लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह 

“चा ऽ चा ऽ”.यह आवाज कानों में पडते हीं मैं थोडा ठीठका.फिर सोचा यह आवाज यहाँ कहाँ से आ सकती है?यह तो मेरे गाँव,मेरे इलाके की आवाज थी और मैं तो गुजर रहा था,कोलकाता में चौरंगी से.

आवाज फिर कानों में टकराई,”चा ऽ चा ऽ”.

वही खींची हुई आवाज.”हम आप हीं को पुकार रहे हैं”.

अब तो मुझे मुडना ही पडा.अटपटा तो लग रहा था यह सब,पर सोचा,देखूँ तो माजरा क्या है.अन्य किसी का ध्यान भी इस ओर नहीं गया था. ऐसे भी चौरंगी के भीड भरी सडक पर किसे फुरसत है एक दूसरे की ओर ध्यान देने की?

मुडने पर देखा कि कोने में हाथ रिक्शा लिये एक सफेद बालों वाला बूढा मुझसे मुखातिब है.तांबे के रंग वाला उसका शरीर पसीने से लथपथ था.वह एक गंजी और छोटी सी धोती पहने हुए था.उस कमर झुके वृद्ध को मैने नहीं पहचाना.मेरे चेहरे के अपरिचय पर शायद उसकी भी निगाह पड गयी थी.बोल पडा,

” आपने शायद हमको पहचाना नहीं?हम महमूद हैं.वही आपके गाँव वाला महमूद.आपको तो याद होगा कि हम बहुत सालों से कोलकाता में हैं”.

अब तो वाकई चौंकने की बारी थी मेरी.महमूद को इस रूप में देख कर और इस रूप में उसके द्वारा आवाज दिये जाने पर.

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तब मैं अपने गाँव में रहता था और हाई स्कूल में पढता था,शायद उससे भी कुछ वर्ष पहले.महमूद कुछ ही वर्षों बडा होगा मुझसे.उसके पिता की उम्र भी मेरे पिता की उम्र से कुछ ज्यादा ही थी.बगल के गाँव मेँ रहते थे वे लोग.महमूद के पिता जी मेरे पिता जी को चाचा कहते थे.चाचा,भईया,चाची,भौजी इत्यादि संबोधनों के इतने आदी थे हमलोग उन दिनों कि आश्चर्यजनक नहीं लगते थे ये संबोधन.महमूद उन्हीं दिनों कलकत्ता चलागया था.क्या ठIट थे उन दिनों उसके.पर्व त्योहारों के अवसर पर ही घर आता था वह.चकाचक सफेदकुर्ता,पायजामा और सुन्दर कलकत्तिया चप्पलों में जब वह जुल्फी काढ कर गाँव मेँ निकलता था तो लोग उसे देखते ही रह जाते थे.कलकत्ता के अपने किस्से भी सुनाया करता था वह.हमलोग, जो उम्र में उससे छोटे थे,मुग्ध हो जाते थे उन किस्सों को सुनकर.उन दिनों लगता था ,क्या बहार होगी कलकत्ता की.कैसा होगा वह शहर?कभी कभी लगता था,पुछूँ आरा या बक्सर के मुकाबले वह कितना ज्यादा बडा होगा?ये ही दो शहर उन दिनों मेरे देखे हुये थे.कुछ अधिक नहीं जानता था मैं उन शहरों के बारे मेँ भी,पर उनके रौनक की जानकारी तो थी मुझे.हाई स्कूल की पुस्तकों में जब कलकत्ता का विस्तृत विवरण पढा और उसकी जनसंख्या,उसके दर्शनीय स्थलों,विशेष रूप से हावडा के पूल के बारे में जब पढा तब तो महमूद की किस्मत पर इर्ष्या का भाव भी उदित हुआ.लगता था पता नहीं कब दर्शन होगा कलकत्ता का. एक महमूद है जो वहाँ मौज कर रहा है.सुना था,किसी चटकल में काम करता है,जहाँ उसे अच्छी पगार मिलती है.उसके पहनावे और उसके द्वारा लाये गये सौगIतों के ढेर से तो कुछ वैसा ही लगता भी था.पता नहीं वे सौगात कितने कीमती थे,पर आँखे चौधियाने के लिए तो वे काफी थे.मुहर्रम में ताजिये का वह जुलूस और उसमें बढ चढ कर हिस्सा लेने वाले महमूद और उसके बाहर से कमा कर आये हुये उसके साथी हमलोगों के लिए किसी फिल्मीं हीरो से कम नहीं थे.बातें भी उनकी फिल्मी अंदाज में हुआ करती थी.इसी तरह कुछ वर्ष बीत गये थे और मैं शहर में आ गया था आगे की पढाई के लिये.यह शहर हालांकि बहुत बडा था,पर कलकत्ता की तुलना में तो कुछ नहीं था.कलकत्ता देखने की ललक तो अभी भी सताती थी.महमूद की कहानियों के साथ साथ कलकत्ता के बारे में किताबी ज्ञान भी तो अंकित हो गया था मेरे मानस पटल पर.

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और तब मौका आ गया था कलकत्ता दर्शन का.कालेज की ओर से कलकत्ता जाने का.मैं बहुत प्रसन्न था,इतना प्रसन्न कि अपनी प्रसन्नता का वर्णन करना मेरे बश से बाहर था.फिर देखा था मैने कलकत्ते को.चौरंगी और पार्कस्ट्रीट के चकाचौंध से परे भी एक दुनिया देखी थी मैंने.हावडा ब्रिज तो चकित कर गया था मुझे,पर उसके आसपास गरीबी का तांडव नृत्य भी देखा था मैंने.मैंने पहली बार देखा था मानवों को जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीते हुए,छोटी छोटी झुग्गियों में,जिसमे घुस कर खडा भी नहीं हुआ जा सकता था,अपने परिवार के साथ रहते हुये.मैंने पहली बार देखा था गंदे नालों के किनारे बसी हुई उन झोपडियों को.झोपडियों में रहने वालों को नाले के गंदे जल में स्नान करते हुये भी मैंने पहली बार देखा था.वह भी वहाँ जहाँ गंगा इतने नजदीक थी.मैंने सबेरे सबेरे देखा था मलमूत्र भरे बाल्टियों को और उन बाल्टियों को ढोते हुये ,उन लोगों को जो मेरी मानव बिरादरी के ही सदस्य थे. यह तो थी हावडा क्षेत्र की कहानी.सियालदह क्षेत्र भी कुछ भिन्न नहीं था.वही मनुष्यों का रेला,वही झुग्गियाँ और उनमें रहते हुये लोग.उन लोगों की बोलचाल से लगता था कि वे देश के विभिन्न हिस्सों से जीविकोपार्जन के लिए यहाँ आये हैं.पता नहीं कैसे रहते हैं ये लोग और क्या कहते होंगे,अपने लोगों से जिनके पास वे लौट कर जाते होंगे.क्या ये लोग भी महानगर की चकाचौंध वाली जिंदगी का बखान कर पाते होंगे?क्या बता पाते होंगे कि वे महानगर में रहते हैं?पता नहीं क्यों वितृष्णा सी हो गयी थी मुझे यह सब देख कर.पर नहीं छुटा था कलकत्ता का साथ,वाशिंदा तो नहीं हो सका था उसका,पर कIम काज के सिलसिले में जाता ही रहता था.गाँव से भी एक तरह से नाता टूट ही गया था.छठे छमाहे कभी जाता भी था तो थोडे समय के लिये.महमूद और उसके साथी जो बचपन में हीरो लगते थे ,अब विस्मृति के गर्भ में खो चुके थे.

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इस बार भी मैं आफिस के कार्य से ही कलकत्ता आया था.यह पैतीस छतीस वर्ष की उम्र भी अजीब है,न आपकी गिनती युवकों में होती है न आप वुजुर्गों की श्रेणी में आते है.यह विचार मन में आया था चौरंगी एरिया में युवक युवतियों की मस्ती को देख कर.लगता था आज अगर मैं भी ऐसा करने लगूँ तो पता नहीं लोग क्या सोचेंगे.शायद उच्छ्ऋंखलता ही मानी जायेगी.वुजुर्गों वाली शालीनता ओढना भी समय से पहले बूढा होनI है.ओढने से भी वुजुर्गियत थोडे ही आ जायेगी?मुस्कुरा उठा मैं.कहीं पत्नी न अवगत हो जाये इन विचारों से.ऐसे भी वह कहा करती है कि मैं समय से पहले वृद्ध होता जा रहा हूँ.पत्नी का ख्याल आते हीं मन दूर अपने शहर में जा पहुँचा,जहाँ पत्नी एवं बच्चे थे.तभी वह चा S चा S वाली आवाज और अब मैं खडा था महमूद के सामने.मुझे तो अभी भी लग रहा था कि यह बूढा महमूद नहीं है. कहाँ महमूद की जुल्फी ,कहाँ इस बूढ़े के सलवट पर बिखरे हुए चंद सफेद बाल.महमूद की उम्र मेरे हिसाब से तैंतालीस या चौआलीस वर्ष होनी चाहिए .इस उम्र में कोई मनुष्य इतना बूढा लग सकता है,यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था..एक बात और थी.महमूद के अब्बा मेरे पिताजी को चच्चा कहते थे,पर महमूद ने मुझे चच्चा या चाचा कह कर कभी सम्बोधित नहीं किया था.. उस समय महमूद जवान था,बांका था.मेरी गिनती तो न बच्चों में होती थी न जवानों में.अब तो गाँव से सम्पर्क लगभग टूट जने के कारण कोई सम्बंध भी तो नहीं रह गया था इन लोगों के साथ.पन्द्रह बीस वर्ष तो निकल हीं गये होंगे इस बीच.आज जब महमूद ने पहचान के आवाज दी और उसके सामने खड़ा होकर भी मैं उसे पहचान नहीं पाया तो मुझे थोड़ी आत्म ग्लानी अवश्य हुई,पर जो बीत चुका उसको तो बदला भी नहीं जा सकता था.

“बड़ी हिम्मत करके हमने आप को आवाज दी थी.एक बार तो लगा कि हमर अँखवा धोखा तो नहीं दे रहल है, पर जब आप सामने आ गये तो हमका विश्वास हो गया कि आप ही हैं “

मेरे मन में बहुत से विचार उमड़ घुमड़ रहे थे,पर पता नहीं चल रहा था इससे क्या पूछूं. कैसे पूछूं ?उसे हाथ रिक्शा चलाते हुए देख कर मुझे दू:ख भी हो रहा था.कोलकाता की यह सवारी मुझे अमानवीयता की पराकाष्ठा लगती है.मानव का गदहे या घोड़े कीतरह घंटी बजाते हए दौड़ना ,अजीब से अवसाद से भर जाता है मुझे.मैंने देखा है किस तरह हांफते हुए ये लोग दो दो ढाई.ढाई.मन के दो मोटी मोटी सवारियों को बैठा कर दौड़ लगाते हैं.एक हीं बार तो मैं चढ़ा था हाथ रिक्शे पर. फिर कसम खाई थी की अब कभी भी नहीं बैठूंगा.मुझे तो यह भी ध्यान नहीं आया था कि यह रिक्शा इनकी जीविका का साधन है और लोग नहीं बैठेंगे तो इनका क्या होगा? यह भी अजीब बात है की कलकत्ता को छोड़ कर अन्य किसी भी शहर या कस्बे में हाथ रिक्शा है भी नहीं.ऐसे तो मैंने यह भी सुना था कि रात के अँधेरे में इन रिक्शों का इस्तेमाल हर तरह के अवैध धंधे में होता है.मुझे तो यह हाथ रिक्शा उन दिनों की याद दिलाती थी ,जब साधन सम्पन लोग हजारों मनुष्यों को गुलाम बना कर जानवरों की तरह रखते थे.मुझे यह भी लग रहा था कि मेरी यह क्षणिक चुप्पी भी महमूद को परेशान कर रही होगी ,अत: मैंने बातों की श्रृंखला आगे बढायी.

“भाई,मैं तो तुम को एकदम पहचान नहीं पाया .सच पूछो तो इसमें मेरा भी ज्यादा दोष नहीं.पन्द्रह या सोलह वर्ष पहले हमलोग आखरी बार मिलें होंगे.तब तुम गबरू जवान लगते थेऔर आज यह हालत?बीमार थे क्या?”

चाचा जी गरीबी सबसे बड़ी बीमारी है. हम गरीब लोगन का इससे बढ़ कर और बीमारी क्या हो सकती है ?ऐसे भी हमरा के कई बीमारी घेर ली है.जिन्दगी में जितनी सांसत लिखी है वह तो भुगते हीं पड़ी न.”

मुझे तो अभी भी लग रहा था कि कहीं कुछ गडबड है.महमूद के माता पिता कोई .धनी मानी लोग तो नहीं थे,पर गरीब भी नहीं थे.अच्छे खाते पीते घर का लडका था यह महमूद.गाँव में जाने पर यह भी पता लगा था की महमूद के परिवार में बँटवारा हो गया है,पर इसके अपने हिस्से के अतिरिक्त कलकत्ते कई कमाई भी तो थी.अब तो इसके बच्चे भी बड़े हो गये होंगे.पत्नी को वह कभी कलकत्ता नहीं ले गया था,यह मुझे मालूम था.ऐसे भी मैंने देखा है कि मेरे इलाके के जो लोग बाहर रहते हैं,उनकी पत्नियाँ अधिकतर गाँवों में ही रहती है.अपवाद स्वरूप मेरे जैसे लोग हैं. मुझे याद है कि पहली बार जब मैंने अपनी पत्नी को साथ ले जाने और उसको अपने ही साथ रखने की बात कही थी तो लोगों के चहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई अनहोनी हो गयी हो.उन दिनों तो पत्नियाँ कुछ दिनों के लिए पति के साथ जाती थी, वह भी किसी ख़ास बीमारी वगैरह के कारण ,नहीं तो रहना पड़ता था उन्हें गाँवों में ही,पतियों को याद करते हुए.महमूद भी उन्हीं लोगों में से था.

“आखिर ऐसी भी क्या गरीबी थी भाई तुमको और यह रिक्शा क्यों खीच रहे हो?तुम्हारी तो जूट के कारखाने में स्थाई नौकरी थी ,उसका क्या हुआ?”

एक साथ इतने प्रश्नों के पूछे जाने से महमूद घबडाया सा लगा.उसके चेहरे की परेशानी मुझसे छिपी नहीं रही.मुझे लगा कि इस तरह के प्रश्न मुझे नहीं करने चाहिए थे.महमूद के साथ इसी बीच अवश्य कुछ ऐसा हुआ है जो मेरी जानकारी में नहीं है.लगता है कि अनजाने ही मैंने उसकी कोई दुखती रग छेड़ दी है.

अब महमूद बहुत धीरे धीरे बोल रहा था.मुझे थोडा आश्चर्य भी हो रहा था कि अभी तक कोई सवारी उसके रिक्शे के पास नहीं आयी थी.शायद मेरा उसके सामने खड़ा होना भी इसका एक कारण हो.एक अन्य विचार भी मेरे मन में कौंधा .कोई यह न सोच रहा हो कि मैं इस रिक्शे वाले को किसी ख़ास काम के लिए पटा रहा हूँ.पर इस विचार को मैंने परे झटक दिया.

“क्या बताएं कृष्णा चाचा.बड़ी लम्बी कहानी है हमरी.हमरे जैसा लोग अपने ही जाल में कैसा फँस जाते हैं, इसको का जानेंगे आप? पता नहीं का जाने काहे हमका लग रहा है कि आपको अपनी जिनगी का सच्चा किस्सा सुना ही डालें.ऐसे भी झूठ का बोझा ढोते ढोते हम थक गये हैं.”

मेरी नजर घड़ी की ओर उठी.मुझे लगा कि कोई जल्दी तो है नहीं.होटल पहुँच कर भोजन करना है और सो जाना है.मेरी उत्सुकता भी बहुत बढ़ गयी थी.महमूद को न जाने क्यों लगा कि मैं उसकी कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा हूँ.शायद उसने मुझे घड़ी देखते देख लिया था. वह यकायक चुप हो गया था.

मैंने तुरत कहा,”क्यों भाई ,तुम चुप क्यों हो गये?मैं तो तुम्हारी पूरी कहानी सुनना चाहता हूँ.हमलोगों का सम्बन्ध आज का नहीं है.अगर तुम मुझसे अपने दिल का हाल नहीं कहोगे तो किससे कहोगे?”

आत्मीयता भरे इन शब्दों ने न जाने क्या जादू किया कि महमूद की आँखें डबडबा उठीं.

“चाचा बहुत झूठ बोला है हमने और वही झूठ का बोझा हमरा जिनगी को नरक बना गया.”

मैं अब उसकी ओर एक टक देख रहा था.पर मुझे अभी भी पता नहीं चल रहा था कि वह क्या झूठ बोला था और कैसे उसकी जिन्दगी नर्क बन गयी थी?

महमूद बोलता जा रहा था,”सबसे बड़ा झूठ तो चाचा,नोकरी के बारे में ही था.हमरा कोई परमानेंट नोकरी चटकल में कभी नहीं था.हम तो भाग कर कलकत्ता आया था. यहीं चटकल में किसी तरह रोजदारी पर काम में लग गया था.चटकल वाला मालिक लोग किसी को परमानेंट रखता भी नहीं है.वह लोग बोलता है कि इसमें बहुत लफडा है. वह लोग तो जादा से जादा आदमियों को रोज्दारी पर ही रखता है.उसमे उन लोगन को पैसा भी कम देना पड़ता है और कुछ गडबड होने से तुरत निकाल बाहर भी कर देता है.”.

कलकत्ता के जूट मिलों के बारे में इस तरह की कहानियाँ तो मैनें सुनी थी.यह भी सुना था कि बहुत ही अमानवीय अवस्था में वे लोग जिंदगी वसर करते हैं,पर ये सब तो बाद की बातें थी.पहले तो मैने महमूद के ठाट ही देखे थे.यह विरोधाभास मैं नहीं समझ पाया था आजतक.,पर आज लग रहा था कि परत दर परत सब कुछ साफ होता जा रहा है.मेरी कानों ने सुना,महमूद कह रहा था,”चाचा,आपको तो शायद याद भी नहीं होगा. हमलोगन का कितना परभाव था,गाँव में.हमरा कितना खातिर होता रहा वहाँ.”

 

मैं मन ही मन कह उठा,”मुझे आज भी अच्छी तरह याद हैं वे दिन और तुम्हारी वह हीरो की तरह पूजा.पर अभी भी मैं समझने में असमर्थ हूँ कि वह सब क्या था?”

मेरे विचारों से अनजान महमूद कहता जा रहा था,”हम भी रोजदारी पर चटकल में मजूरी करने लगा था.इतना तो जरूर मिल जाता था कि खाना खा सकें और कुछ कपडे बनवा सकें. पर सबसे ज्यादा परेशानी थी रहने की.किस तरह की कोठरी में हमलोग वहाँ रहता था,आपको अन्दाज भी नहीं हो सकता.”

“नहीं महमूद मुझे खूब अंदाज है.मैनेंबहुत नजदीक से देखी है वह जिंदगी,पर मुझे यह नहीं पता था कि तुम भी कलकत्ता में वही जिंदगी जी रहे हो.”ये मेरे मन में उठते विचार थे,पर कान तो महमूद की आवाज सुनने में लगे थे.

“कुछ महीने तक काम करने का बाद हमरा घरे जाने का मन करने लगा..सोचा कि अब देखना चाहिये कि गाँव का क्या हाल चाल है.गाँव का ताजिया का जुलूस भी देखना था.सगाई तो हमरा बहुत पहले हो गया था.निकाह बाकी था. अब लगने लगा कि निकाह भी हो जाता तो अच्छा होता.लगा कि गाँव में जरा रोब से जाना चाहिये.आखिर अब हम कलकत्ता में रहता है. यहाँ का हावडा का पुल हमने अपनी आँखों से देखा है. यहाँ का सिनेमा घर में कैसा कैसा फिलम देखा है.यह भी देखा है कि चौरंगी और पारक स्ट्रीट में कितना चमक दमक है.यह सब हम वरणन करेगा तो लोग कितना रोआब में आयेंगे.सच पूछिये चाचा तो उस समय हम बहुत ऊँचा उड रहा था और यही हमसे पहला गलती हो गया.हमने आगे के बारे में कोई ख्याल नहीं किया.कुछ पैसे तो बचाये थे,कुछ संगी साथी लोगों से उधार लिया.फिर अपना लिये अच्छा कपडा सिलवाया,धरमतल्ला से महंगा वाला चप्पल लिया.परिवर वालों के लिये भी ढेर सारा चीज खरीदा था हमने उस बार.हमको तो ये विचार भी नहीं आया चाचा कि कितना करजा चढ गया है हम पर.रोआब दिखाने का चक्कर मा हम सब कुछ भूल गया था.इसके बाद जा पहुँचा था अपने गाँव.गाँव चाचा,इतना रोआब पडा,इतना परभावित हुए लोग कि पूछिये मत.आप तो उस समय बहुत छोटे होंगे.आपको कहाँ याद होगा ये सब.”

महमूद तुम्हारी इस पहली यात्रा के समय भी मैं इतना छोटा नहीं था.उस समय की भी कुछ कुछ बातें याद है,पर बाद के दिनों के तुम्हारे ठाट तो मुझे अच्छी तरह याद है.ऐसे भी कुछ बातें मैं अवश्य भूल गया था,पर अब तो लग रहा है कि पर्दे पर एक एक तस्वीर सामने आती जा रही है.यह मौन स्वीकृति थी मेरी उसके कथन की,पर प्रत्यक्षतः मैं कुछ भी न कह सका.

महमूद कह रहा था,”उसी यात्रा के दौरान हमरी निकाह भी कर दी गयय.कलकत्ता लौटने का भुत दिनों बाद खबर मिली कि हमरा बेटा हुआ है.अब तो हमरा मन और कुल्लाचें भरने लगा था.दूसरी बार हम गाँव पहुँचा तो और सब लोगन के अलावा बीवी के लिया साडी,चप्पल और बेटा के लिये बावा सूट,चाभी से चलने वाला खिलौना और क्या क्या नहीं ले गय.गाँव में जो पहला बार परभाव पडा था ,वह भी हमको याद था.इस बार तो बेटा होने का खुशी का बार था.एह वास्ते कुछ रूपया भी जोगाड करके ले गया था.पहली बार का करजा भी पूरा तरह नहीं उतार पाया था.एह बार फिर करजा हो गया.थोडा फिकर हुआ था ओह समय फिर सोचा कि आगे साल तक करजा नहीं उतरेगा तो हम गाँव ही नहीं जायेगा.एही बीच बडा साला का चिट्ठी आगया कि वह कलकत्ता देखने के वास्ते आना चाहता है.हम को लिख देना चाहिए था कि हम किस हालत में रहता है,पर हमने ऐसा नहीं किया. किस तरह चिरौरी और विनती करके अपने एक साथी के घर,जो अपने माँ बाप के साथ रहता था,हमने उसका लिये इंतजाम किया था,किस तरह अपना काम का नुकसान करके उसको कलकत्ता दिखाया था वह आज भी याद है.उसको एकदम शक नहीं पडने दिया था.वह भी जाकर खूब बखान किया था हमरे परभाव के बारे में.उसको का पता था कि जब तक यहाँ था हमरा जान कितने साँसत में फसाँ था.कितना पैसा का नुकसान हुआ था हमरा.”

अब बात कुछ कुछ समझ में आरही थी,पर अब मेरी समझ में नहीं आरहा था कि वह इस स्थिति में कैसे पहुँचा?उसकी नौकरी का क्या हुआ?शायद महमूद ने मेरे विचारों को भाँप लिया.वह कहने लगा,

“चाचा,लगता है कि आप सोच रहे हैं कि हम रिक्शा कैसे चलाने लगा.आपका सोचना गलत नहीं है.हमकू कभी कभी अपने लगने लगता है कि हम यह रिक्शा कैसे चलाने लगा.चाचा,चटकल की नोकरी तो टेमपरवरी थी,पर हमरा तो यह ख्याल भी नहीं आया था कि यह नोकरी छुटेगी.दस ग्यारह साल काम करते हुए हुआ था कि खबर उडी कि मालिक लोगों का घाटा हो रहा है,एह वास्ते मजदूरों का छटनी होगा.अभी इस पर कुछ सोचा भी नहीं था कि हमरा भी छटनी हो गया.अब तो हमरा कुछ ना सूझे कि हम का करें.एक बार तो गाँवों जाने का विचार हमरा मन में आया.फिर सोचा कि उहाँ जाकर भी का होगा.बँटवारा के बाद गाँव में रहने को एक कोठरी मिला था.ओही में हमरा औरत तीन तीन बच्चों के साथ रहता है.हम सोचा कि हमरा जाने से उन लोगों का भी दुःख बढ जायेगा. फिर हम खायेंगे भी का?खेती भी थोडा ही था.ओह मे गुजारा करना पार नहीं लगता.गाँव में हम मेहनत मजदूरी करने लायक था नहीं.संगी साथियों का करजा भी नहीं उतराथा.सच पूछिये तो हमको कोई राह नहीं सूझ रहा था.एक बार तो मरने का भी ख्याल आया था.लगा कि एह जिनगी से तो मौत ही अच्छा .पर बीवी बच्चों के ख्याल ने मरने भी नहीं दिया था.हमरा एक साथी जिसको पहले ही चटकल से निकाल दिया गया था,यही काम करता था.हमको ओकरा संग समपरक था.बस विचार आया कि अब और कुछ नहीं हो सकता.हमको भी एही काम करना होगा.फिर तो हम भाग आया चटकल के इलाके से,अपनी झोपडी वैसा ही छोड छाड कर.हमको पता था कि कलकत्ता इतना बडा शहर है कि हमको कोई ढूंढ भी नहीं सकता.अब तो दस वर्षों से हम यही रिक्शा चला रहे हैं.अब तो बच्चा लोग भी बडा होगया है.अभी तक तो गाँव के आसपास ही पढाई कर रहा था,अब आगे क्या होगा,यह उपर वाले मालिक को ही मालूम है. हमरा गाँव और परिवार का लोग तो आज भी समझता है कि हम फैक्ट्री में नोकरी करता है.हमने किसी को बताया भी नहीं.पर अब कुछ दिनों से लगने लगा है कि झूठ का भार और नहीं सहा जायेगा.इ सब हमरा छाती पर बोझ बन गया है.दम्मा खाँसी सब पकड लिया है हमको.पर दुखडा सुनने वाला भी यहाँ कौन है?आज आपको देख कर लगा कि आपसे सब कुछ सच सच कह ही दे.पता नहीं कब का हो जाये.अपना बोझा तो थोडा हलुक हो जायेगा.”

मेरा मन भर आया था.महमूद भी थक सा गया था अपनी बात कहते कहते.सवारी तो अभी भी नहीं मिली थी,पर वह प्रतीक्षा कर रहा था.मैं उससे संतावना का एक शब्द भी नहीं कह सका और चल पडा भारी कदमों से वहाँ से महमूद की जिंदगी के बारे में सोचता हुआ.सोच रहा था, कहाँ महानगर का चकाचौंध और कहाँ महमूद जैसे सीधे सादे लोग. उनकी विवशता उनकी नियति बन गयी थी. महानगर के चकाचौंध ने एक तरह से उनको अंधा कर दिया था और वे बाध्य हो गये थे उसी अंधेपन में, जिंदगी की गाडी को घसीटने को.

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