लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर सिंह

दो दिनों से लगातार घोषणा हो रही थी कि लॉस एंजेलस में भयंकर तूफ़ान आने की संभावना है.बार बार चेतावनियाँ भी दी जा रही थी.यह भी बताया जा रहा था कि इस तूफ़ान में वायु की गति प्रति घंटे सत्तर मील से अधिक हो सकती है.रश्मि विधिवत अपने नित्य के कार्यों में लगी हुई थी,पर उसका ध्यान एक क्षण के लिए भी इन उदघोषणाओं से अलग नहीं हटा था.तूफ़ान शब्द उसकी जिन्दगी के साथ ऐसा जुड़ गया था कि वह एक तरह से उसकी जिन्दगी का हिस्सा बन गया था.दस वर्षीय पुत्री नेहा की मम्मी आज भी अपनी बेटी द्वारा पूछे गये हर प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाती है.इन दस वर्षों में बेटी की जिज्ञासा शांत करने का तो वह प्रयत्न करती रही है और उसमे कुछ हद तक सफल भी रही है ,पर अपने दिल के उस दर्द को कैसे शांत करे जो दस वर्ष पहले उठा था ,पर अभी भी शांत नहीं हो पाया है.और शायद कभी भी शांत नहीं होगा.उस तूफ़ान ने रश्मि के सीने में जो जख्म छोड़ा है वह नासूर बन गया है और हमेशा टीसता रहता है.

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रश्मि और नीरज की जोड़ी को देख कर ऐसा लगता था मानो वे दोनों एक दूसरे के लिए ही बनाए गए हैं

नीरज उस समय ग्रीन कार्ड होल्डर हो गया था जब दोनों का विवाह हुआ था.नीरज को तो इंजीनियरी डिग्री लेने के साथ ही अमेरिका में आगे की पढाई के लिए छात्रवृति मिल गयी थी और वह अमेरिका आ गया था उसके मन में तो उस समय शायद यह विचार भी नहीं आया था कि वह एक बार अमेरिका आयेगा तो यहीं का हो कर रह जाएगा.आगे की पढाई पूरी करते करते उसे नौकरी का प्रस्ताव मिल गया था.नौकरी अच्छी थी अतः उसने स्वीकार कर लिया.इसके बाद तो विधिवत अमेरिका का प्रवास आरम्भ हो गया.नौकरी सियाटल के एक बड़े साफ्टवेर कंपनी में मिली थी.पढाई करते समय भी वह सियाटल भ्रमण के लिए आया था.सियाटल उसे बहुत सुन्दर लगा था उसे तो लगता था कि प्रकृति ने खुले दिल से इस नगर को सँवारा है.प्राकृतिक सौन्दर्य यहाँ पग पग पर बिखरा नजर आता था.नौकरी आरम्भ हुआ तो घर वालों को उसके विवाह की भी चिंता शुरू हुई.उसने घर वालों को बता रखा था कि वह भारतीय लडकी से ही शादी करेगा.वहअच्छी तरह जानता था कि अमेरिका में गृहस्थी को सुचारू ढंग से चलने के लिए दोनों दम्पति को कार्य करना आवश्यक है.अतः उसने पहले तो अपना पैर अच्छी तरह जमाया.ग्रीन कार्ड प्राप्त किया.फिर शादी की स्वीकृति दी इस शर्त के साथ कि लडकी इंजीनियरी में स्नातक हो.ऐसे लडकी कुछ भी हो उसे शादी के बाद मातहत(Dependent) वीसा पर ही आना पड़ता,पर इसमे उसकी किस्मत ने साथ दिया और उसकी शादी ऐसी लडकी से तय हुई जिसे इंजीनियरी में स्नातक करने के बाद अमेरिका में आगे पढने के लिए छात्रवृति मिल गयी थी.नीरज तो तकदीर के इस खेल से प्रसन्न हुआ ही,पर आंतरिक प्रसन्नता हुई रश्मि को.वह तो इस सौभाग्य की कल्पना भी नहीं कर सकती थी.

क्या दिन थे वे भी? नयी नयी शादी और उस पर पढाई का बोझ.दोनों दो शहर में रहते थे,अतः भेट मुलाक़ात मुश्किल से.रश्मि तो कभी कभी इतना घबडा जाती थी कि उसको लगता था कि भाड़ में जाए यह पढाई लिखाई.वह सब कुछ छोड़ कर नीरज के पास आ जाना चाहती थी,पर नीरज उसे समझाता था और धैर्य देता था.वह बताता था कि इस तरह की उतावली और बचपना करने से क्या लाभ?रश्मि कभी कभी एकदम झुंझला उठती थी..नीरज कहता था,”जानेमन यह उतावलापन और झुंझलाहट हम लोगों जैसे प्रफेशनल को शोभा नहीं देता “.

रश्मिऔर उखड जाती,”भाड़ में जाये तुम्हारा यह प्रफेशनल व्यवहार.मैं तो सब छोड़ छIड कर यहाँ आ रही हूँ.”

कितनी कठिनाई होती थी नीरज को उसे समझाने बुझानेमें.अंत में उसे रश्मि को बताना पड़ा था कि तुम्हे अध्ययन के लिए वीसा मिला हैऔर अध्ययन छोड़ने से तुम्हे वापस भारत जाना पडेगा.तब जाकर वह शांत हुई थी.

अंत में ये वनवास की घड़ियाँ समाप्त हुई थी अध्ययन समाप्त होने के पहले ही उसने नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र भेजना शुरू कर दिया था.ऐसे तो अन्य स्थानों पर भी नौकरी मिलने की उम्मीद थी,पर उसे तो इन्तजार था सियाटल की नौकरी का.

रश्मि के प्रसन्नता का ठिकाना नही रहा था,जबउसे सियाटल के उसी कंपनी में नौकरी मिल गयी थी जिसमे नीरज कार्यरत था.

अब तो रश्मि थी और था नीरज.सप्ताह के पाँच दिन आफिस में बीतते थे और दो दिन अपनी दुनिया में.मजा यह था कि दोनों एक ही आफिस में थे सबेरे साथ निकलते थे लंच साथ होता और फिर अपनी होती शामें.रश्मि और नीरज दोनों को लगता था कि इससे बढ़ कर आनंद दायक क्या हो सकता है?उन्होंने मकान भी ऐसी जगह ले रखा था जो सियाटल जैसे सौन्दर्य पूर्ण नगर का भी सबसे रमणीय स्थान था,मरसर द्वीप .शहर में होते हुए भी शहर से दूर.यह रश्मि का आग्रह था जिसके आगे नीरज को झुकना पडा था.मुख्य नगर से यहाँ पहुँचने के लिए सड़क और उसके ऊपर पूल तो था ही .इसके अतिरिक्त नाव से भी उस द्वीप में पहुँचने की व्यवस्था थी.रश्मि को सियाटल बहुत सुन्दर लगता था और उससे भी बढ़ कर वह जगह जहां वे दोनों रहते थे.शाम को घर के बाहर बैठ कर चाय पीने भी रश्मि को रोमांच हो जाता था.

एक दिन तो वह बोल उठी,”नीरज, क्या तुमको नही लगता कि यह जगह पृथ्वी पर है ही नही?हम लोग कहीं स्वर्ग की तो सैर नहीं कर रहे हैं?”

नीरज पहले से सियाटल में रहता था.वह बोला,”जानेमन अभी तुमने यहाँ देखा क्या है? नगर के बाहर निकलो,तब पता चलेगा कि यह स्थान कितना सुंदर है?”

फिर वह सैर करने लगी सियाटल के आस पास के स्थानों का .रश्मि को तो यह सब इतना अच्छा लगने लगा कि वह पांच दिनों प्रतीक्षा करने लगी सप्ताहांत का जिसमे दो दिन वे प्रकृति कि गोद में बीता सके.कहाँ कहाँ नहीं गए वे दोनों ?नगर से निकलते निकलते भी वे कहीं भी रूक जाते थे.समुद्र के किनारे निकले तो समुद्र में पर्वतं की परच्छाई पड़ती हुई नजर आयी.पर्वत पर चढ़े तो सामने समुद्र दिखाई पड़ा.क्या दृश्य होता था.कभी झरने तो कभी जंगल .लगता था कि प्रकृति ने अपने हाथों सवारा है सियाटल और उसके आस पास के इलाकों को .नीरज तो कभी कभी थक भी जाता था और तब एक दो सप्ताहांत मर्सर द्वीप या डाउन टाउन के सैर में निकल जाते थे.रश्मि को बहुत मजा आता था जब वे अपनी कार लेकर निकलते थे.फिर वे कार सहित जहाज पर सवार हो कर किसी द्वीप में उतरते थे और फिर दिनभर उस द्वीप की सैर और रात्रि बेला के पहले घर वापस.

सियाटल का एक उपनगर है टाकोमा.अपने आपमें खूबियाँ लिए हुए.वे लोग अपनी कार लेकर निकले इस उपनगर की सैर के लिए .मार्ग जंगलों से आच्छादित बड़े बड़े पेड़.रेन फारेस्ट यानी वर्षा वन का बहुत नाम सुन रखा था दोनों ने आज उसके बीच से होकर गुजरने का लुफ्त ही कुछ और था.तब उनको और मजा आने लगता था जब वे जंगल से निकलकर समुद्र के किनारे आ जाते थे .फिर उनकी कार जंगल के बीच गुम हो जाती थी..टाकोमा में अमेरिका का एक समुद्री बेड़ा भी है.वे उसके पास से भी गुजरे पर उन्हें किसी ने रोका टोका नही वे जंगल या सागर किनारे किसी स्थान पर भी रूकते थे तो उनको वहाँ का दृश्य मोह लेता था. इसी तरह घूमते और विभिन्न दृश्य देखते कब संध्या आ धमकी उन्हें पता भी नही चला,पर अँधेरे ने उन्हें लौटने को विवश कर दिया.जिस तरह बच्चों जैसी हरकत करते हुए वे लौटे उसको देख कर कोई नही कह सकता था कि यह दम्पति यहाँ के एक प्रतिष्ठित संस्थान का पदाधिकारी है.

आज तो वे ऐसे स्थान पर जा रहे थे जहां एक बार पहुँचने की तमन्ना न केवल सियाटल वासियों में होती है, बल्कि अमेरिका का हर निवासी जिसने उस जगह का नाम सुन रखा है वहाँ पहुँचने की चेष्टा करता है.वह स्थान है माउंट रेनिअर .सियाटल से पचपन मील दूर यह पर्वत श्रृंखला और उसके साथ लगा हुआ राष्ट्रीय उद्यान किसी भी प्रकृति प्रेमी के लिए स्वर्ग से कम नहीं. माउन्ट रेनिअर की चोटी बहुत ऊँची तो नहीं है,पर ईतनी ऊँची अवश्य है सियाटल और उसके आस पास के इलाके वाले उन बर्फीली चोटियों का नित्य दर्शन करते हैं.

रश्मि की नजर इन बर्फीली चोटियों पर नित्य ही पड़ती थी और ललक कर रह जाती थी,इनके दर्शन के लिए,पर वहाँ जाने का कार्य क्रम बनते बनते भी बहुत दिन लग गए.अब जब वहाँ जाने का समय आया तो रश्मि और नीरज दोनों जल्द से जल्द वहाँ पहुँचने के लिए उतावले नजर आने लगे.चल तो दिए वे लोग वहाँ के लिए, पर मार्ग का प्रलोभन उन्हें वहाँ पहुँचने में रूकावट बनने लगा.मार्ग में पग पग पर प्रकृति अपने अनुपम सौन्दर्य के साथ खडी मिली.कलकल निनाद करती हुई स्वच्छ जल से परिपूर्ण छोटी छोटी नदियाँ और झरने उस वृक्षों के समूह से घिरे मार्ग के सौन्दर्य में चार चाँद लगा रहे थे.उन्होंने न जाने कितनी बार गाडी रोक कर उन नजारों का लुफ्त लिया.घंटे भर की सफ़र दो घंटे में तय करके वे आखिर गंतव्य तक पहुँच ही गए.गनीमत थी कि वे धर से ज़रा जल्दी निकल गए थे नहीं तो रास्ते में इन सब दृश्यों को देखने में जो समय लगा था उससे तो वे माउन्ट रेनिअर को जी भर देख भी नहीं पाते.

माउन्ट रेनिअर के समीप पहुँचने के बाद तो उन्हें लगा कि वे स्वप्न लोक में विचर रहे हैं.रश्मि ने तो सचमुच में नीरज को चिकोटी भी काट दी, जब नीरज ने रश्मि की अध् खुली आँखों की ओर देखा तो वह उसकी शरारत पर हँस पड़ा.उसे स्वयं भी अनुभव हो रहा था कि वह स्वप्न लोक में है.

क्या दृश्य था?.क्या नजारा था?उनकी गाडी जब नजदीक पहुँची थी तो सडक के दोनों ओर बर्फ ही बर्फ नजर आ रहा था गाडी उस बर्फ के बीच से गुजरती हुई पार्किंग स्थल पर पहुंची थी.अब उनके सामने थी माउन्ट रेनिएर की चोटी और वे खड़े थे ऐसे स्थान पर जहां एक ओर बर्फ ही बर्फ था तो दूसरी तरफ थी हरियाली ही हरियाली .वे एक दूसरे से चिपके हुए इस नज़ारे का लुफ्त उठाने लगे.जिसने माउन्टरेनिअर के दर्शन नहीं किये हैं,,वह वहाँ के सौन्दर्य का अनुमान भी नहीं लगा सकता.नीरज और रश्मि तो यह सोच कर आये थे कि बर्फ में चलना है.वातावरण में भी सर्दी होगी,पर वहाँ तो खुश नुमा सर्दी थी.लगता ही नहीं था कि वे बर्फ के पर्वत पर खड़े हैं.पैरों में सर्दी अवश्य लगती,पर उसके लिए वे दोनों पूर्ण तैयार थे.वे टहल रहेथे और लुफ्त उठा रहे थे प्रकृति के अनुपम देन का.एक तरफ नजर जाती थी तो धवल पर्वत शिखर अपनी पूर्ण गरिमा के साथ के साथ नजर आता था तो दूसरी ओर उसके पैरों के नीचे हरियाली और विभिन्न प्रकार के पुष्पों का अम्बार.तभी पता नहीं रश्मि को क्या सूझा?उसने झुक कर बर्फ का एक गोला बनाया और फेंक दिया नीरज की तरफ.नीरज भी शरारत पर उतर आया और बर्फ के गोलों से जबाबी हमला आरम्भ कर दिया.फिर तो वे सब कुछ भूल कर देर तक बर्फ के गोलों का खेल खेलते रहे. यही सब खेल करते हुए वे लोग अब ऐसे स्थान पर पहुँच गए थे जिसे पैराडाइज कहा जाता है,पैराडाइज यानी जन्नत,बैकुंठ या स्वर्ग जो भी कह लीजिये,पर सचमुच में वह स्थान धरती का अंश नहीं लगा था उन दोनों को.

पैराडाइज तो सचमुच जन्नत है.एक तरफ हरियाली से भरा हुआ घाटी में दूर दूर तक फैला हुआ घास का मैदान और उसके बीच विभिन्न रूप और रंग के जंगली फूलों का प्रकृति प्रदत बगीचा और दूसरी तरफ माउंट रेनिअर की उजली बर्फीली चोटी.अवाक रह गए थे वे दोनों यह दृश्य देख कर. नीरज और रश्मि घंटों निहारते रहे इस दृश्य को.पर उनको लौटना भी तो था.इस दृश्य को छोड़ कर दोनों में से कोई जाना नहीं चाहता था.,फिर जब वहाँ से चले तो उसी की यादों में खोये हुए.

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जिंदगी बड़े मजे में कट रही थी, परअब उनको लगने लगा था कि यहाँ अधिक दिनों तक नहीं रूका जा सकता था,क्योंकि कंपनी में उन्नति की संभावना नहीं नजर आ रही थी.ऐसे भी अमेरिका में नौकरी कभी भी छुट सकती है,अतः जब तक नौकरी है लोग अधिक से अधिक आमदनी की चिंता करते हैं.

रश्मि तो सोच ही नहीं सकती थी कि सियाटल भी छोड़ा जा सकता है.इस शहर के साथ उसने एक तरह से भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर लिया था.इसके सौन्दर्य पर वह इतना मुग्ध थी किइसका वातावरण भी उसको अच्छा लगने लगा था,जबकि यहाँ अधिक दिन बिताने के बाद यहाँ हरदम बादलों का जमघट,आये दिन बूंदा बूंदी लोगों को खलने लगता था.यहाँ मकान खरीदना भी उतना आसान नहीं था,क्योंकि यहाँ मकान की कीमत अन्य नगरों या शहरों की तुलना में अधिक थी.नीरज अपने पत्नी के मन की भावनाओं से अवगत था,वह भी सोचता था कि पत्नी की प्रसन्नता के लिए यही रहा जाए तो ठीक है,पर उसे यह भी लगने लगा कि उन लोगों का यहाँ क्या भविष्य है?मन मारकर रश्मि ने भी उसका साथ देना स्वीकार कर लिया.फिर भी उन दोनों को पता नहीं चल रहा था कि उनका फैसला सही है कि गलत.

नौकरी उन दोनों को मिली लास एंजेलस में.पहली बार रश्मि को लगा कि उसने गाडी चलाना सीख कर कितना अच्छा किया था.सियाटल में तो दोनोएक दफ्तर में काम करते थे.एक साथ आते जाते थे,पर यहाँ विभिन्न दफ्तरों में नौकरी के कारण उनको एक के बदले दो गाड़ियों की आवश्यकता हो गयी,पर इतना अधिक वेतन मान उन लोगों को मिला था कि उससे कोई कष्ट नहीं हुआ.

लास एंजेलस का अपना अंदाजथा.नौकरी तो ज्यादा अच्छी थी ही,शहर भी बड़ा और खुला खुला था. हालीवूडऔर डिजनी लैंड भी यही थे और था प्रशांत महासागर का तट .

लॉस एंजेलस आने पर नीरज ने रश्मि में एक परिवर्तन देखा अल्हड़पन अब उतना नहीं रह गया था अब उसमे.जब वे लोग यहाँ आये तो सर्वप्रथम महत्त्व पूर्ण बात जो रश्मि ने कही,वह यह था कि अब हमलोगों को अपना घर लेने का प्रयत्न करना चाहिए.ऐसे भी महिलाओं से अधिक व्यावहारिकता की अपेक्षा की जाती है.नीरज देख रहा था कि अब वह व्यावहारिकता रश्मि में आ रही है.अमेरिका में अपना घर खरीद लेना एक तरह से बहुत आसान है बैंक से ऋण का प्रबंध आनन फानन हो जाता है.बहुत जल्द ही उनका अपना घर हो गया और उसके साथ ही रश्मि का सियाटल छोड़ने का दुःख भी कम हो गया.नौकरी के समय के बाद अपना घर सजाने में वह अधिक समय बिताने लगी,पर वह यह भी नहीं भूली थी कि यहाँ हालीवुड भी है और डिजनी लैंड भी है.

हालीवूड से वे दोनों कोई विशेष प्रभावित नहीं नजर आये.सड़कें साफ़ सुथरी थी.सड़क के किनारे जो पैदल चलने का मार्ग था,उसके ऊपर स्थान स्थान पर सितारे जड़े नजर आते थे.उन सितारों के बीच हालीवूड के भूत और वर्तमान सितारों के नाम खुदे हुए थे.अमेरिका के सड़कों पर पैदल चलने वालों की भीड़ विरले ही मिलती हैं,पर हालीवूड की सड़कें इसका अपवाद थी.वहां स्थान स्थान पर लोगों की भीड़ दिख रही थी.हरियाली और पेंड पौधों से आच्छादित मार्ग अपने आप में अत्यंत सुन्दर दृश्य उपस्थित कर रहे थे,पर जिसने सियाटल का सौन्दर्य देखा हो,वे इससे क्या प्रभावित होते.प्रभावित हुए थे वे यहाँ के खुशगवार मौसम से और खिली धूप से.

वे प्रशांत महासागर के तट पर भी गए.प्रशांत महासागर सचमुच में प्रशांत नजर आया.साफ़ सुथरा समुद्र तट दूर तक फैला हुआ था.किनारे पर लॉस एंजेल्स की प्रसिद्ध बस्तियाँ अलग समाँ प्रदान कर रही थी.नीरज और रश्मि ने एक ख़ास बात देखी.साग़रसे लहरे उठती है और किनारे आते आते शांत होजाती हैं ,पर लहरों में न वह उतावलापन दिखा न लहरों के उठने का जोरों का शोर जो आम समुद्री किनारे पर नजर आता है.लहरों की इस शान्ति से उन्हें लगा कि प्रशांत महासागर का यह नाम भी शायद इन्ही खामोश लहरों की देन है.

आखिर उन दोनों को लॉस एंजेलस का मजा आ ही गया.ऐसा कोई स्थान न उन्होंने इसके पहले देखा था और न सोचा था कि देखने को मिलेगा.वह स्थान था डिजनी लैंड.बहुत नाम सुना था,उन दोनों ने डिजनी लैंड का,पर जब उसके दर्शन हुए तो पता चला कि वह स्थान उससे भी अधिक सुन्दर है जितना उन्होंने सोचा था.यह सौन्दर्य प्रकृति प्रदत नही था,यह तो मानव के कल्पना और उसके सृजन शीलता का प्रतीक था.उनको मालूम था कि मिकी माउस और डोनल डक के विभिन्न रूपों के दर्शन तो वहां होंगे ही,पर उनको यह कहाँ मालूम था कि उनके विभिन्न रूपों और कार्यों के अतिरिक्त अन्य बहुत ऐसी चीजें देखने को मिलेगी जो उन्हें चकित कर देंगी.गेट का मनोहारी दृश्य देखते वे अन्दर घुसे तो डोनल डक ने उनका स्वागत किया.आगे ही वस्ती थी मिकी माउस और डोनल डक की.उससे निकले तो रेल की थोड़ी देर की यात्रा और उस यात्रा के दौरान खिडकियों से दीखते प्रागैतिहासिक दृश्य. डायनासोर के साथ साथ अन्य विलुप्त प्राणियों को उन्होंने जीवित रूप में दर्शन किये.क्या कला थी और क्या कमाल था?नाव में सैर को निकले तो लगा कि सर्व देशीय कला और संगीत की दुनियाँ से गुजर रहे हैं.वहाँ उन्होंने भारत के महाराजाओं के साथ भारत की विभिन्न नृत्य के भी दर्शन किये.एडवेंचरस टूर यानि जोखिम भरा यात्रा तो अपने आप में एक अनोखा अनुभव था.कभी लगता था कि ऊँचे और ऊँचे जा रहे हैं तब तक नीचे आ जाते थे.घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए भयानक जंतुओं के दर्शन होते थे,लगता था कि उनकी गाडी उन जानवरों के मुख में चली जायेगी तब तक वे अन्य स्थान पर पहुँच जाते थे.दिन भर वे डिजनी लैंड की सैर करते रहे पर उनका मन नहीं भरा और न देखने वाली चीजें ही समाप्त हुई पर शाम को इन्ही दृश्यों की कल्पना में डूबे हुए वे दोनों घर लौटे.

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अब वे दोनों लॉस एंजेलस में रम गए थे.अच्छी नौकरी और अमेरिका के एक बड़े नगर में अपना घर उन्हें और क्या चाहिए था? इसी बीच पता चला कि रश्मि माँ बनने वाली है.नीरज तो खुशी से झूम उठा.रश्मि थोड़ी चिंतितअवश्य हुई कि इस विदेश में न जाने क्या होगा? कैसे संभाल पायेगी वह यह सब? पर जल्द ही उसको पता चल गया कि उसकी चिंता निराधार थी.जांच से पता चलते ही लगा कि उसकी सब जिम्मेवारियाँ अस्पताल के कंधों पर आगई है.अनेकों प्रकार की हिदायतें दी गयी उसको.समय निर्धारित कर दिया गया उसके लिए कि समय समय पर उसे कब अस्पताल पहुंचना है.नीरज के लिए अलग से हिदायतें दी गयीं.

जैसे जैसे दिन बीतते गए रश्मि की चिंता अवश्य बढ़ती गयी, पर किसी भी परेशानी का सामना उसे नही करना पड़ा.उन दोनों को पता चल गया था कि बिटिया रानी का पदार्पण होने वाला है, अतः वे दोनों उसके स्वागत के लिए अपने को तैयार कर रहे थे.रश्मि के माता पिता भी आ गये थे.तय यह था कि इनके जाने के बाद नीरज के माता पिता आयेंगे.रश्मि और नीरज दोनो को पता था कि अब तो चंद दिनों की बात है ,जब वे लोग माता पिता का दर्जा पा लेंगे.

आखिर बिटिया रानी आयी.प्रसव भी सामान्य तरीके से हुआ,अतः कोई परेशानी नहीं हुई,वे दोनों तो सुन्दर थे ही,लगता था कि बेटी उन दोनों के सौन्दर्य को साथ ही लेकर आयी रश्मि को तो आफिस से छुट्टी मिली हुई थी,पर बेटी से नीरज इतना लगाव महसूस करने लगा था कि उसे भी आफिस जाने का मन नहीं करता था,जिसके लिए उसे रश्मि की मीठी झिड़की भी मिली.सभी उल्लास में डूबे हुए थे.इसी तरह हंसते खेलते पांच महीने कैसे गुजर गए उन लोगों को पता भी नहीं चला.रश्मि के माता पिता को यहाँ आये हुए छः महीने होने जा रहे थे,अतः उनका लौटना भी आवश्यक था.

दो दिनों पहले नीरज ने अपने सास ससुर को विदा किया था और अब तो वे दोनों थे और थी उनकी रानी बिटिया.सप्ताहांत आ रहा था और वे योजना बना रहे थे कि कहीं निकला जाये रश्मि भी घर में रहते रहते उब चुकी थी.उसकी छुट्टियाँ भी समाप्त हो रही थी.फिर तो नौकरी के साथ साथ बेटी जिसका नाम उन लोगों ने नेहा रखा था,उसकी भी चिंता करनी थी.

वह शुक्रवार था.कार्यरत रहने का अंतिम दिन. शुक्रवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह तक यहाँ नौकरी पेशा लोगो का जीवन ही अलग हो जाता है.नीरज भी अपना प्लान बना रहा था. सोचा था,शाम को जल्दी निकलूँगा.देखूं रश्मि कहाँ जाने को कहती है.रश्मि ने तो टी,व्ही.में देखा था की जोरो का तूफ़ान आने की संभावना है अतः वह तो नीरज के आने की प्रतीक्षा कर रही थी.नीरज के जल्दी लौटने की आवाज जब उसने सुनी तो उसे अत्यधिक प्रसन्नता हुई,पर वह गाडी बाहर ही छोड़ आया.रश्मि ने पूछा ,”तुमने गाडी गैरेज में नहीं रखा?

नीरज,”गाडी गैरेज में क्यों रखूँ?बाहर चलने का मन नहीं है क्या?”

रश्मि बोली,”तुमने शायद सुना नहीं आज बड़े जोरों से तूफ़ान आने की भविष्य वाणी है,अतःजल्दी से गाडी गैरेज में रख कर आ जाओ.”

“ठीक है ऐसी भी क्या जल्दी है? चाय पीतें हैं.फिर रख आता हूँ”‘यह नीरज की आवाज थी.

न जाने क्यों,रश्मि को लग रहा था कि नीरज यदि गाडी रख आता तो अच्छा होता,पर जब उसने देखा कि वह नेहा से खेलने लगा तो वह भी चाय बनाने लगी.

चाय पीते पीते ही नीरज को लगा कि तेज हवा चलने लगी है.वह चाय ख़त्म करके तुरत बाहर निकला.हवा का जोर यकायक बहुत बढ़ गया था.नीरज जैसे गाड़ी के पास पहुँचने को हुआ,एक भयंकर बवंडर उठा. नीरज के गाडी का दरवाजा खोलते खोलते बगल वाला बड़ा बृक्ष ऐसे उखड गया जैसे वह रेत पर टीका हुआ हो.नीरज उस समय गाडी का दरवाजा खोल कर अन्दर घुस ही रहा था कि यह घटना घट गई.वह तो गाडी और दरवाजे के बीच पीस सा गया.रश्मि ने वृक्ष गिरने का शोर अवश्य सुना पर हवा के थपेड़े में वह दब सा गया था.उसको यह चिंता अवश्य हुई कि नीरज कहाँ हैं?फिर तुरत ही उसनेफायर ब्रिगेड के गाडी की आवाज सुनी.आवाज उसी के घर के पास आकर रूक गयी थी.उसके पड़ोसी ने यह दृश्य देखा था और तुरत फोन कर दिया था.हवा का बेग भी कम हो गया था,पर रश्मि को तो पता ही नहीं चल रहा था कि यह क्या हो गया .वह तो बेहोश हो चुकी थी.पड़ोस की औरतों ने उसे और उसकी बेटी दोनों को सम्भाला.नीरज के तो लगता है हादसे में प्राण पखेरू उड़ चुके थे.फिर भी उसे तुरत अस्पताल पहुचाया गया.जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया.रश्मि को होश आया तो उसे पता चला कि उसकी तो दुनिया ही उजड़ गयी. भला हो पड़ोसियों का और शासन व्यवस्था का.सारा का सारा प्रबंध ऐसे हो गया जैसे यह विदेश नहीं उसका अपना शहर,अपना गाँव हो .संभलते संभलते भी उसको बहुत दिन लग गए,पर उसको उसके,पड़ोसियों और मित्रों ने कहीं कठिनाई नहीं होने दी.नीरज के बीमा के रूपयों से मकान का कर्ज भी चुक गया.बैंक के अधिकारियों ने स्वयं यह सूचना उसको दी.सबसे असमंजस का समय तब आया जब उसे यह निर्णय लेना था कि बेटी के साथ अकेले यहाँ रहना है कि भारत लौट जाना है माता पिता और नीरज के परिवार केतरफ से तो यही सलाह दी गयी कि वह भारत लौट आये,,पर रश्मिके लिए यह निर्णय इतना आसान नहीं था.उसने अमेरिका का जीवन देखा था.उसने यह भी देखा था कि यहाँ अकेले रह कर भी औरतें कैसे अपना और अपने बच्चों का देख रेख कर लेती है. भारत में विधवाओं का जीवन भी उसने देखा था,उस पर भी बेटी की माँ. उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसे वहां कैसी नौकरी मिलेगी.नौकरी मिलेगी भी या नहीं.यहाँ ग्रीन कार्ड उसे मिल ही चुका था.नागरिकता मिलना केवल औपचारिकता मात्र था.अतः उसने निर्णय लिया कि वह यहीं रहेगी और बेटी का लालन पालन करते हुए नीरज की यादों के सहारे जिन्दगी के बाकी दिन गुजार लेगी.

 

अब आया तूफ़ान! सचमुच में बहुत भयंकर तूफान आया. हवा की तेज रफ़्तार ने सबकुछ तहस नहस कर दिया.बिजली के खम्भे उखड गए बिजली गुल हो गयी.सड़के गिरे हुए पेड़ों से लद गयी.आवागमन बंद हो गया.शाम के पांच बजे ही गहन अंधियारा ऊपर से भयंकर वर्षा.लग रहा था कि प्रलय आने ही वाला है.नेहा डर कर अपने माँ के छाती से चिपकी रही.खाना दोनों ने अवश्य खाया,पर रश्मि को तो याद आता रहा दस वर्ष पहले का वह प्रलयंकारी दिन जब उसका सब कुछ उजड़ गया था.पूरे आठ घंटे तूफान का जोर रहा फिर कुछ कम हुआ,पर वह तो क्षणिक विराम था.फिर जो तूफ़ान का वेग बढ़ा तो चौदह घंटो के बाद शांत हुआ.तूफान तो शांत हो गया,पर उसका प्रलयंकारी तांडव विनाश की एक श्रृंखला अपने पीछे छोड़ गया.बिजली आने में भी सौ घंटें लग गए.लोगोंको याद भी नहीं आ रहा था कि ऐसा पहले भी कभी हुआ था. नेहा बार बार अपनी माँ से पूछती थी कि क्या वह तूफान इससे भी बड़ा था जिसने पापा की जान ले ली थी.रश्मि क्या उत्तर देती?.वह तो सोच भी नहीं सकती थी कि उससे भी बड़ा कोई तूफ़ान हो सकता है जिसने उसका सर्वस्व छीन लिया था.

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