लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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देशवासी ही नहीं, देश से हजारों किलोमीटर दूर विदेशों में बसे भारतीय भी आज महसूस करते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में भारत की भविष्यक दिशा और दशा में सुधार के लिए अब नीति विकल्प सहित स्पष्टता, संकल्प और प्रतिबद्धता की नितांत आवश्यकता है. यदि देश को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा में जीतना है और इस सदी को भारत की सदी बनाना है तो इसके लिए मात्र नारेबाजी पर्याप्त नहीं है. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर दृष्टि से भारत की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ठोस कदम भी उठाने होंगे. आज जैसा राजनीतिक परिवेश भारत में है उसे दृष्टिगत रखते हुए यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय सोच और किंचिद प्रशासकीय व्यवस्थाओं में सुधार की आवश्यकता है जिसे भ्रष्टाचार विरोधी जन आन्दोलन लगातार रेखांकित कर रहे हैं. देश की दशा को सुधारने के लिए दिशा में परिवर्तन लाना होगा. फिलहाल तो ऐसा लगता है कि वर्तमान परिस्थितियों में देश राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसी संदर्भ में दूरगामी दिशा परिवर्तन के लिए अब राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन की आवश्यकता भी महसूस की जाने लगी है.

इस सन्दर्भ में, वर्ष २०१४ में होने वाले लोकसभा चुनावों के दृष्टिगत, राजनीतिक दलों की पैंतरेबाज़ी बढने लगी है. कांग्रेस में युवराज राहुल को अंतत: प्रधानमंत्री पद पर आसीन करने के इरादे से कदम आगे बढ़ाया जा चुका है. वर्तमान सत्ताधारी दल अपनी रणनीतिक दिशा निर्धारण कर रहा है या कर चुका है. मुख्य विरोधी दल भाजपा भी अब, अध्यक्ष पद सम्बन्धी उभरी समस्या के निदान के बाद, अपनी रणनीति के निर्धारण में जुटी है. भारत में जिस तरह का संसदीय लोकतंत्र है उसमें प्रधानमंत्री के पद के लिए पहले से ही किसी नाम के निर्धारण की बाध्यता नहीं है. संवैधानिक व्यवस्था यही है कि लोकसभा के चुनावों के बाद बहुमत प्राप्त संसदीय दल के द्वारा चुना जाने वाला नेता इस पद को ग्रहण करता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस व्यवस्था को ताक पर रखते हुए चुनावों से पहले ही प्रधानमंत्री पद के लिए नाम तय करने की प्रथा ने बल पकड़ा है जैसा राष्ट्रपतीय प्रणाली के तहत अमरीका में होता है. भाजपा में भी इस पर गहरा मंथन चला है कि उसकी ओर से किसका नाम आगे लाया जाए क्योंकि ऐसा करने के लिए उसके विरोधियों के बावजूद मीडिया का भी दबाव बढता रहा है. भाजपा के नेतृत्वमंडल में इस पद के योग्य अधिकारियों का अभाव नहीं है.

६ फरवरी २०१३ के दिन नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में आयोजित एक सभा में बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थी युवा पीढ़ी के समक्ष बोलते हुए अपनी विकास योजनाओं का खुलासा किया. उनके भाषण के दौरान सभा कक्ष में जहां तन्मयता के साथ सैकड़ों युवा उनका ओजस्वी भाषण सुन रहे थे कालेज के द्वार पर ऐसे लोग भी जमा थे जो उनके विरोध में नारेबाजी कर रहे थे. श्री मोदी के लिए आयोजित सभा शांतिपूर्वक सम्पन्न हुई. जहां तक उनके भाषण के बाद उनके श्रोता युवाओं का सम्बन्ध है उनके मन पर मोदी का चर्चित ‘विकास मॉडल’ अपनी गहरी छाप अंकित कर गया है. टेलिविज़न पर हुईं चर्चाओं में इस बात की पुष्टि होती दिखाई दी कि मोदी ने गुजरात से दिल्ली की तरफ अपने कदम बढ़ाने के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं. प्रकटत: भाजपा और संघ की पूर्व सहमति के संकेत के बिना यह संभव नहीं था.

बेशक मोदी के विरोध में अब तक निराधार सिद्ध हुए स्वर उनके धुर विरोधियों ने कभी कम नहीं होने दिए और न ही वे कम होने देंगे, लेकिन राज्य विधान सभा के लिए गत दिसम्बर में हुए चुनावों में तीसरी बार जीतने के बाद इसमें शक की कोई गुंजायश नहीं बची कि मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं हुई है. अपने राज्य और देश के लिए उनकी उपलब्धियों ने उन्हें और देश को निश्चित ही एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया है. इसलिए क्योंकि उनके नेतृत्व में किए गए और किए जाने वाले विकास कार्यों का लाभ प्रदेश की जनता को बराबर मिला है. इसकी मुखर चर्चा का अवसर उन्हें और भाजपा को ज्यों ज्यों और जहां कहीं करने को मिलेगा राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी की लोकप्रियता का दायरा समूचे देश के अन्दर बढ़ेगा. ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि गुजरात में उनकी कार्यशैली से जिस प्रकार अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी ख्याति हुई है उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता. अमरीका तक के वाणिज्य जगत में उनके नाम और उनके नेतृत्व में गुजरात में हुए विकास की चर्चा हुई है.

दिल्ली में, गुजरात के ‘विकास मॉडल’ पर प्रकाश डालते हुए अपने भाषण में मोदी ने कहा कि “हिन्दुस्थान गरीब नहीं है. उसके पास अपार प्राकृतिक सम्पदा है. हमने उसका पूरी तरह उपयोग नहीं किया है… आज सारे विश्व का ध्यान हिन्दुस्थान की ओर लगा है. समय की मांग है कि हम विश्व को बाज़ार बनाएँ. हम क्यों न ऐसा करें कि सर्वत्र भारत में निर्मित चीजों की मांग बढे और उनकी उपलब्धि हो.” गुजरात से उठी इस विकास लहर में किए गए प्रयोगों की चर्चा करते हुए उन्होंने ‘स्किल, स्पीड एंड स्केल’ यानि ‘कला, गति और आकार’ के महत्व पर बल दिया. इसके साथ ही ‘ज़ीरो डिफेक्ट’ यानि बिना किसी त्रुटि के चीजों के निर्माण पर जोर देने की कड़ी नीति अपनाने के संकल्प की बात कही. इस तरह के विवरण और विश्लेषणों से परिपूर्ण उनके भाषण के सभी पक्षों का गंभीर अध्ययन एक ऐसे व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता है जो सफल प्रयोगों की भूमिका के साथ आत्मविश्वास, संकल्प एवं प्रतिबद्धता सहित देश को दिशा प्रदान करने की क्षमता रखता है. देश को सुराज प्रदान करने और भारत को विश्वगुरु पद पर आसीन करने के वादे को पूरा करने का प्रमाणिक अहसास देता है.

भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व क्षमता का निश्चित ही अभाव नहीं है. इसीलिए प्रधानमंत्री पद के लिए एक नाम पर सहमति उतनी आसान नहीं रही है जितना कि कांग्रेस के लिए है जहां वंशवाद के हावी बने रहते राहुल के नाम के सिवा और कोई आगे आने को तैयार नहीं है. लेकिन यदि, जैसी कि बलवती सम्भावना है, भाजपा का संसदीय बोर्ड नरेन्द्र मोदी के नाम पर मुहर लगा देता है तो यह निर्णय भाजपा और देश के लिए हितकर ही सिद्ध होगा. आज देश मात्र सत्ता में दल परिवर्तन ही नहीं चाहता बल्कि सुशासन भी चाहता है. आम जनता कांग्रेस के कुशासन से तंग है. ऐसी स्थिति में भाजपा के लिए यह जरूरी है कि वह एकमत से उस प्रस्तावित नाम की विधिवत घोषणा करे जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर वह जनता की इस अपेक्षा की कसौटी पर पूरा उतरना चाहती है.

कोई यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के गुजरात में श्री मोदी की विकास योजनाओं के फलस्वरूप राज्य के लोगों को पहुंचे लाभ का सही मूल्यांकन करे तो यह तथ्य स्वत: सामने आता है कि प्रदेश की जनता उनके काम से संतुष्ट है. विदेशों में बसे गुजराती उनकी उपलब्धियों की चर्चा करते नहीं थकते. इस पर भी किसी भी नेता का किसी न किसी कारण विरोध होना लोकतंत्र की परम्परा है. श्री मोदी जिन्हें विवादों के घेरे में डाले रखने के प्रयत्नों में कोई कमी नहीं रही यदि राष्ट्रीय राजनीति के रणांगन में कदम रखते हैं तो एक बार फिर से विरोध का तवा गर्माएगा. लेकिन जैसा कि देखने में आया है सतत विरोधों के साए में भी विजय प्राप्त करने वाले भाजपा नेताओं में मोदी ने स्वयं को एक ऐसा नेता सिद्ध किया है जो अपूर्व आत्मविश्वास के साथ सर्व-जन हितकारी विकास का दिशा निदेशन करता हुआ छाती ठोक कर खड़ा है. भाजपा देश को सुशासन देने का वादा करती है और श्री मोदी ने सुशासन देने का प्रमाण देने में कोई कमी नहीं की है. श्री अटल बिहारी वाजपेयी को देश के एक अत्यंत सफल एवं लोकप्रिय प्रधानमंत्री के नाते सम्मान दिया जाता है. कोई विस्मय नहीं होगा यदि श्री नरेंद्र मोदी को भी २०१४ में भाजपा या भाजपानीत गठबंधन की सरकार बनने की स्थिति में, राष्ट्रीय स्तर पर नई उपलब्धियां दर्ज कराने का वैसा ही अवसर मिले.

आने वाला समय चुनौतियों से भरा है जिसमें बाहर से प्रायोजित कट्टरपंथी मज़हबी आतंकवाद और देश के अन्दर व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाने और भारत को सर्वांगीण विकास पथ पर अग्रसर करने की त्वरित और महती आवश्यकता है. इसके लिए श्री मोदी के द्वारा देश के युवाओं के समक्ष हाल में उच्चारित मन्त्र ‘स्किल, स्पीड एंड स्केल’ यानि ‘कला, गति और आकार’ की ही देश को आवश्यकता है. साथ में ‘ज़ीरो डिफेक्ट’ यानि ‘त्रुटिरहित’ ऐसे एकात्म राष्ट्र निर्माण की भी आवश्यकता पूरी करना होगी जहां का एकमात्र धर्म मात्र भारतीयता ही होगा.

 

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1 Comment on "दिशा और दशा परिवर्तन की टोह लेता भारत"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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मोदी को खुद भाजपा पी ऍम nhi चाहती अगर वेह tyyar हो भी गयी तो न्द ke ghtk iske liye razi नही हो सकेंगे और kisi jadoo से ये भी हुआ तो याद रखना देश में गुजरात का हिन्दू मॉडल कभी लागू नही होगा.

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