  ने राजनीति में  मूल्य और नैतिक शुचिता की जो शुरूआत की है, उसे प्रणाम करने को जी चाहता है।

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1 Comment on "कीचड़ में खड़ा आम आदमी"

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बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

बहुत अच्छा लेख, बस एक बातकहना चाहूंगी,ममता बैनर्जी की सादगी और ईमानदारी प्रशंसनीय है, परन्तु वो कुशल प्रशासन नहीं कर पांई।

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