लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्द झा

श्री विक्रमादित्य झा और प्रो. जीवनलाल मिश्र मिथिला के निम्न-मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से थे, अपने अपने परिवारों के पहली पीढ़ी तथा तथा अभी तक के एकमात्र सदस्य, जो परम्परागत पृष्ठभूमि से उभड़कर आधुनिकता के परिवेश में जगह बनाने के अवसर के लाभ ले रहे थे। श्री विक्रमादित्य झा (बैंक के अधिकारी) अपनी भतीजी के विवाह के लिए शर्मा जी (क़ॉलेज के प्रोफेसर) के बेटे के प्रति इच्छुक थे। हम कई एक, जो उभय पक्ष के शुभचिन्तक समझे जाते थे, विक्रमादित्यजी के साथ शर्मा जी के आवास पर गए और उनकी भतीजी के लिए मिश्रजी के बेटे के सम्बन्ध का औपचारिक प्रस्ताव रखा। मिश्रजी ने सहजता के साथ अपनी सहर्ष रजामन्दी जाहिर की। लेन-देन की बात पर मिश्रजी ने बड़ी उदारता और सहजता से कहा कि मेरी कोई भी माँग नहीं है। हम सबके लिए स्वस्तिकर स्थिति बन गई। विक्रमादित्य जी ने तुरत ठण्डा पेय लाकर इस प्रगति को औपचारिक मोहर लगाई। इस तरह विवाह- प्रसंग की शुरुआत हुई।

कुछ दिन बीते। विक्रमादित्य झा अपने एक सहकर्मी के साथ मिश्रजी के आवास पर आए और मिश्रजी से विवाह समारोह के आयोजन के खाका तय करने की बात होने लगी। मिश्रजी ने अपनी उदारता जारी रखते हुए कहा, “मुझे तो कुछ भी नहीं चाहिए; बस विवाह के मद में मैं व्यय करने में असमर्थ हूँ, तीन बेटियों की शादियों में तो खर्च किया ही, अब बेटे की शादी में भी मैं ही खर्च करूँ !” विक्रमादित्यजी ने कहा, —–‘’एकदम वाजिब बात है।‘’

मिश्रजी ने बात आगे बढ़ाई, —“लड़के की माँ का कहना है कि अपनी तीन बेटियों को हमने दस दस तोले सोने के जेवर दिए हैं, तो हमारी बहु को उतने के जेवर तो होने ही चाहिए।‘’

विक्रमादित्य जी ने कहा ——‘’उनकी बात वाजिब है।‘’

फिर अन्त में मिश्रजी ने कहा कि इसके अलावे लड़का ठाने हुए है कि विवाह में उसे एक मोटरसायकिल अवश्य चाहिए। श्री विक्रमादित्य जी ने कहा कि यह भी ठीक ही है, लड़के की भी तो कुछ साध होती है। फिर सामान्य चाय-पान के बाद पुनः मिलने की बात पर सभा विसर्जित हुई।

यह बातें हमें कुछ दिनों के बाद मालूम हुई, जब मिश्रजी ने शिकायत करते हुए कहा कि वे परेशान हैं, विक्रमादित्य जी ने फिर सम्पर्क ही नहीं किया। हमसे मिश्रजी की अपेक्षा थी कि चूँकि कथा का सूत्रपात करने में हमारा योगदान था, इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम विक्रमादित्य जी से सम्पर्क करें और उन्हें प्रेरित करें कि वे बात आगे बढ़ावें। विक्रमादित्य जी से भेंट होने पर उन्हौंने व्यस्तता का हवाला दिया। फिर कुछ दिन और भी बीत गए।

मिश्रजी की बेचैनी बढ़ रही थी। विक्रमादित्य जी से हमने तगादा किया; विक्रमादित्य बाबू ने अब कहा,——-‘’मिश्रजी की माँग कुल जितने की होती है उसमें कोई औचित्य आपको दिखता है ?’’ उनका लड़का बी.ए. में पढ़ता है. इस क्लास के वर की कीमत दस हजार रुपए होती है अगर कोई पैतृक सम्पत्ति न हो। मिश्रजी को दस बीघा खेत है. उनके इस लड़के के हिस्से में ढाई बीघा आएगा। ढाई बीघा खेतवाला अनपढ़ वर दस हजार में मिलेगा। मिश्रजी प्रोफेसर हैं, यद्यपि संस्कृत के, तो भी चलो, प्रोफेसर के बेटे के कारण दस हजार और होगा। अर्थात् कुल तीस हजार। जबकि उनकी कल माँग पचास हजार से भी अधिक की होती है। बाजार में जिसका जो दाम हो उतना ही दिया जाएगा न. मैं परवल खरीदूँगा तो परवल की कीमत दूँगा, सहजन खरीदूँगा तो सहजन की ; सहजन खरीदूँ तो परवल की कीमत क्यों दूँ ?आप ही बताइए, मैं गलत कहता हूँ क्या ? आप को भी तो बेटी की शादी करनी होगी, आप कितना देंगे और क्या आप ऐसा लड़का दामाद करेंगे?’’ हमारे लिए एक अभिनव अनुभव था यह तर्क।

हमने उनसे कहा कि आप मिश्रजी से बात कर लीजिए। पर उनकी मुलाकात नहीं होती । मिश्रजी भी बेचैन। जनता को नैतिक कर्तव्य याद दिलाते कि जो लोग कथा के सूत्रपात में सक्रिय थे, उन्हें गतिरोध दूर करना चाहिए ; उनकी भर्त्सना करते। जब मैंने मिश्रजी से कहा कि चूँकि सम्बन्ध उन्हें निबाहना है, इसलिए उन्हें सम्बन्ध करने या न करने के बारे में स्वयम् स्वतन्त्र रुप से निर्णय लेना चाहिए, तो वे प्रसन्न नहीं हुए। उनका मानना था कि जनता का नैतिक दायित्व है कि इस सम्बन्ध को परिणति तक पँहुचाए, क्येंकि जनता ने सूत्रपात करने में सक्रिय योगदान किया था। जनता की निरपेक्षता अनैतिक लग रही थी उन्हें। पर विक्रमादित्य जी भी अपनी जगह पर स्थिर, अडिग। मजे की बात थी कि कोई भी पक्ष सम्बन्ध भंग करने की बात नहीं करता। हममें से ही कुछ को लगने लगा था कि मिश्रजी यह सम्बन्ध नहीं करेंगे, विशेषकर परवल और सहजन की उपमा की खबर मिश्रजी को हो जाने की बात हमें मालूम हुई। गुत्थी बहुत बाद में सुलझी जब मिश्रजी ने खुलासा किया। वैवाहिक सम्बन्ध का औपचारिक प्रस्ताव मिलने के काफी पहले से विक्रमादित्य जी से परिचय और मेलजोल था। विक्रमादित्यजी जब भी मिलते, आग्रहपूर्वक खातिर करते, कुछ न कुछ खिलाते-पिलाते। कई एक बार मिश्रजी को अपने घर पर निमन्त्रण दे चुके थे। मिश्रजी की धारणा थी कि जो व्यक्ति परायों पर इतना खर्च करता है, वह कुटुम्ब के लिए कृपण हो नहीं सकता। फिर उनको अपने कौशल पर विश्वास और भरोसा धा कि आनुषंगिक तौर पर वे प्राप्ति करते रह पाएँगे।

फिर सबों को चौंकाते हुए विवाह के निमन्त्रण-पत्र हस्तगत हुए। कौतूहल से भरे हुए थे हम सब। यज्ञ सम्पन्न पर वे लोग लौटे तब वृतान्त मालूम हुआ। हुआ यह था कि ग्रीष्मावकाश के लिए कॉलेज बन्द होने के दो दिन पहले झा जी ने मिश्रजी से भेंट की तथा अपने साथ अपने आवास पर ले गए अपनी भतीजी से प्रणाम करवाया तथा प्रेम से भोजन कराया। उन्हौंने तय किया कि लड़की के पिता से भेंट करके बात को अन्तिम रुप से तय कर लिया जाए। उल्लेखनीय है कि वे दोनों ही दरभंगा के बासिन्दे थे, वे दरभंगा आए, यहाँ पर लड़की के पिता की उपस्थिति में सारी बातें सचमुच तय हो गई। विक्रमादित्य जी ने प्रस्ताव दिया कि अभी सुरेश विद्यार्थी हैं, बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करें, मोटर सायकिल उन्हें अवश्य दिया जाएगा। अभी मोटरसायकिल लेने से पढ़ाई में बाधा होगी, फिर पेट्रोल का खर्च के बारे भी तो सोचना चाहिए। जेवर के विकल्प में तय हुआ कि लड़के-लड़की के संयुक्त खाते में पच्चीस हजार रुपए फिक्स्ड डिपोजिट कर दिए जाएँगे, जब तक पढ़ाई पूरी होगी, रकम पचास हजार की हो जाएगी। विवाह के व्यय के मद में मिश्रजी को दस हजार रुपए दे दिए गए। यज्ञ आयोजित हुआ, सम्पन्न भी हो गया। मिश्रजी बैंक का फॉर्म ले गए थे कि जमा की जानेवाली रकम ले लें। पर विक्रमादित्य बाबू ने एक तकनीकी दिक्कत बताई. संयुक्त खाते का खुलना विवाह सम्पन्न होने के पहले तो हो नहीं सकता था; इसलिए इसे स्थगित करना मानना पड़ा।

अब प्रहसन का दूसरा अंक प्रारम्भ हुआ। बैंक के खाता खोलने के लिए मिश्रजी जितने ही आतुर हो रहे थे, विक्रमादित्य जी उतने ही निश्चिन्त। मिश्रजी ने जनता को उसकार् कत्तव्य याद दिलाने का अभियान छेड़ा हुआ था; विक्रमादित्य जी का कहना था कि विवाह हो गया, अब ये सारी बातें अप्रासंगिक हैं।’ विवाह जैसे आयाजन में झूठ-फूस तो बोलना ही पड़ता है। अगर सारी बातें मान ही ली जानी हों तो फिर और घर की और लड़कियों की शादियाँ कैसे हों।’ कुछ उसी अन्दाज में जैसे आधुनिक लोग कहते हैं, —–Everything is fair in love and war.

अन्ततोगत्वा विक्रमादित्य जी जनता को आश्वस्त करते हुए रुपए जमा करने को सहमत हुए। पर एक दिक्कत पेश आई। उन्हौंने कहा कि मिश्रजी चार हजार रुपए दें तो पचीस हजार की रकम जमा होगी। अपनी बात की व्याख्या करते हुए उन्हौंने बताया कि विवाह के आयोजन के कुछ दिन पूर्व मिश्रजी ने अपने बेटे को विक्रमादित्य जी के नाम एक पत्र देकर भेजा कि लिस्ट के अनुसार सामग्री खरीदवा दें। मिश्रजी ने आश्वासन दिया था कि कीमत की रकम वे विक्रमादित्य जी को बाद में दे देंगे। वह रकम चार हजार की थी। विक्रमादित्यजी ने वह पत्र सँभाल कर रखा हुआ था, जिसे अब प्रमाण के रुप में पेश किया जा रहा था। मिश्रजी को आपत्ति थी। दो पृथक् बातों को मिलाया जाना अस्वीकार्य था उन्हें। फिक्स्ड डिपोजिट में पचीस हजार जमा कर दिए जाएँ, और फिर शर्मा जी चार हजार रुपए देंगे। जनता को अंश-दान करने का सुनहरा अवसर अभी भी था। आखिर काफी जिद्दो-जेहद के बाद इस प्रकरण की शुभ समाप्ति हुई। मिश्रजी ने चार हजार और विक्रमादित्य जी ने इक्कीस हजार रुपए एक साथ मिलाए और वर-बधू का संयुक्त खाता खुल गया।

किन्तु कहानी अभी खत्म नहीं हुई। अब विक्रमादित्यजी का आग्रह लड़की की विदाई के लिए था। पर मिश्रजी का कहना था कि द्विरागमन सम्पन्न हुए बगैर विदाई का सवाल नहीं उठता। विक्रमादित्यजी के अनुसार द्विरागमन की रस्म विवाह के साथ ही सम्पन्न हो चुकी थी जब कि मिश्रजी का कहना था कि सारा पावना बाकी था। करार था कि द्विरागमन के अवसर पर एक पारम्परिक वस्तुओं के साथ एक भैंस दी जाएगी। विक्रमादित्यजी का कहना था कि मिश्रजी के दरवाजे पर एक बकरी तक नहीं है, वे भैंस केसे पाल पाएँगे।

गतिरोध बना रहा; जनता की अदालत में बयानबाजी चलती रही। मिश्रजी धमकी देते कि बेटे का दूसरा विवाह कराएँगे। विक्रमादित्य जी कहते कि लड़का तो हमारे घर आता ही रहता है, दूसरा विवाह कैसे कराएँगे, फिर हम पुलिस में दहेज की माँग का मामला भी कर देंगे। मिश्रजी विदाई नहीं करा कर अपने घर का व्यय-भार कम कर रहे हैं। शादी के बाद बेटी के ऊपर का खर्च बचता है, पर यहाँ तो बेटी के साथ दामाद का और अब नाती का भी बोझ ढोना पड़ रहा है। हमारी तो जग-हँसाई हो गई, गाँव में लोग कहते हैं कि कैसी शादी हुई है कि लड़की मायके में ही पड़ी हुई है, लोगों को तो इसपर भी शक होने लगा है कि हमारे समधी प्रोफेसर हैं। प्रोफेसर कहीं ऐसा करता है ! नेरी भतीजी कहती है, —–‘’काका, जब बूढ़ा असमर्थ हो जाएगा तब तो मैं ही सब सँभालूँगी . तब देख लूँगी।‘’

इसके बाद की कहानी हम आधिकारिक तौर पर नहीं कह सकते, क्योंकि मिश्रजी सेवा-निवृत हो गए और विक्रमादित्य झा जी का तबादला हो गया। निर्भर-योग्य सूत्रों के हवाले से ज्ञात हुआ है कि मिश्रजी की बहू, जो श्री विक्रमादित्य झा की भतीजी है, सासु, ससुर और पति के साथ ‘दूधों नहाओ, पूतों फलो’ वाली गृहस्थी कर रही है।

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1 Comment on "कहानी/क्षुद्रता की प्रतियोगिया"

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samriddhi
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बहुत ही बढ़िया लेख. पढ़ कर ऐसा लगा जैसे ये तो बहुतों की कहानी है.सचचाई है इस
कहानी में

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