लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव- sushma
चुनावी हवा का रुख भांपकर दलबदल और दागी भाजपा में शामिल होने की होड़ में लगे हैं। सत्तामोह की लालच में भाजपा ने भी नैतिक और शुचिता के संघीय पाठ को भुलाकर दागियों को गोद लेने का सिलसिला तेज कर दिया है। दागियों की इस ताजा फेहरिस्त में हरियाणा में कांग्रेस विधायक और जोसिका लाल हत्याकांड में सजायाफ्ता मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा एनडीए में और कर्नाटक के बहुचर्चित खनन घोटाले में नामजद आरोपी श्रीरामुलु भाजपा में दाखिल हुए हैं। भाजपा में इन विलयों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। सुषमा स्वराज ने सोशल मीडिया पर तीखा विरोध जताकर पार्टी को झटका दिया है। यदि पार्टी ने सुषमा के ऐतराज को चेतावनी के रूप में नहीं लिया तो उसके लिए दागियों को गोद में बिठाने की ये कोशिशें आत्मघाती भी सिद्ध हो सकती हैं ?
चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भाजपा नेतृत्व वाले राजग गठबंधन की बढ़त से लालायित होकर दूसरे दलों के दागी और दलबदलू गिरगिट की तरह रंग बदलने पर उतारू हो गए हैं। दागी और दलबदलू, निष्ठावानों से कहीं ज्यादा अवसरवादी और दूरद्रष्टा होते हैं। इसलिए वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देख रहे हैं, तो सत्ता-सुख के इन भोगियों का पलायन उनके निजी हित साधन के लिए तो ठीक है, लेकिन यह समझ से परे है कि मोदी के नेतृत्व में माहौल राजग गठबंधन के पक्ष में है तो वह कयों दागियों को बेवजह महत्व दे रही है ? यदि वाकई माहौल मोदी के पक्ष में जैसा दिखाई दे रहा है तो तय है, तमाम दागी और क्षेत्रीय दल इस आंधी में तिनके की तरह अपना वजूद खो बैठेंगे ? लेकिन माहौल यदि औद्योगिक घरानों और मीडिया प्रबंधन की बदौलत रचा गया है तो नतीजे ढाक के तीन पात भी हो सकते हैं। इसलिए भाजपा को सुशमा स्वराज के सबक को सही वक्त पर दी चेतावनी के रूप में लेने की जरूरत है।
भाजपा को ख्याल रखने की जरूरत है कि 90वें दशक में जब वह विस्तार के देशव्यापी फलक पर स्थापित हो रही थी, तब उसका चाल, चरित्र और चेहरा कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों से भिन्न था। इसी बूते भाजपा ने कई राज्यों में सरकारें बनाईं और केंद्र में भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन इसके बाद भाजपा छद्म इंडिया शाइनिंग के प्रबंधों और दागियों व भ्रष्टाचारियों से बेमेल गठबंधनों के मोहपाश में उलझकर अपना क्षरण अपने ही हाथों करती रही। अब मोदी के नेतृत्व में यदि उसे केंद्र में सरकार बनाने की उम्मीद दिख रही है तो दागियों के पीछे भागकर इस उम्मीद को पलीता लगाने की जरूरत कतई नहीं है ?
जाहिर है, दागियों के मुद्दे पर भाजपा को आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है, क्योंकि ऐसी गलतियां पहले भी करके पार्टी ने भूल सुधार की कोशिश नहीं की है। वेंकैया नायडू के अध्यक्ष रहते हुए बहुचर्चित नीतीश कटारा हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त विकास यादव के पिता डीपी यादव को चुनाव के ऐन वक्त पर पार्टी में शामिल कर लिया गया था। इस पहल की मीडिया, जनता व खुद पार्टी में इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी कि अगले ही दिन उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। उत्तर प्रदेश से ही बहुजन समाज पार्टी की सरकार में खनन व सहकारिता मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाह को विधानसभा चुनाव के अवसर पर पार्टी में शामिल करने का यही हश्र भुगतना पड़ा था। तब राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष थे। बाबू सिंह भ्रष्टाचार के कटघरे में थे। सीबीआई जांच में वे दोषी पाए गए और एफआईआर दर्ज हुई। मायावती ने उन्हें लगे हाथ पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन षुचिता की राह पर चलने का दावा करने वाली भाजपा ने हाथों हाथ बाबूसिंह को पार्टी में शामिल कर लिया। हालांकि मीडिया में विरोध और पार्टी में किरकिरी के चलते भाजपा ने तत्काल से बाबू सिंह से पीछा भी छुड़ा लिया था। अब बाबू सिंह बीते छह माह से जेल में हैं। बाबू सिंह को भाजपा में ले लिए जाने के बावजूद पार्टी कोई कारगर नतीजे नहीं दे पाई थी ?
अब पार्टी में ताजा ऐतराज श्रीरामुलु और विनोद शर्मा को शामिल करने पर दिखाई दे रहा है। इस मुद्दे को लेकर सुषमा स्वराज मुखर विरोधी के रूप में सामने आई हैं। श्रीरामुलु अवैध उत्खनन के लिए कर्नाटक के जर्नादन रेड्डी बंधुओं के करीबी रहे हैं। जब रेड्डी बंधुओं पर अवैध उत्खनन के मामले में सीबीआई ने कार्रवाई की तो उनके साथ-साथ श्रीरामुलु ने भी भाजपा छोड़ दी थी। फिर श्रीरामुलु ने अवैध खनन से कमाए धन के बूते 2012 में बीएसआर कांग्रेस नाम से एक नया राजनीतिक दल खड़ा कर दिया। बीते साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस दल को तीन फीसदी वोटों के साथ चार सीटों पर जीत भी मिली। इन चुनाव नतीजों के बाद जब भाजपा ने अपनी हार का आकलन किया तो इस नतीजे पर पहुंची कि यदि श्रीरामुलु और बीएस येदियुरप्पा की पार्टी के बीच मत विभाजन न हुआ होता तो कर्नाटक में भाजपा को मुंह की खानी नहीं पड़ती। इस आत्म निरीक्षण ने और लोकसभा में विजय की चिंता ने येदियुरप्पा के लिए पार्टी में प्रवेश के द्वार खोले और अब श्रीरामुलु को खोल दिए। संभव है, कुछ दिनों में रेड्डी बंधु भी भाजपा की देहरी पर खड़े दिखाई दें ? तय है नैतिकता के सभी तकाजों को ताक पर रखकर भाजपा देष की प्राकृतिक संपदा के लुटेरों को गले लगाने में लगी है।
हरियाणा में कांग्रेस से बगावत करके इंद्रजीत सिंह पहले ही भाजपा में षामिल हो चुके हैं। अब कट्टर कांग्रेसी रहे विनोद षर्मा ने हरियाणा जनहित कांग्रेस में उपस्थिति दर्ज कराकर, भाजपा के निकट आने का रास्ता तय किया है। हजकां राजग गठबंधन का हिस्सा है। अवसरवादी विनोद शर्मा की मंशा है कि यदि राजग केंद्रीय सत्ता में आती है तो वे हजकां की ओर से मंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे। हालांकि विनोद शर्मा हजकां के प्रमुख कुलदीप विश्नोई के माध्यम से भाजपा में शामिल होकर करनाल से लोकसभा चुनाव लड़ने की कशिश में थे। इसके लिए उन्होंने राजनाथ से कई मुलाकातें कीं, लेकिन राजनाथ ने पार्टी में ही अंदरुनी विरोध के चलते असमर्थता जता दी थी। दरअसल विनोद षर्मा षराब के बड़े कारोबारी हैं, लिहाजा वे अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने की दृश्टि से भाजपा में आना चाहते थे, न कि भाजपा के हित के लिए ? इसलिए पार्टी में सवाल उठ रहे थे कि जो नेता मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा सरीखे अपने तीस वर्षों के साथी व कांग्रेस के साथ दगाबाजी कर सकता है, तो उस पर भाजपा भरोसा क्यों करे ? वैसे भी जो पार्टी सार्वजनिक जीवन में षुचिता, नैतिकता और पारदर्शिता की बात करती हो, वह शराब व्यापारी व जोसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा के पिता को कैसे साथी बना सकती है, जिसे अपने बेटे के कारण हरियाणा में मंत्री पद गंवाना पड़ा था। इस हत्या की सजा मनु शर्मा आजीचन कारावास के रूप में भुगत रहे हैं।
वैसे ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो को भी राजग का हिस्सा बनाने की कोशिश चल रही है। चौटाला भी शिक्षक भर्ती घोटाले के सजायाफ्ता हैं। दूसरे विनोद शर्मा और चौटाला एक-दूसरे को फूटी आंख भी नहीं सुहाते, लिहाजा हजकां की उपस्थिति में इनेलो का राजग में विलय संभव ही नहीं है। भाजपा में रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के दलों के विलय के समय भी पार्टी के भीतर इन गठबंधनों के विरोध में आवाज उठी थी, क्योंकि गुजरात की एक सभा में नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश और बिहार के नेताओं को जातिवादी कहा था, लेकिन अब वे खुद इन दोनों राज्यों में दलित और महादलित का जातिवादी कार्ड खेल रहे हैं। श्रीरामुलु भी कर्नाटक के एक दलित नेता हैं। जाहिर है, जातिविहीन व निष्कलंक राजनीति का मुद्दा भाजपा की मुट्ठी से रेत की माफिक फिसलता जा रहा है। लिहाजा भाजपा को सुषमा के विरोध को एक नैतिक शुचिता के पाठ के रूप में लेने की जरूरत है, क्योंकि भाजपा देश की अखिल भारतीय राजनीति में अल्पकाल के लिए नहीं, दीर्घकाल के लिए है ?

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