लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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जीवन में कई बार ऐसी जटिल समस्याएं सामने आकर खड़ी हो जाती हैं कि पूरे परिवार और खानदान की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। बुजुर्गों ने ‘जर, जोरू और जमीन’ को झगड़े की जड़ कहा है। जोरू अर्थात पत्नी या महिला के कारण तो राज्यों और साम्राज्यों में बड़े भीषण युद्ध हुए हैं, जबकि जर अर्थात धन और जमीन के कारण परिवारों में झगड़े और मुकदमेबाजी आम बात है।

त्रेतायुग में राम-रावण युद्ध हो या द्वापरयुग में महाभारत का महासंग्राम, दोनों की जड़ में एक महिला का ही विवाद था। चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के कारण ही अलाउद्दीन खिलजी और महाराणा रतनसिंह में ठनी थी। हजारों हिन्दू नारियों ने चिता में कूदकर प्राण दे दिये, पर अपने सतीत्व पर आंच नहीं आने दी। राजा लोग अपनी बहिन या बेटी को दूसरे राजपरिवार में देकर उनसे अपने संबंध मजबूत कर लेते थे। कभी ये इच्छा से होता था, तो कभी अनिच्छा से। चंद्रगुप्त से पिटकर वापस जाते समय यूनानी सेनापति सेल्यूकस अपनी बेटी हेलन चंद्रगुप्त को समर्पित कर गया था। कहते हैं कि इसके पीछे महामात्य चाणक्य का दबाव था। अब राजा तो नहीं है, पर राजनेता जरूर हैं, और वहां भी ऐसी परम्पराएं खूब निभाई जाती हैं।

लेकिन घर-परिवार और खानदान में विवाद का कारण पुश्तैनी सम्पत्ति ही होती है। ऐसे में कोई समझदार व्यक्ति बीच में पड़कर यदि विवाद को न सुलझाए, तो मारपीट और मुकदमेबाजी होते देर नहीं लगती। ऐसे में विवाद की आग में पानी के नाम पर तेल डालकर अपनी रोटी सेकने वालों की बन आती है। वे दोनों पक्षों को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। पुलिस वालों और वकीलों की भी चांदी हो जाती है। उनके लिए तो विवाद जितना लम्बा चले, उतना ही अच्छा होता है।

ऐसी ही कथा दिल्ली के पास स्थित गांव रामगढ़ के सेठ पन्नालाल के परिवार की भी है। उनका नाम सेठ जी जरूर था; पर थे वे एक सामान्य कारोबारी। उन्हें बहुत सम्पन्न तो नहीं कह सकते; पर खाने और पहनने की कोई कमी भी नहीं थी। गांव के मुख्य बाजार में उनकी दुकान थी, जहां साबुन, तेल, मंजन और किताब-कापी से लेकर राशन तक, दैनिक जरूरत का प्रायः सब सामान मिलता था। उसके पीछे ही घर भी बना था। कुछ खेती भी थी। कई दुकानों और मकानों से नियमित किराया भी आता था।

जरूरत पढ़ने पर वे आसपास के किसानों को पैसा उधार देते थे। यदि पैसा समय पर न वापस न आये, तो उसके बदले में रखे गहने या जमीन उनकी हो जाती थी। ऐसी कई सम्पत्तियां भी उनके पास थीं। इस तरह आराम से उनके जीवन की गाड़ी चल रही थी। गांव में उनके बड़े भाई हीरालाल जी भी थे। यद्यपि शराब के चक्कर में पड़कर उन्होंने अपने हिस्से की अधिकांश सम्पत्ति बेच खायी थी। हालत इतनी खराब थी कि कई बार तो राशन भी पन्नालाल को ही वहां भेजना पड़ता था।

सेठ जी के चार बच्चे थे। दो बेटी, दो बेटे। सबसे बड़ी सुनंदा, फिर सूरजप्रसाद, सुरेखा और सबसे अंत में चंद्रप्रसाद। घर में ये क्रमशः सोना, सूरज, रेखा और चंदर के नाम से बुलाए जाते थे। सोना और चंदर के बीच में 15 साल का अंतर था। चंदर के जन्म के दो साल बाद सेठ जी की पत्नी का निधन हो गया। तब सोना 17 साल की थी। उसने जिम्मेदारी निभाते हुए पूरे घर को संभाल लिया। सेठ जी उस समय यद्यपि 40 साल के ही थे; पर सोना की हिम्मत देखकर, परिवार के कई लोगों के आग्रह के बाद भी उन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया। सूरज और रेखा तो सोना को दीदी कहते थे; पर चंदर की वे ‘दीदी मां’ थीं।

यह सम्बोधन इस नाते ठीक भी था कि सोना ने चंदर को मां की तरह ही पाला था। वह रात में सोता भी दीदी मां के साथ ही था। सेठ जी तो अगले ही साल सोना का विवाह कर देना चाहते थे। एक-दो रिश्ते भी आ रहे थे; पर सोना ने चंदर के छोटेपन का वास्ता देकर उन्हें कुछ रुकने को कहा। जब चंदर स्कूल जाने लगा, तब ही वह ससुराल गयी। सब भाई-बहिनों में भरपूर प्रेम था; पर सोना का लगाव चंदर से सर्वाधिक था।

यों तो कारोबारियों के बच्चे बचपन से ही दुकान पर बैठने लगते हैं; पर सूरज की रुचि इस ओर कुछ अधिक ही थी। उसका दिमाग भी व्यापार में खूब चलता था। 14-15 साल का होते तक वह स्कूल के बाद का अधिकांश समय दुकान पर ही लगाने लगा था। पत्नी की मृत्यु के बाद सेठ जी का रुझान पूजा-पाठ की ओर अधिक हो गया। उनका स्वास्थ्य भी अब कुछ ठीक नहीं रहता था। अतः उन्हें सूरज का दुकान पर इतना समय देना अच्छा ही लगा। यद्यपि इस चक्कर में सूरज दसवीं में एक बार फेल भी हो गया। इसी प्रकार पढ़ते और व्यापार करते हुए उसने बारहवीं पास कर ली और फिर पढ़ाई को पूर्ण विराम दे दिया।

दूसरी ओर चंदर पढ़ाई में अच्छा था। वह हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम स्थान पर ही आता था। दीदी मां और फिर रेखा दीदी के विवाह के बाद उसने किताबों को ही अपना साथी बना लिया। सूरज के विवाह के बाद तो सेठ जी ने दुकान पर आना बहुत ही कम कर दिया। दोपहर में सूरज घर पर खाना खाने आता था। इसके बाद वह बाजार के काम निबटाता था। इतनी देर के लिए ही सेठ जी दुकान पर बैठते थे। बाकी सारा समय वे पूजा-पाठ या कथा-प्रवचन आदि में लगा देते थे। इस प्रकार सारा कामधाम अब सूरज के कंधों पर ही आ गया।

चंदर विज्ञान का छात्र था। इंटर के बाद बी.एस-सी. करते हुए वह प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहा। परिणाम यह हुआ कि दूसरे ही प्रयास में उसे एक राजकीय अभियन्ता महाविद्यालय में प्रवेश मिल गया। चार साल तक वहां पढ़ने के बाद उसने दो साल तक सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए धक्के खाए; पर सफलता नहीं मिली। अंततः एक निजी कम्पनी ने उसे काम पर रख लिया। वह कम्पनी पुल, सड़क तथा बांध आदि बनाती थी। वहां वेतन तथा काम का माहौल अच्छा था। नौकरी लगने के बाद सेठ जी तथा सूरज ने एक सजातीय परिवार में उसका विवाह करा दिया। लड़की देखने में अच्छी और सुशिक्षित थी। चंदर ने इस बारे में सारी जिम्मेदारी दीदी मां पर छोड़ दी थी। उनके हां कहते ही वह भी तैयार हो गया। इस प्रकार सेठ जी चंदर की जिम्मेदारियों से भी मुक्त हो गये।

धीरे-धीरे चंदर की गृहस्थी भी निर्धारित पटरी पर दौड़ने लगी। क्रमशः उसके घर में भी एक बेटे और दो बेटियों का आगमन हुआ। जिस कंपनी में वह काम करता था, उसे कई राज्यों में छोटे-बड़े काम मिलते रहते थे। इस कारण चंदर को हर दो-चार साल बाद नये स्थान पर जाना पड़ता था। पांच साल वह महाराष्ट्र में रहा, तो आठ साल आंध्र प्रदेश में। यद्यपि कम्पनी वाले आवास और बच्चों की शिक्षा आदि का अच्छा प्रबन्ध करते थे। फिर भी हर जगह का खानपान, भाषा और जलवायु तो अलग होती ही थी। घर आने का मौका भी प्रायः साल में एक बार, बच्चों के विद्यालय में वार्षिक छुट्टी के समय ही ठीक से मिल पाता था।

जिन दिनों चंदर आंध्र में एक पुल बनवा रहा था, उसे सेठ जी के निधन का समाचार मिला। कम्पनी वालों ने तुरन्त विमान से चंदर के दिल्ली जाने का प्रबंध कर दिया गया। चंदर को पिताजी की अर्थी को कंधा देने का अवसर तो मिल गया; पर पत्नी और बच्चे तेरहवीं के समय ही पहुंच सके। सेठ जी के जाने के बाद सूरज परिवार का सर्वेसर्वा हो गया। बहिनें अपने-अपने घर में थीं, तो चंदर बाहर। व्यापार से लेकर खेती और जमीन-जायदाद के सब काम सूरज ही देखता था। गांव वाले भी उसे अब सेठ जी ही कहने लगे।

इसी तरह काम करते हुए चंदर को 19 साल हो गये। कम्पनी वाले अपने कर्मचारियों से दस-दस साल का अनुबंध कराते थे। चंदर का दूसरा अनुबंध पूरा होने को था। अब तीसरे के बारे में उसके मन में असमंजस था। बच्चे बड़े हो रहे थे। बेटा इसी साल 17 वें वर्ष में लगा था। चंदर सोचता था कि जिस तरह मैंने नौकरी के लिए और फिर नौकरी के दौरान धक्के खाये हैं, वैसा यदि मेरे बेटे के साथ न हो, तो अच्छा है। अतः वह अब कम्पनी छोड़कर स्थायी रूप से अपने गांव में रहना और बेटे के साथ मिलकर कोई कारोबार करना चाहता था।

मूलतः यह विचार उसकी पत्नी का था। अगले आठ-दस साल में बच्चों के शादी-विवाह होने थे। अतः वह इसके लिए बार-बार आग्रह कर रही थी। इस बारे में विचार करने के लिए चंदर गांव आया। सूरज दिन भर दुकान तथा अन्य कामों में काफी व्यस्त रहता था। अतः रात में खाना खाते समय चंदर ने बात निकाली। इससे सूरज का माथा ठनका। दिल्ली के पास होने तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आने के कारण सम्पत्तियों के दाम काफी बढ़ चुके थे। मैट्रो रेल के लिए सर्वेक्षण हो रहा था। जिस बंजर भूमि को बीस-तीस साल पहले कोई पूछता नहीं था, वह अब सोने के दामों पर बिक रही थी। फटेहाल घूमने वाले किसान रातोंरात करोड़पति हो गये थे। कई बहुमंजिला भवन बन चुके थे। उससे कई गुना बन रहे थे। दो कमरे का फ्लैट 30 लाख में, तो तीन कमरे वाला 40 लाख में बिक रहा था।

सूरज को लगा कि यदि चंदर गांव में आकर रहेगा, तो पुश्तैनी सम्पत्ति का आधा हिस्सा उसे देना होगा। आधा हिस्सा यानि कई करोड़ की भूमि। कुछ भूमि तो वह उसे बिना बताये बेच चुका था। फिर भी काफी कुछ अभी बाकी थी। सम्पत्ति के कागज आदि उसी पर थे। गांव में रहता भी वही था। अतः खरीदार लोग बातचीत या लेनदेन उसी से करते थे। चंदर सरल मन का व्यक्ति था। उसे यह सब पता ही नहीं था कि उसकी अनुपस्थिति में सूरज उसे कितना नुकसान पहुंचा चुका है।

पर अब चंदर वापस गांव आना चाहता था, तो सारी बात खुलनी ही थी। पहले तो उसने चंदर को तरह-तरह से बहकाने का प्रयास किया। कारोबार में कितना खून जलाना पड़ता है, यह समझाया; पर चंदर सरल मन का होने के बाद भी मूर्ख नहीं था। उसने बता दिया कि अगले साल अनुबंध पूरा होने के बाद उसने यहीं बसने का निश्चय कर लिया है। अतः उसके हिस्से में जो भी सम्पत्ति आती है, उसे देने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

इतनी साफ बात होने के बाद अब सूरज के पास कोई विकल्प नहीं था। अब तक उसके सब बच्चों का विवाह भी हो चुका था। घर में चर्चा हुई, तो उसकी पत्नी, दोनों बेटे और बहुएं इतनी आसानी से यह सम्पत्ति खोना नहीं चाहते थे। अतः दूसरे रास्ते सोचे जाने लगे।

कुछ दिन बाद चंदर फिर आ गया। सूरज ने उसे कहा कि वह बाजार से थोड़ी दूरी पर स्थित 500 वर्ग मीटर का एक प्लाॅट ले ले। वहां मकान बनाने और फिर कारोबार शुरू करने के लिए वह 50 लाख रु. भी देने को तैयार था; पर चंदर को मालूम था कि पिताजी की छोड़ी हुई सम्पत्ति कई करोड़ रु. की है। इसलिए वह इतने सस्ते में मानने को तैयार नहीं हुआ।

ऐसे में विवाद बढ़ने लगा। बात धीरे-धीरे नाते-रिश्तेदारों से होती हुई बाजार में भी फैल गयी। कुछ लोगों ने सलाह दी किसी को पंच बनाकर फैसला कर लिया जाए। सूरज के ताऊ हीरालाल जी अभी जीवित थे। कुछ लोगों ने उन्हें बीच में बैठाने का सुझाव दिया; पर इसके लिए सूरज और चंदर दोनों तैयार नहीं थे। क्योंकि वे इन दोनों भाइयों के प्रेम और प्रगति से जलते थे। वे उन्हें मुकदमों में फंसाकर अपने जैसा कंगाल देखना चाहते थे। चंदर के मन में अपने बड़े भाई के लिए बहुत आदर था। उसने साफ कह दिया कि चाहे जो हो; पर यह समस्या घर के लोग ही हल करेंगे, बाहर वाले नहीं।

homeकुछ दिन बाद रक्षाबंधन का पर्व था। इस दिन सोना और रेखा हर साल अपने मायके आती थीं। सोना का विवाह दिल्ली में हुआ था और रेखा का मेरठ में। चंदर के महाराष्ट्र और आंध्र में रहने के दौरान वे रक्षाबंधन पर एक-दो बार उधर भी हो आयीं थीं। चंदर ने इस बार इस पर्व पर सपरिवार गांव में ही रहने का मन बनाया। उसने दोनों बहिनों से इस घरेलू समस्या को सुलझाने का आग्रह किया। दोनों बहिनें इस विवाद में पड़ना नहीं चाहती थीं; पर चंदर के साथ अन्याय न हो, यह भी उनकी इच्छा थी।

वैसे तो रक्षाबंधन पर सूरज की पत्नी और उसकी बहुएं भी इस दिन मायके जाती थीं; पर इस बार उन्होंने डाक से ही राखी भेज दी। उनको लग रहा था दोनों बहिनों की उपस्थिति में सम्पत्ति के बारे में चर्चा जरूर होगी। ऐसे में सूरज कहीं हल्का न पड़ जाए, इसलिए सबने उस दिन घर पर ही रहने का निर्णय लिया।

राखी बांधने और लेनदेन की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जब पूरा परिवार बैठा, तो सम्पत्ति की बात छिड़ गयी। सूरज ने कहा, ‘‘मुझे दुकान संभालते हुए 45 साल हो गये। मां की मृत्यु के बाद से पिताजी ने दुकान पर बैठना कम कर दिया था। अतः पूरी जिम्मेदारी मैं ही निभा रहा हूं। इस चक्कर में मैंने पढ़ाई छोड़ दी। पिताजी के बाद खेती और जमीन-जायदाद की देखभाल, उनसे सम्बन्धित मुकदमे, किरायेदारों से झंझट आदि को मैं ही झेल रहा हूं। सोना दीदी और मेरे विवाह में पिताजी ने रुचि ली थी; पर बाद के दोनों विवाहों के लिए मैंने ही भागदौड़ की। चंदर की पढ़ाई और विवाह के लिए भी पैसा दुकान से ही गया है।

उसने आगे कहा, ‘‘इस कारोबार की नींव पिताजी ने जरूर रखी थी; पर इसकी दीवारें और छत मेरे ही परिश्रम से बनी हैं। इसके लिए मैंने कितनी कुर्बानी की है, ये मैं ही जानता हूं। इसलिए सम्पत्ति पर पहला हक मेरा है। फिर भी मैं चंदर को पचास लाख रु. का प्लाॅट और इतने ही पैसे नकद देने को तैयार हूं, जिससे वह मकान बना ले और कारोबार शुरू कर ले। इससे अधिक की मुझसे अपेक्षा करना ठीक नहीं है। अब मेरा शरीर भी थक रहा है। मुझे अपने दोनों बेटों के लिए भी अलग मकान और दुकानें बनानी हैं। इसलिए जो मैं दे रहा हूं, चंदर उसे स्वीकार करे। परिवार में सब भाई-बहिनों में प्रेम बना रहे, यही मैं चाहता हूं।’’

अब चंदर की बारी थी। उसने बड़े भाई की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘पिताजी ने बाद सूरज भैया ने जिस तरह हमारी देखभाल की है, उसका अहसान कभी नहीं चुकाया जा सकता। मेरे लिए तो वे पितातुल्य ही हैं। उनकी यह बात भी ठीक है कि पिताजी के जाने के बाद जायदाद के सारे झंझट उन्होंने ही उठाये हैं; पर खेती और किराये से होने वाली सारी आमदनी भी तो उन्होंने ही रखी है। उसमें से न उन्होंने कभी एक पैसा मुझे दिया, न मैंने कभी मांगा। जो जमीन उन्होंने बेची है, उसका पैसा भी उनके पास ही है। वह कितने की बिकी हैं, इसे पूरा बाजार जानता है। उनके बच्चों के विवाह जिस शान से हुए हैं, उसकी चर्चा पूरी बिरादरी में है। पर जो हो गया, वो हो गया। उसकी बात मैं नहीं करता। समाज में उनका सम्मान बढ़ा है, तो ये हमारे लिए भी खुशी की बात है; पर अब जो सम्पत्ति बाकी है, उसमें से आधा मुझे मिल जाए। भैया मेरा हिस्सा देकर मेरे सिर पर हाथ रखें, यही मैं चाहता हूं।’’ इतना कहकर चंदर ने सूरज के पांव छू लिये।

चंदर की बात सुनकर सूरज की आंखें फैल गयीं। यद्यपि वह तीन करोड़ रु. की सम्पत्ति बेच चुका था, फिर भी अभी बहुत कुछ बाकी था। उसमें से आधे का अर्थ था लगभग चार करोड़ की जायदाद; पर वह तो उसे एक करोड़ में ही टरकाना चाह रहा था। इसके लिए चंदर राजी नहीं था। अतः सूरज ने घर में विचार करने की बात कहकर उस समय की वार्ता समाप्त कर दी।

सूरज की पत्नी और बच्चे इतना देने को बिल्कुल राजी नहीं थे। उनकी सोच थी कि चंदर अधिक से अधिक मुकदमा ही तो कर देगा; पर मुकदमा करना आसान है, उसे निभाना नहीं। उसकी नौकरी दक्षिण भारत में है। वह हर तारीख पर आ नहीं सकेगा। आयेगा तो रहेगा कहां, मकान पर भी तो हमारा कब्जा है। फिर सूरज कई साल से मुकदमे लड़ रहा है। उसकी वकीलों और जजों के साथ अच्छी जान-पहचान है। वह अदालत में लेने-देने के तौर तरीके भी जानता है। ऐसे में अधिकांश निर्णय हमारे पक्ष में ही होंगे। चंदर के पास जो पैसा है, वह मुकदमेबाजी में उड़ते ही उसका दिमाग आसमान से जमीन पर आ जाएगा। तब वह हमारी बात मानने को मजबूर होगा। हम उसे एक करोड़ दे रहे हैं, वह चाहे तो पांच लाख और ले ले; पर इससे आगे हमें नहीं बढ़ना चाहिए। वह चाहे जो कर ले।

दिन भर विचार-विमर्श के दौर चलते रहे। उस दिन और फिर अगले दिन भी कोई निर्णय नहीं हो पाया। सूरज चाहता था कि बात किसी तरह टल जाए, जिससे दोनों बहिनें अपने घर चली जाएं। असल में सोना दीदी से सूरज भी कुछ दबता था। क्योंकि उनका ससुराल पक्ष आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी सबल था। फिर चंदर के प्रति उनका प्रेम किसी से छिपा नहीं था। रेखा के साथ ऐसा नहीं था। एक तो वह सूरज से छोटी थी, फिर उसका परिवार भी सामान्य ही था। अतः जब कभी रेखा की राय पूछी जाती, तो वह कहती कि दोनों भाई मिलकर तय कर लो। मैं तो यह चाहती हूं कि घर में प्रेम बना रहे और गांव में परिवार का सम्मान। दीदी मां चुपचाप यह सब देख और सुन रही थीं।

इसी तरह दो दिन बीत गये। कोई निर्णय नहीं हो पाया। तीसरे दिन सूरज ने कह दिया कि वह सवा करोड़ से आगे नहीं जा सकता। चंदर चाहे तो इसे मान ले, अन्यथा उसकी इच्छा।

अब दीदी मां की बारी थी। वे धीर-गम्भीर वाणी में बोलीं, ‘‘सुनो भाई सूरज, या तो तुम दोनों भाई मिलकर कोई निर्णय कर लो। अन्यथा पिताजी की सम्पत्ति के चार हिस्से होंगे। इसकी हकदार हम दोनों बहिनें भी हैं। फिर इस हिसाब में वह सम्पत्ति भी आयेगी, जिसे तुम अकेले बेच चुके हो। ये मामला सीधे चार सौ बीसी का है। पिताजी की जायदाद तुमने हम तीनों की अनुमति के बिना बेची कैसे ? यदि तुम खुद को बहुत बड़ा मुकदमेबाज समझते हो, तो कम मैं भी नहीं हूं। मेरे लिए तुम दोनों भाई दो आंख की तरह हो। मुझे दोनों से बराबर प्यार है; पर मैं चंदर के साथ अन्याय नहीं होने दूंगी। बस मुझे यही कहना है।’’

दीदी मां के इस धोबीपाट से सूरज के माथे पर पसीना आ गया। उसकी पत्नी और बेटे-बहुएं भी ढीले पड़ गये। चंदर का सुझाव मानने पर उसे चार करोड़ की सम्पत्ति मिलती। लगभग इतनी ही वह बेच भी चुका था; पर यदि दीदी मां के कहे अनुसार चार हिस्से हुए, तब तो उसे केवल दो-ढाई करोड़ ही मिलेंगे। दुकान और मकान में से भी एक चीज छोड़नी पड़ेगी। बाजार में जो प्रतिष्ठा है, वह धूल में मिल जाएगी, और जगहंसाई होगी, सो अलग। अतः उसने सिर झुकाकर चंदर का प्रस्ताव मान लिया।

चंदर ने दीदी मां के और फिर भैया-भाभी के पांव छुए। उसकी पत्नी और बच्चों ने भी यही किया। साल भर में लिखत-पढ़त होकर प्रेमपूर्वक सारी सम्पत्ति के दो हिस्से हो गये। चंदर ने नौकरी छोड़ दी और अपने बेटे के नाम पर दोपहिया वाहनों की एजेंसी ले ली। अब तो उसने नया घर भी बना लिया है। घर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है ‘दीदी

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1 Comment on "कहानी : दीदी मां"

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Laxmirangam
Guest

बहुत अच्छी प्रस्तुति.

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