लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

इस कहानी के तीन मुख्य पात्र हैं.डा.(मिस) मारग्रेट,श्रीमती शीला सिंह और गौतम सिंह.श्रीमती शीला सिंह गौतम सिंह की पत्नी नहीं थी.वह गौतम सिंह की साली थी,यानि उनके पत्नी की छोटी बहन.शीला सिंह का विवाह जनार्दन सिंह के साथ हुआ था,जो मेडिकल कालेज का अंतिम वर्ष का छात्र था.गौतम सिंह उसी शहर में रहता था,जिसमें डा.(मिस)मारग्रेट मेडिकल कालेज में प्रोफेसर थी और पूरे राज्य में सबसे प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ मानी जाती थी.जनार्दन सिंह,चूंकि दूसरे शहर में मेडिकल कालेज का छात्र था,उसका डा.(मिस)मारग्रेट से कोई परिचय नहीं था,पर उनकी विशेषज्ञता से वाकिफ था.अतः जब शीला सिंह यानि उसकी पत्नी को गर्भ धारण के दौरान कुछ ज्यादा ही तकलीफ हुई तो उसने अपनी पत्नी को डा.(मिस) मारग्रेटके पास ले जIना उचित समझा.गौतम सिंह के उस शहर में रहने के कारण शीला सिंह को भी वहाँ जाने में कोई एतराज नहीं हुआ. और वह अपने पति के साथ आ पहुँची अपने जीजा और दीदी के पास.यहाँ तक तो सब ठीक था,पर जिस दिन सुबह वह ट्रेन से उतरी उस दिन उसकी तबियत ज्यादा ही खराब हो गयी और बदकिस्मती से वह दिन रविवार था.

अब थोडा परिचय गौतम सिंह का.गौतम सिंह गौर वर्ण और लम्बे छरहरे कद वाला एक उदीयमान अभियंता था.गौतम सिंह उसी शहर के एक कारखाने में कार्यरत था.सीधी सादी पत्नी थी उसकी और वह एक छोटी बच्ची का पिता था.सीधी सपाट दो टूक बात कहने में उसे कोई हिचक नहीं होती थी.कभी कभी उसे लगता था कि इन बातों का कोई विपरीत अर्थ न लगा ले,पर एक आदत थी जो छुटती नहीं थी.उसकी पत्नी भी इस बात पर कभी कभी उससे अपना मतभेद प्रकट थी ,पर शायद ही कोई प्रभाव पडता हो इन सबका उसपर.ऐसे भी गौतम सिंह के अपने इलाके के इतने लोग उस कारखाने में कार्यरत थे कि किसी से थोडी बहुत ठन जाने से भी उसको तो कुछ होना नहीं था. जिंदगी सुचारू रूप से ही चल रही थी.उसकी साली शादी के पहले और शादी के बाद भी एक दो बार उसके कारखाने वाले फ्लैट में आ चुकी थी.इसबार अचानक रात को फोन आया और सबेरे सबेरे आ धमकी शीला सिंह अपने पति के साथ.गौतम सिंह ने जब साली की हालत देखी तो दौडा दौडा आया मेरे पास.गौतम के चेहरे पर घबराहट देख कर मैं भी थोडा परेशान हुअ.तब उसने अपने साली की हालत बतायी.मैनें पूछा कि क्या डाक्टर मारग्रेट को ही दिखाना आवश्यक है?अगर ऐसा है तो कल तक प्रतीक्षा करनी होगी,क्योंकि आज तो रविवार है. अगर दिखाना बहुत आवश्यक है तो क्यों न किसी अन्य डाक्टर को दिखा लिया जाये ,क्योंकि रविवार को तो डाक्टर मारग्रेट कोई रोगी देखती नहीं.गौतम के चेहरे पर जब मेरी नजर पडी तो मैने देखा कि वह सोच में डूबा हुआ है.फिर थोडी सी बात करके वह मेरे पास से चला गया.

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डाक्टर मारग्रेटसे मेरी पहली मुलाकात उस घटना के चार या पांच वर्षों पहले हुई थी.देहIत से एक संबंधी और उनकी पत्नी आये हुए थे.वे लोग डा. मारग्रेट को ही दिखाना चाहते थे.ऐसे तो देखने में उनको कोई खास रोग नजर नहीं आता था,पर स्त्री के गुप्त रोगों का ज्ञान भी मुझे कहाँ था?मेडिकल कालेज में एक परिचित हाउस सर्जन मिल गया था.संयोग बस मेरे संबंधी से उसका भी दूर का रिश्ता निकल आया था.उसने सलाह दी कि डा. मारग्रेट से यहीं अस्पताल में हीं जाँच करा ली जाये.मुझे तो कोई एतराज नहीं था,पर मेरे संबंधी और उनकी पत्नी के चेहरे पर मुझे थोडी असमंजस की झलक दिखाई दी थी.बोले तो वे लोग कुछ नहीं. डा. मारग्रेट ने बहुत ध्यान पूर्वक रोगिणी की जाँच की थी.उनकी सब शिकायतें सुनी और विस्तृत सलाह के साथ दवायें भी लिख दी थी.पर मेरे संबंधियों का मनोविज्ञान.पति पत्नी दोनो को लगा कि डा.साहिबा को फीस तो मिला नहीं,अतः उन्होनें पूरा ध्यान नहीं ही दिया होगा. हाउस सर्जन और मैं डा.मारग्रेट के स्वभाव और उनके इमानदार चरित्र से पूरी तरह वाकिफ थे.हमलोगों को मालूम था कि डा.मारग्रेट के लिये अस्पताल में रोगी देखना एक ही कर्तव्य का पालन है.ऐसे भी घर पर वह प्रतिदिन केवल दस रोगी ही देखती थी.सलाह की फीस भी कोई ज्यादा नहीं थी.उनका कर्तव्य बोध दूसरे के लिये उदाहरण था.गोरी चिट्टी,भव्य व्यक्तित्व और उन्नत ललाट वाली बयालिस वर्षीया डा.मारग्रेट को देखते ही श्रद्धा से सर झुक जाता था.उच्च शिक्षित माता पिता की एकलौती संतान डा.मारग्रेट ने शादी क्यों नहीं की ,यह कोई नहीं जानता था.ऐसे उनका कोई अंतरंग मित्र था यह मुझे तो नहीं मालूम था.अपने कालेज,अस्पताल और रोगियों के अतिरिक्त मैने डा.मारग्रेट को अपने कुत्ते,बिल्लियों,फूल पौधों और उनकी देख भाल करने नौकरों और मालियों के परिवार की देखभाल मे ही उनको निमग्न पाया था.

कितनी कठिनाई हुई थी फिर से रोगिणी को डा.मारग्रेट से दिखाने में.पहले तो दो दिनों का अंतराल देना पडा था.फिर रोगिणी का नाम परिवर्तित किया गया था.उस पर भी भय था कि अगर उन्होने पहचान लिया तो बडी छिछालेदार होगी.सौभाग्य बस उन्होने रोगिणी को पचाना नहीं,पर जाँच के बाद उन्होने जो पर्ची दवाओं के नाम के साथ दी थी उसमे और दो दिनों पहले अस्पताल में दी हुई पर्ची में रंच मात्र अंतर नहीं था.

डा.मारग्रेट के सप्ताह के छः दिनों के कार्यकर्म में व्यवधान आता रविवार को.रविवार को प्रातः काल अपने फोल पौधों और पालतू जानवरों से दस बजे के करीब व चर्च चली जाती थीं.वहाँ से लौट कर दोफर के बाद वे झुग्गी झोपडियो में बीमार औरतों को देखने चली जाया करती थीं.किसी ने नहीं देखा था कभी भी इस कार्यक्रम में किसी परिवर्तन को.हो सकता है कभी बीमारी की अवस्था में ही शायद कोई परिवर्तन हुआ हो पर मैने उन्हे बीमार पडते हुये न कभी देखा था और न सुना था.

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उस रविवार को जब गौतम सिंह मेरे पास से लौट कर गया तो उसके मष्तिष्क मे हलचल मची हुई थी.वह सोच नहीं पा रहा कि क्या करे.दूसरा कोई व्यक्ति होता तो परिस्थितियों से हार मान लेता,पर गौतम तो गौतम ही था. थोडी देर बाद उसके घर से ती पहिया स्कूटर निकली,जिस पर गौतम,शीला और जनार्दन बैठे हुए थे.मुझे लगा कि वे लोग किसी अन्य डाक्टर के पास जा रहे होंगे.वे कोग करीब डेढ या दो घंटे के बाद लौटे थे.मैने उस समय कुछ पूछना उचित नहीं समझा था.दोपहर दो बजे के बाद गौतम सिंह मेरे घर आया था.उसके चेहरे पर चमक थी.सुबह की चिंता या परेशानी का नामोनिशान नहीं था.मुझे लगा कि उसके साली की तवियत अब संभल गयी है,इसीलिये उसके चेहरे से चिंता की लकीरें हट गयी हैं.

उसके बैठने के बाद मैं बोला,”चेहरे की लकीरें बता रहीं हैं कि शीला की तवियत सम्भल गयी है और लगता है,वह अपने जीजा जी से बहुत प्रसन्न है.”

गौतम मुस्कुराया,”कोई खास बात तो नहीं,पर हाँ अब डाक्टर से परामर्श के बाद उन मियाँ बीवी दोनो को थोडी मानसिक शांति अवश्य मिल गयी है.”

“मैने देखा था तुम लोगों को जाते हुए.किस डाक्टर को दिखाया?”

“डाक्टर मारग्रेट को.”

मैने समझा गौतम मजाक कर रहा है.रविवार को डाक्टर मारग्रेट से परामर्श वह भी सुबह चर्च जाने के समय?यह तो असंभव था.मैने प्रश्न भरी निगाह उसकी ओर उठायी.मैं कुछ बोलता,इसके पहले ही वह बोल पडा,

आपको शायद विश्वास नहीं हो रहा है,पर यह सच है कि मैने अपनी साली को डाक्टर मारग्रेट को ही दिखाया है.

वह काफी गंभीर लग रहा था.उस पर अविश्वास करने का कोई कारण भी नहीं नजर आ रहा था.पर यह बात मेरे समझ से परे थी कि वह अनहोनी होनी में कैसे बदल गयी.मेरे प्रश्न के उत्तर में गौतम सिंह ने जो बताया उसे सुनकर तो मैं आश्चर्यचकित रह गया. डाक्टर मारग्रेट मेरी निगाह में एक सच्चे इंसान का उदाहरण थी,पर अब तो वह देवत्व की सीमा में पहुँच गयी.

मेरे घर से लौटने के बाद गौतम ने एक निर्णय किया था,क्यों न डाक्टर मारग्रेट के चर्च जाने के पहले उनसे एक बार मिल लिया जाये.न जाने क्यों,उसे विश्वास थ कि डा.साहिबा उन लोगों से मिलने से इनकार नहीं करेगी.

गौतम जब अपने साली और साढू के साथ डाक्टर मारग्रेट के बंगले पर पहुँचा तो वे चर्च जाने के लिये तैयार हो रहीं थी.नौकरानी ने बताया कि मेम साहब रविवार को रोगी नहीं देखती,वे लोग दूसरे दिन आयें.गौतम को बुरा तो बहुत लग रहा था,पर वह विनम्रता से पेश आने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता था.पता नहीं यह उसके विनम्र व्यवहार का प्रभाव था,या नौकरानी को रोगिणी पर दया आगयी थी, वह डाक्टर मारग्रेट को खबर देने अंदर चली गयी.डाक्टर मारग्रेट भी तैयार होकर चर्च के लिये निकल ही रही थी.उन्होनें गौतम को अंदर बुला लिया.डाक्टर मारग्रेट ने उसको कहा कि वह दूसरे दिन रोगिणी को देख लेगी.आज का उनका प्रोग्राम ऐसा रहता है कि वह घर में रोगियों को देखती हीं नहीं.

न जाने क्या हुआ कि गौतम ने यकायक प्रश्न किया,

“मै’म आप कहाँ जा रही हैं?”

“मैने तुम्हें बताया किमैं चर्च जा रहीं हूँ.”

“आप चर्च किसलिये जा रहीं हैं?”

डाक्टर मारग्रेट सन्न रह गयी.उनका गोरा चेहरा अचानक लाल हो गया.गौतम भी यह देखकर घबडा गया.पर कुछ ही क्षण लगे उनको सम्भलने मेंअचानक गौतम ने उनके चेहरे पर एक अपूर्व चमक देखी. फिर गंभीरता के बीच उनकी वात्सल्य दर्शाती मुस्कुराहट.वे बोली,”बेटा तुम बहुत तेज हो.तुमने तो मुझे अपने कर्त्तव्य की याद दिला दी.मार्गदर्शन के लिये मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ.बुलाओ अपनी पत्नी को.अब मैं उसकी जाँच करके ही चर्च जाऊंगी.”

गौतम सिंह ने उन्हें बताया कि वह महिला उसकी पत्नी नहीं हैं.फिर बताया कि किन परिस्थितियों में वे लोग आज ही सुबह वे लोग यहाँ पहुँचे हैं.अपनी अशिष्ठता के लिए क्षमा याचना भी करने लगा.डाक्टर मारग्रेट ने उसको फिर कहा कि तुमने तो मेरे सुप्त कर्तव्य ज्ञान को जागृत किया है.क्षमा तो मुझे तुमसे और उन तमाम रोगियों से मांगनी चाहिए जो मेरे दरवाजे से रविवार को निराश होकर लौटे हैं.

डाक्टर मारग्रेट ने इसके बाद देर तक शीला सिंह की जाँच की.फिर जनार्दन को बुलाया और उसे भी कुछ हिदायतें दी.इस बीच उन्हें शायद याद भी नहीं आया कि उन्हें चर्च जाना है.शीला चूंकि मेडिकल कालेज के छात्र की पत्नी थी, उन्होने परामर्श की फीस भी नहीं ली.

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आज उस घटना को घटे वर्षों गुजर चुके हैं. डाक्टर मारग्रेट की उम्र साठ साल से ज्यादा हो गयी है.वे अभी भी उसी मेडिकल कालेज में प्रोफेसर हैंऔर आज भी उसी सेवा भावना से रोगियों को देखती हैं.आज भी चेहरे पर वही तेज है.उम्र के साथ गम्भीरता अवश्य बढी है.पिछले वर्ष वे सेवा निवृत होने वाली थीं,पर सरकार और जनता दोनो के अनुरोध से अपना विभाग सम्भालते रहने को मजबूर हो गयीं.गौतम,शीला और जनार्दन विस्मृति के गर्भ में दफन हो चुके हैं,पर उस दिन के बाद रविवार के सुबह आये हुए किसी भी गंभीर रोगी को बिना जाँचे डा.मारग्रेट चर्च कभी नहीं गयीं.

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