लेखक परिचय

रामानुज मिश्र

रामानुज मिश्र

जन्म : 01.08.1950 शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिंदी) काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी उपसंपादक : घाटी का दर्द, साप्ताहिक राबटर्सगंज, सोनभद्र लेखन : कहानी, कविता मो. : 08400437691 ई-मेल : ramanujmishra10@gmail.com स्थान : ग्राम मझुई, पोस्ट मधुपुर, जिला सोनभद्र-231216(उ.प्र.), : रानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय मधुपुर, सोनभद्र-231216(उ.प्र.) प्रकाशित कृति : मुट्ठीभर ज़िंदगी (कहानी संग्रह) प्रकाशक : गुंजन प्रकाशन, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

Posted On by &filed under कविता, महिला-जगत.


 

टांग दी जाती हैं

ज़िन्दगियाँ

खूटियों पर

जो गड़ी हैं

भीतर तक

भीत पर।

मुँह अंधेरे ही

निकाल ली जाती हैं

इनके भीतर की मशीनें

और लगा दी जाती हैं

बर्तन मांजने, झाड़ू पोछा

घर आँगन, सहन

लीपने-पोतने में।

मशीनें न आवाज करती हैं

न हँसती हैं

न ही मुस्कराती हैं

चलता रहता है सिलसिला

अन्दर भी, बाहर भी।

इन पर अधिकृत होता है

घर-परिवार की मर्यादा का

भीष्म-प्रतिज्ञा-पेटेन्ट।

खारे समुन्दर सी

अतल गहराइयों वाले दिनों में

घिसते रहते हैं

इनके पुर्जे।

ज्योंहि दिन

बन्द होने को होता है

गूंगी, बहरी, अंधी मशीन

लौट आती है

खेत-खलिहान से।

कायम होता है

रूटीन

रोटियाँ पाथने सेंकने

फुलाने का।

बगल में

चलते हैं संस्कारों के प्रवचन,

उपदेशों के भजन।

रात का

अनिवार्य सन्नाटा

जब लौटता है

दरबे में

मशीनें ठमक जाती हैं

और टुकुर-टुकुर

ताकती हैं

खूँटियों को

जहाँ

जिन्दगी दुबक कर

सांस लेती है।

कभी-कभी

इन्हें उतार लिया जाता है

खूँटियों से।

जब किसी को

गर्म होने

आकार-प्रकार मथने

और भूगोल को

हाथों से मसलने की

जरूरत होती है

जिन्दा हवा के

एक-एक रेशे को

पराजित करने की

तमन्ना होती है।

तब खूँटी से उतर

यदा-कदा

रच लेती हैं

खामोश मातृत्व के

शाश्वत सपने।

और जब

इनका सृजन

पुरुष को पुरुष

दे देता है

फिर इन्हें

टाँग दिया जाता है

खूँटियों पर।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz