लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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स्टिंग

स्टिंग

प्रमोद भार्गव

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सांसद,विधायक एवं मंत्रियों के रिश्वत लेने के स्टिंग आॅपरेशन का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा विधायकों को खरीदने का नया स्टिंग सामने आ गया। उत्तराखण्ड में कांग्रेस के नौ विधायक बागी होकर भाजपा के पाले में चले गए हैं,इस कारण हरीश रावत सरकार को विधानसभा में बहुमत की परीक्षा देनी है। नतीजतन दिल्ली में जो वीडियो जारी किया गया है उसमें मुख्यमंत्री एक व्यक्ति से कथित तौर पर विधायकों की खरीद-फरोक्त की बात कर रहे हैं। इस वार्तालाप में रावत विधायकों को 15 करोड़ रुपए देने की बात करते सुनाई दे रहे हैं। इस बातचीत में उमेष शर्मा नाम के एक पत्रकार का भी जिक्र है,जिनके जरिए 5 करोड़ का इंतजाम मुख्यमंत्री के लिए करने की बात कही गई है। पत्रकार उमेष समाचार प्लस चैनल से जुड़े है। इस अनैतिक कृत्य में मीडिया का सीधे-सीधे जुड़ा होना चिंता का गंभीर पहलू है। इसे भारतीय प्रेस परिषद को संज्ञान में लेने की जरूरत है। हालांकि इस सीडी को मुख्यमंत्री ने फर्जी बताया है। साथ ही पत्रकार की साख पर भी सवाल खड़े किए है।

चुनाव के मुहाने पर खड़े पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सांसद,विधायक एवं मंत्रियों की गर्दन पर बर्खास्तगी का शिकंजा तो पहले से ही कसा है,अब एक प्रदेश का मुख्यमंत्री भी स्टिंग की गिरफ्त में आता दिखाई दे रहे हैं। तृणमूल के एक दर्जन नेताओं को टीवी समाचार चैनलों ने रिश्वत के नोटों की गड्डियां जेबों में ठूंसते दिखाया है,वहीं मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने ही दल के बागी विधायकों को अपने पक्ष में करने के लिए मोल-भाव करते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा ने इस अनैतिक कृत्य की शिकायत राज्यपाल से कर दी है और राष्ट्रपति से करने की तैयारी में है। जाहिर है,सीडी प्रयोगशाला में जांच के बाद सही पाई जाती है तो हरीश रावत के राजनैतिक भविश्य को पलीता लग सकता है।

तृणमूल कांग्रेस के रिश्वत लेने के स्टिंग से जुड़े सांसदों लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने स्टिंग की हकीकत को सामने लाने की दृष्टि से मामला आचार समीति को सौंप दिया। वरिष्ठ भाजपा सांसद लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में 15 सदस्यों वाली समिति इस पूरे मामले का अध्ययन व जांच करेगी। सियासतदारों के इस तरह के अनैतिक आचरण के सामने आने से विधायिका की गरिमा को ठेस पहुंची है। ऐसा ही एक मामला 2005 में आचार समिति के पास पहुंचा था। इसमें भी स्टिंग के मार्फत कथित तौर पर अस्तित्वहीन फर्जी कंपनीयों की मदद के लिए रिश्वत लेते हुए 11 सांसदों को दिखाया गया था। समिति ने जांच के बाद इन सांसदों की संसदीय सदस्यता समाप्त करते हुए,चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। कमोवेष ऐसी ही स्थिति का सामना इन स्टिंगों के दायरे में आए नेताओं को भी करना पड़ सकता है।

मुख्यमंत्री हरीश रावत और ममता बनर्जी ने स्टिंगों को झूठा बताया है। रावत ने कहा है कि स्टिंग के पीछे उमेष शर्मा नाम के जो पत्रकार है उनकी साख किसी से छिपी नहीं है। पत्रकार के पिछले इतिहास की जांच होनी चाहिए। अपने दल के नेताओं के बचाव में कुछ इसी तरह का बयान ममता बनर्जी ने देते हुए विपक्ष को साजिष करार ठहराते हुए कहा था कि ‘साजिष के बावजूद उनकी पार्टी नहीं झुकेगी। स्ंिटग वाले खुद कालाधन लेकर आए हैं,लेकिन हम इससे डरेंगे नहीं। हम ईमानदारी से काम करने वाले हैं,हमें एक बार फिर मौका मिलता है तो हम साजिशकर्ताओं को भी मुंहतोड़ जवाब देंगे,क्योंकि समाचार पोर्टल ने विधानसभा चुनाव की घोषणा के तत्काल बाद उन्हें नुकसान पहुंचाने के नजरिए से स्टिंग आॅपरेशन को जारी किया है।‘

वहीं समाचार प्लस चैनल और न्यूज वेबसाइट अपने स्टिंगों को सही ठहरा रहे हैं। न्यूज वेबसाइट ने दावा किया है कि 2014-16 की अवधि में किए गए इस स्टिंग आॅपरेशन के दौरान तृणमूल नेताओं को कुल एक करोड़ रुपए दिए गए। इन नेताओं में मुकुल रॉय, सुब्रत मुखर्जी,सौगत रॉय,सुल्तान अहमद, काकोली घोष दस्तीदार,प्रसून बनर्जी और मदन मित्रा जैसे तृणमूल के दिग्गज नेता शामिल हैं। तृणमूल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और लोकसभा सांसद मुकुल रॉय तो यहां तक कह रहे हैं कि वीडियो टेप से छेड़छाड़ की गई है। इसलिए हम न्यूज पोर्टल के विरुद्ध मानहानि का मामला दर्ज कराएंगे। लेकिन इतना कह देने भर से जो वीडियो और आॅडियो प्रसारित हुए हैं,उनमें सांसदों के मुख से जो संवाद निकल रहे हैं,उनसे तय होता है कि जो कंपनी वजूद में ही नहीं है,घूस लेने के बाद सांसद उसकी बढ़-चढ़ कर मदद करने को तैयार हैं। इस मदद का वादा करते वक्त सांसदों की यह चिंता भी सामने नहीं आई कि वे जो मदद करने का भरोसा दे रहे हैं,वह मदद जायज काम के लिए है अथवा नाजायज ? साफ है,तृणमूल के सांसद इस स्टिंग के चुंगल में फिलहाल तो बुरी तरह फंस गए हैं। इसी तरह हरीश रावत उमेष नाम के जिस पत्रकार की साख व चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं,उन्हें आखिर ऐसे पत्रकार से संवाद बनाने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी ? बावजूद ये स्टिंग ऐसा लगता है,राजनीति को प्रभावित करने की दृष्टि से किए गए हैं,इसलिए निसंदेह ये स्टिंग सियासी रंग में रंगे दिखाई दे रहे हैं।

दरअसल संविधान में प्रावधान है कि सांसद एवं विधायकों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। इस प्रकृति के मामले संसद के विशेशाधिकार के दायरे में आते हैं। इसीलिए सुमित्रा महाजन ने आचार समिति को जांच सौंपते हुए कहा है कि ‘मैं लोकसभा नियमावली के नियम 233 बी के तहत मिले अधिकार के तहत यह मामला आचार समिति को सौंपती हूं।‘ 2005 में जब 11 सांसदों पर पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगा था,तब इन सभी सांसदों को संसद की आचार समिति ने ही बर्खास्त किया था। यह आॅपरेशन ‘कोबरा पोस्ट‘ ने किया था। दरअसल सांसद की गतिविधि को न्यायालय में चुनौती देने से वंचित रखने के संविधान में प्रावधान संविधान निर्माताओं ने इसलिए रखे थे,जिससे जनप्रतिनिधि अपने काम को पूरी निर्भिकता से अंजाम तक पहुंचा सकें। उन्हें अपनी अवाम पर इतना भरोसा था,कि इस जन-समुदाय के बीच से निर्वाचित प्रतिनिधि नैतिक दृष्टि से इतना मजबूत होगा कि वह रिश्वत लेकर न तो अपने मत का प्रयोग करेगा,न सवाल पूछेगा और न ही कंपनियों को गैरकानूनी मदद करेगा ? लेकिन यह देश और जनता का दुर्भाग्य ही कहिए कि जब पतली गली से बच निकलने के ये संवैधानिक प्रावधान प्रचलन में आए गए तो सांसदों ने जैसे नैतिक-अनैतिक मदद का सिलसिला ही शुरू कर दिया ? इस कदाचरण में अब तक ज्यादातर सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के सांसद भागीदारी करते देखे जा चुके हैं।

अल्पमत सरकारों को बचाने की दृष्टि से सांसदों को घूस देकर खरीदने का सिलसिला 1991 में पहली बार सामने आया था। तब कांग्रेस की पीवी नरसिंह राव सरकार को अल्पमत से बहुमत में लाने के मकसद से झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया शिबु सोरेन समेत चार सांसदों को पैसा देकर खरीदा गया था। इस सौदेबाजी से अल्पमत सरकार बहुमत में जरूर आ गई थी,लेकिन मामला उजागार हो जाने से संसद की गरिमा और सांसदों की ईमानदारी को जरूर पलीता लग गया था। कमोवेष संसद में यही स्थ्तिी को 22 जुलाई 2008 को डाॅ मनमोहन सिंह की अल्पमत सरकार को बचाने के लिए दोहराया गया। यह स्थिति अमेरिका के साथ गैर-सैन्य परमाणु समझौते के विरोध में वामपंथी दलों द्वारा मनमोहन सरकार से समर्थन वापसी के कारण निर्मित हुई थी। वामदलों के अलग हो जाने के बावजूद सरकार का वजूद कायम रहा,क्योंकि उसने बड़े पैमाने पर नोट के बदले सांसदों के वोट खरीदे थे। सांसदों की इस खरीद-फरोख्त की तसदीक भाजपा के तीन सांसद अषोक अंर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भागौरा ने लोकसभा में एक-एक हजार के नोटों की गड्डियां लहराकर कर दी थी। दरअसल इन सांसदों को भी कांग्रेस ने अपने पक्ष में मतदान करने के लिए घूस दी थी,जो इन्होंने संसद में सार्वजनिक कर दी थी। उत्तराखण्ड में अल्पमत-बहुमत के ऐसे ही खेल में हरीश रावत उलझ गए हैं।

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