लेखक परिचय

अलकनंदा सिंह

अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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prostitutesअकसर कहा जाता है कि किसी भी समाज में बड़े बदलाव उस समाज में औरतों की  स्थ‍िति और उनकी  सामाजि‍क प्रगति  के साथ ही आते हैं । समाज में आम तौर पर औरतों की दशा के ऊपर व्याख्यानों – विमर्शों तथा दावों के  प्रलाप भी होते रहते हैं मगर इस कथ‍ित  प्रगति-गाथा के बीच कहीं भी नहीं गिनी जातीं वे औरतें , जिनके गले हुए शरीरों पर चढ़कर समाज नैतिकताओं के ऊंचे महल स्थापित करता है और यही समाज उन्हें ‘ बुरी औरतें या गलीज़ धंधे वाली ‘ होने की संज्ञा भी देता है।  समाज ने ही जिंदगी के ‘ ब्लैक एंड व्हाइट ‘ पोस्टर में से इस ‘ बुरे धंधे’  का ग्रे शेड अपने स्वार्थों के लिए निकाला मगर उसकी सेहत और सुरक्षा के लिए कोई उपाय नहीं किये ।
समाज की इसी तस्वीर का दूसरा पहलू उन गैर सरकारी संस्थाओं का है जो ” बुरे काम में लगी ”  इन औरतों  की बदहाली के लिए कुछ अच्छा करने का प्रयास लगातार करती रहती हैं । उन्होंने ही ये महसूस किया कि समाज के लिए ये औरतें कितनी भी उपेक्ष‍ित क्यों ना मान ली गई हों  मगर  इन्हें भी दर‍कार होती है स्वच्छ वातावरण की , अच्छे स्वास्थ्य की , अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की। इन्हीं गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयास के बाद  ” इन बुरी करार दे दी गई औरतों को पेशेवर यौनकर्मी  कहा जाने लगा  मगर उनके लिए अलग से निर्धारित की गईं बस्तियां अभी भी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बेसिक जरूरतों की खातिर सरकारों के लिए अछूत बनी हुई हैं ।
पश्चिम बंगाल की ऐसी ही एक बस्ती है सोनागाछी और इतनी ही अलग है इसकी
गाथा और इसी गाथा में शामिल हैं स्वयंसेवी संगठन जिनके प्रयासों से आज सोनागाछी , अब अपने लिए बुनियादी जरूरतों के बारे में बहुत कुछ जानना चाहती है और जो अपनी परिस्थि‍तियों को बेहतर बनाने की ओर प्रयासरत है ।
इस काम में पश्चिम बंगाल में 1,30,000 यौनकर्मियों का संगठन दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की कई पहल काबिलेगौर हैं जिनमें तकरीबन दो साल पहले देह व्यापार के लिए हो रही नाबालिगों की मानव तस्करी को रोकने तथा यौनकर्मियों के मूल अधिकारों को सुदृढ़ कर उन्हें सशक्त बनाने के उद्देश्य से कोलकाता में छह दिवसीय यौनकर्मी महोत्सव हुआ था ।  तब इस महोत्सव में 14 राज्यों से यौनकर्म से जुड़े समुदाय के हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। इसी दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) ने इस महोत्सव की मेजबानी करते हुए मोहत्सव की थीम ‘प्रोतिवादे नारी, प्रोतिरोधे नारी’ रखी थी।
कोलकाता के तिकोना पार्क में  चले इस महोत्सव में रोजाना लगभग 3,000 यौनकर्मियों ने हिस्सा लिया था। महोत्सव में फिल्म का प्रदर्शन, रंगमंच और नृत्य इत्यादि के जरिए समुदाय की महिलाओं को सशक्तीकरण के लिए प्रेरित किया गया था । दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की ही शाखा ‘सोनागाछी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान’ के प्रिंसिपल समरजीत जाना बताते हैं कि इस महोत्सव के जरिए ग़लीज धंधे वालियों के इस समुदाय को समाज से मिलने वाले हर तरह के बहिष्कार के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने का हौसला मिला ।
इस आयोजन की सफलता के बाद पिछले दिनों दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) ने एक और काबिलेगौर कदम उठाया जब यौनकर्मियों को इबोला से बचाने के लिए आगाह किया गया था । इबोला वायरस से जहां पूरी दुनिया लड़ने के अनेक तरीके खोज रही थी , वहीं दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी) ने बाकायदा चेतावनी जारी की कि यदि यौनकर्मी इबोला संक्रमित लोगों से संबंध बनाते हैं तो उनकी जान जोखिम में पड़ सकती है । संस्था ने उन्हें अफ्रीकी देशों के नागरिकों से संबंध नहीं बनाने को कहा और बाकायदा उन्हें समझाया कि यह इबोला का वायरस संक्रमित व्यक्ति के पसीने, लार, खांसी एवं शरीर के संपर्क से फैलता है।
उक्त प्रयासों के बाद अभी हाल ही में एक महत्वपूर्ण योजना पर काम किया गया है जिसके अंतर्गत दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) की शोध शाखा  सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के ज़रिये अब यौनकर्मियों को एड्स के संक्रमण से बचाना आसान हो सकेगा।
यौनकर्मियों को एड्स के संक्रमण से बचाने के लिए कोलकाता में एक नयी योजना शुरू की जा रही है। इस योजना की शुरुआत भी एशिया में देह व्यापार के सबसे बड़े बाजार ‘ सोनागाछी’  से होगी। ऐसा होने पर सोनागाछी देश में इस तरह का पहला इलाका होगा जहां परियोजना लागू की जायेगी।
सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के ही एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस परियोजना का नाम ” प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीआरईपी)” है जिस  के तहत एचआईवी से ग्रस्त व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाने वाली असंक्रमित यौन कर्मियों को नियमित तौर पर दवाएं दी जायेंगी।
इस बारे में सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) के प्रधान समरजीत जना कहते हैं कि इन दवाओं से यौनकर्मियों को एचआईवी विषाणु के संक्रमण से बचने में मदद मिलेगी। इस परियोजना का सारा खर्च  बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन उठायेगी। फिलहाल एसआरटीआई ने परियोजना की पूरी रिपोर्ट केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दी है और अब राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) की मंजूरी का इंतजार किया जा रहा है। अगले कुछ महीनों में नाको से इसके मंजूरी मिलने की संभावना है । एसआरटीआई के विशेषज्ञ कहते हैं  कि कंडोम के इस्तेमाल और हर रोज पीआरईपी दवाएं लेने से एचआईवी संक्रमण से सुरक्षा दोहरी हो जायेगी।
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के राष्ट्रीय कार्यक्रम अधिकारी बीबी रेवाडी के अनुसार चूंकि एड्स फैलने के लिए यौनकर्मी सबसे ज्यादा खतरे वाले समूहों में आते हैं और पीआरईपी के तहत खतरे के कारकों को 60-70 प्रतिशत कम करने की क्षमता है। अत: यदि यह परियोजना अपने लक्ष्य को हासिल करती है तो यौनकर्मियों को बहुत हद तक लाभ पहुंचाया जा सकता है ।
हालांकि अभी तो दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी) से कुछ दिनों पहले ही परियोजना की रिपोर्ट राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) को मिली है और इसका अध्ययन किया जा र‍हा है । पीआरईपी अभी देश में कहीं और नहीं इसलिए इस  परियोजना को मंजूरी मिलने पर इसे सबसे पहले सोनागाछी में ही लागू किया जायेगा। विशेषज्ञों के अनुसार पीआरईपी लागू होने के साथ साथ  कुछ चीजों पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है जैसे विशेषकर यौनकर्मियों समेत समाज में भी इसकी स्वीकार्यता हो । विदेशों में एचआईवी संक्रमण को रोकने में कंडोम के इस्तेमाल के साथ औषधीय उपचार बहुत सफल रहा है.
एड्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष आईएस गिलाडा ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि इससे देश में एड्स के प्रसार को कम करने में मदद मिलेगी।
बहरहाल  संकोचों से भरे हमारे देश के समाज में आज तक एड्स को लेकर पूरा सच न बोला गया और न पूछा गया । जितना भी संकेतों से , विज्ञापनों से,  फिल्मों से समझाया गया है , वह बिल्कुल ही नाकाफी है । आमजन की ये झिझक अभी भी जीवन की सुरक्षा पर भारी पड़ने वाली इस संक्रामक बीमारी के खतरे को दायें बायें ही कर देती रही  है, ऐसे में कम से कम यौनकर्मियों के चुनौतियों भरे जीवन के लिए दरबार महिला समन्वय समिति (डीएम एससी), सोनागाछी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एसआरटीआई) और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के संयुक्त प्रयासों का सफल होना बेहद जरूरी है और दरबार समिति के पिछले अभि‍यानों की सफलता इस ओर से आश्वस्त तो करती ही है ।
अब कदम ब के कदम ही सही दरबार जैसी स्वयंसेवी संस्थाओं के बढ़ते हौसले , ये बताने के लिए काफी हैं कि समाज की तस्वीर  ब्लैक एंड व्हाइट ही नहीं होती बल्कि इसमें वो  ग्रे शेड भी मौजूद है जो अपने लिए , अपनों के लिए मौलिक अधि‍कारों और अच्छे स्वास्थ्य की बात करने लगा है। निश्चित ही सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं का संयुक्त प्रयास सोनागाछी जैसी बस्तियों के लिए वरदान सरीखा होगा।

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