लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

Posted On by &filed under कहानी, साहित्‍य.


market-triolet_blogger
रामलाल रेलवे स्टेशन पर फलों की ठेली लगाता था। बिहार के अपने गांव से बारह साल पहले जब वह यहां आया था, तब उसकी उम्र खेलने-खाने की थी; पर पेट की भूख क्या नहीं करा लेती ? शुरू मंे तो उसने स्टेशन के बाहर एक होटल में बरतन साफ किये। फिर स्टेशन पर फल बेचने वाले ठेकेदार ने उसे एक ठेले पर रखवा दिया।
वह ठेकेदार और ठेले वाला मामराज दोनों बिहार के ही थे। इसलिए उसे कोई विशेष तकलीफ नहीं हुई। खाने और रहने की व्यवस्था मामराज के पास ही हो गयी। मामराज का परिवार भी वहां काम करने वाले अधिकांश बिहारी मजदूरों, कुलियों आदि की तरह गांव में ही रहता था। इसलिए अपनी तरफ के एक लड़के को अपने पास रखने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई। साथ-साथ रहने से दोनों को बड़ा आराम भी हो गया। रामलाल भी उसे चाचा कहने लगा था। दोनों का आपसी प्यार देेखकर अधिकांश लोग उन्हें सगा चाचा-भतीजा ही मानने लगे थे।
रेलवे स्टेशन पर काम करने से रामलाल को कई लाभ थे। महीने-दो महीने में गांव या आसपास का कोई आदमी मिल जाता था, जिससे घर के हाल-समाचार मिलते रहते थे। वरना चिट्ठी लिखना तो उसके घर में कोई जानता नहीं था और टेलिफोन उनके लिए कल्पना की वस्तु थी।
पिछली बार जब उसकी मां बहुत बीमार थी, तो उसे ऐसे ही एक यात्री के माध्यम से संदेश मिला था। संदेश मिलते ही उसने चाचा को सारी बात बतायी। मामराज ने उसे दो हजार रु. दिये और तुरन्त गांव जाने को कहा। जब वह गांव पहुंचा, तो मां की हालत सचमुच ही नाजुक थी। वैसे तो वह पिछले काफी समय से बीमार चल रही थी। जिसका एकमात्र बेटा उससे दूर रहता हो, उस मां की पीड़ा कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। यद्यपि दोनों एक-दूसरे की मजबूरी समझते थे, फिर भी मन तो मन ही है।
लेकिन अब रामलाल के आने से मां की जान में जान आ गयी। रामलाल ने भी महीना भर गांव में रहकर उसका ठीक से इलाज कराया। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मां ने अच्छा मौका देखकर रामलाल की शादी भी करा दी। रामलाल की बड़ी इच्छा थी कि विवाह में मामराज चाचा अवश्य शामिल हों; पर सब काम इतनी जल्दी में हुआ कि उन तक संदेश भिजवाने का अवसर ही नहीं मिला। विवाह से घर के कामकाज को संभालने वाली बहू आ गयी और मां को काफी आराम हो गया। विवाह के बाद रामलाल जल्दी-जल्दी घर आने लगा। हर बार वह कुछ पैसे भी लाता था। इस प्रकार गृहस्थी की गाड़ी ठीक पटरी पर चलने लगी।
मामराज अच्छे दिल का आदमी था। विवाह के बाद उसने रामलाल का वेतन बढ़ा दिया और उसके नाम से बैंक में खाता भी खुलवा दिया, जिससे कुछ बचत होने लगी। मामराज सुबह ही स्टेशन पर चला जाता था। आठ बजे पंजाब मेल और नौ बजे स्यालदा वहां आती थी। इन दोनों गाड़ियों का काम निबटाते तक रामलाल वहां आ जाता था। रामलाल खुद खाना खाकर तथा मामराज के लिए बनाकर छोड़ आता था। उसके आने के बाद मामराज कमरे पर जाकर नहा-धो लेता था। खाना खाकर और बाजार का काम निबटा कर दो बजे वह फिर आ जाता था। शाम को दोनों मिलकर खाना बनाते और खाते थे। उनके कमरे के आसपास अधिकांश उनके जैसे ही कामदार लोग बसे थे। उनके साथ गपशप कर और गा बजाकर वे सो जाते थे। अगले दिन फिर गाड़ी उसी निर्धारित लाइन पर चल पड़ती थी।
पर इस निर्धारित और सुखद दिनचर्या में एक दिन व्यवधान पड़ गया। मामराज किसी काम से अपने गांव गया था। वहां एक दिन अचानक खेत में उसे एक काले सांप ने काट लिया। जब तक घर वालों को यह समाचार मिला, तब तक तो उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे। मामराज के घर वाले भी उस जैसे ही भले थे। उन्हें रामलाल के बारे में पता था। सबने मिलकर निर्णय किया कि अब मामराज का ठेला रामलाल को ही सौंप दिया जाए। तेरहवीं के बाद उसके घर वालों ने आकर रामलाल को इस निर्णय की जानकारी दी। रामलाल को तो उनके आने पर ही चाचा की दुखद मृत्यु का समाचार मिला; पर अब क्या हो सकता था ? उसने दुखी मन से पूरे काम को संभाल लिया।
अब तक तो वह खाना बनाकर दस बजे के बाद ही स्टेशन पर आता था; पर अब उसे सुबह से शाम तक सब गाड़ियों का काम देखना था। आज उसका सुबह आने का पहला ही दिन था। वह आकर ठेले पर फल सजा ही रहा था कि सिपाही राघवेन्द्र सिंह आ पहुंचा। वह उसे अच्छी तरह पहचानता था, चंूकि उसकी ड्यूटी प्रायः स्टेशन पर ही रहती थी; पर आज वह कुछ और ही मूड में दिखायी दिया। आते ही उसने दो किलो सेब तोलने का फरमान जारी कर दिया। जब तक रामलाल सेब तोलता, तब तक वह बिना पूछे चार केले खा गया। रामलाल ने सेब देकर जब पैसे मांगे, तो वह हंस पड़ा, ‘‘क्यों तेरे चाचा ने मरने से पहले तुझे ‘स्टेशन के कानून’ नहीं बताये, जो पैसे मांग रहा है ?’’
‘‘साब जी, मैं तो सुबह के समय आज पहली बार ही आया हूं। अभी तो बोहनी भी नहीं हुई। चाहे आप कुछ पैसे कम दे दें; पर…….।’’ राघवेन्द्र सिंह एक बार फिर जोर से हंसा, ‘‘ले बोहनी के पैसे। बोल कितने दूं ?’’ इतना कहकर उसने दो डंडे रामलाल की पीठ पर जड़ दिये, ‘‘कुछ और भी दूं क्या ?’’ रामलाल पीठ सहलाते हुए बोला, ‘‘जी नहीं, इतना ही काफी है।’’
इन दो डंडों ने रामलाल को बोहनी के साथ-साथ ‘स्टेशन के कानून’ भी समझा दिये थे।
– विजय कुमार,

Leave a Reply

1 Comment on "स्टेशन के कानून"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
बी एन गोयल
Guest
बी एन गोयल

सदा की तरह सीधे सादे शब्दों में गहरी बात कह देना -बधाई

wpDiscuz