लेखक परिचय

राजकुमार सोनी

राजकुमार सोनी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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– राजकुमार सोनी

बचपनसे शायद जब मैं 7-8 साल की रही हूंगी तब से ही अछूत थी। मुझे छूने सेलोगों में वायरस फैल जाता था। वायरस भी कोई साधारण नहीं बहुत भयानक था।इसलिए लोग मुझसे ज्यादा बात नहीं करते थे। वैसे तो हम दो बहनें और एक भाईथा। भाई हम दोनों बहनों के बीच में था। मैं सबसे छोटी थी। इसलिए राहुल भैयाऔर सुषमा दीदी दोनों ही कहते थे कि हम दो हमारे दो थे। हम तुम पता नहींकहां से आ गईं। हालांकि दोनों मुझसे बहुत प्यार करते थे। मगर फिर भी औरथोड़ा बड़ा होते-होते मुझे इस बीमारी ने घेर लिया। रिश्तेदार घर वाले थेमुझसे मिलने में कि ये बीमारी कहीं उनके बच्चों को लग गई तो इस समाज मेंउनका रहना मुश्किल हो जाएगा। क्या करें, हमारा समाज भी तो खोखलेरीति-रिवाजों से बना हुआ है। खैर… मैं बात कर रही थी, अपनी बीमारी की औरइसका खामियाजा हमारे पूरे परिवार को कभी-कभी भुगतना पड़ता था।

पड़ोस के वर्माजी आज अपनी बेटी को बहुत डाट रहे थे। क्योंकि उसने चौराहे परदीपक से बात कर ली जो उसी की क्लास में था। दीपक को बुक चाहिए थी जो आरतीने उसे दे दी थी। बस इस बात पर वर्मा अंकल ने गुस्सा होकर अपनी कॉलेज जातीलड़की को चांटा मार दिया। वर्मा जी का घर और हमारा घर आपस में जुड़ा हुआथा। चम्मच गिरने की भी आवाज आ जाती थी। तो ये अंकल का चांटा था। मुझसेबर्दाश्त नहीं हुआ और मैं अंकल को कहकर आ गई कि दो बातें करने से आरती दीदीखराब नहीं हो गईं। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था। अंकल और गुस्सा हो गए कितुम्हें हमारे घर में बोलने की क्या जरूरत है। जाओ यहां से। बित्तेभर कीलड़की और ये जुर्रत। हां, मैं बित्ते भर की थी। कद छोटा, मगर सपनों कीउड़ानें ऊंची-ऊंची। कभी पायलट, कभी पुलिस वाली, तो कभी कलेक्टर, मन हमेशाऐसी बातों की तरफ जाता, जहां विद्रोह हो, जज्बा हो कुछ करने का। पर मेरेइसी जज्बे की कीमत घर वालों को चुकानी पड़ी। आरती दीदी, सुषमा दीदी कीदोस्ती टूट गई और सुषमा दीदी के कोप का भाजन मुझे बनना पड़ा।

क्या करूं। दूध में पानी की मिलावट, सड़कों की खस्ता हालत, मिनी बस वालोंकी बदतमीजी, नेताओं के वादे और उन्हें पूरा न करना, लोगों का एक दूसरे कोनीचा दिखाने का जुनून मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। ऊपर से मीठा बनना औरअंदर से मैल। ये भी मुझसे नहीं होता। सारी सहेलियां कहतीं कि अपने आपको बदलले, ये छोटी-छोटी बातें हैं। इन पर ध्यान मत दे। मगर मैं क्या करूं। हरकाम में बचपन से लेकर आज तक परफेक्शन की बीमारी थी। जी हां, मुझे यही छूतकी बीमारी थी। इसलिए लोग मुझसे तन्वी जैन से बात करने में डरते थे कि येलड़की पता नहीं किस बात पर भड़क जाए और हमें पता नहीं किसका विद्रोह करनापड़े। मैं अपनी सहेलियों में हीरो थी, पर रिश्तेदारों की नजरों में मैंअसंस्कारी लड़की थी। कॉलेज आते-जाते मुझे प्यार हो गया अपनी ही जाति केलड़के से पर ये बात अब मायने नहीं रखती क्योंकि वो लड़का मुझसे ज्यादासमाजवाला था। इसलिए मेरी नजरों में वो कायर निकला, मैं और विद्रोही हो गई।कॉलेज खत्म होते-होते कैरियर की चिंता होने लगी और मैं आगे की पढ़ाई करनेबाहर चली गई। पढ़ाई पूरी होते-होते ही शादी तय हो गई। मुझसे पहलेदीदी-भैय्या की शादी हो चुकी थी। सुषमा दीदी की शादी के बाद उनकी डिलीवरीपर जब में उनके ससुराल मदद करने गई तो वहां उनकी सास को देखकर शादी नाम सेही डर गई और सीधे-साधे जीजाजी को देखकर मन गुस्से से भर गया। सातवें महीनेमें दीदी को पोंछा लगाते कराहते देख बहुत गुस्सा आया। घर लौटते हीमम्मी-पापा को कह दिया, दीदी को तलाक दिलवा दो, जो अपनी बीबी के मान-सम्मानकी रक्षा न कर सके, जो घर अपनी गृहलक्ष्मी को सम्मान न दे, वहां रहने सेक्या फायदा। मगर समाज फिर मुस्कुराता खड़ा था। मुझे कभी समझ नहीं आया किसमाज कहां है। खैर… कुछ सालों बाद दीदी की जिंदगी पटरी पर आ गई और उनकीसास की मौत हो गई।

तन्वी जल्दी तैयार हो जाओ, लड़के वाले आते ही होंगे। भाभी की आवाज से मैंअपनी 25 साल पहले की जिंदगी से लौट ही रही थी कि सोचा कुछ भाभी के बारे मेंकहा जाए। अमीर बाप की संतान, बात-बात पर आंसू बहाने वाली और अपने पापा केपैसों का रौब दिखाकर हर पल हमें ये अहसास कराती कि तुम नौकरी वाले हो, तुम्हारे पास सिवाय अपनी ईमानदारी, एक दूसरे की मदद करने के अलावा कुछ भीनहीं है, पर आज मेरी सगाई एक पैसे वाले खानदान में तय हो रही है। कैसेनहीं… पता क्योंकि हमारे पास तो देने के लिए मोटा दहेज भी नहीं। शायदमम्मी-ापा के संस्कार अच्छे हैं, जिनकी खुशबू उन तक पहुंची और उनकी तीसरीअनचाही संतान की शादी इतने ऊंचे खानदान में हो रही थी। और… इधर मेरी भाभीकी तबीयत ये सब देखकर खराब हो रही थी। खैर… मेरी सगाई बहुत अच्छे से होगई। पति बहुत अच्छा मिला पर मेरी विद्रोही भावनाएं खत्म नहीं हो पा रहीहैं। घर में कुछ बातों से मेरा मन बहुत खराब हो जाता, घर की छोटी बेटी अबबहु बन चुकी है। तन्वी, सासू मां की आवाज आई। आज फिर तुमने नमक कम डाला। अबकैसे खाना खाएंगे। और मेरा मन कहता है कि क्या ऊपर से अपने स्वाद के हिसाबसे नमक नहीं डाल सकते। मेरे ससुराल में बहुत मेहमान-नवाजी की जाती है। 99 फीसदी अच्छा करने के बावजूद एक फीसदी की कमी सारा घर निकालता। यही बात मुझेअच्छी नहीं लगती। आखिर मैं भी इंसान हूं। पतिदेव को कभी शिकायत करो तोकहते, अरे एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकाल दो, पर कैसे मैंने अपनेजीवन में कभी किसी को निराश या दु:खी नहीं किया, फिर क्यों मेरे साथ ऐसाहोता है। और…. आज तो हद हो गई। वर्मा अंकल की बात मेरे घर में हुई, जबसुसराजी ने मेरे कॉलेज के दोस्त के सामने मेरी बेइज्जत कर दी, सिर्फ इस बातपर कि मैंने दिन में बाहर खाना क्यों खाया। इन सब बातों से मेरा मानसिकसंतुलन गड़बड़ा रहा था। मन में दिन रात अपने आपको साबित करने की जद्दोजहदचलती रहती कि कैसे बताऊं कि मैं भी सही हूं। पहले इन सब बातों का विरोधकरते हुए भी जिंदा थी और आज इन सब बातों को सहते भी मैं जिंदा हूं। औरतशायद इसलिए इतनी शक्तिशाली है। हर काल में, हर युग में सहती है। सहकर भीजिंदा रहकर काली मां, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती देवी के रूप में पूजते हैं। घर में उसी की इच्छाओं, उसकी भावनाओं को मारकर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते हैं।

 

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