लेखक परिचय

केशव आचार्य

केशव आचार्य

मंडला(म.प्र.) में जन्‍म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से प्रसारण पत्रकारिता में एमए तथा मीडिया बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल कीं। वर्तमान में भोपाल से एयर हो रहे म.प्र.-छ.ग. के प्रादेशिक चैनल में कार्यरत।

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भारत में टीवी की शुरूआत शिक्षा के प्रसार के साथ ही हुई। बदलते समय के साथ ही इसने शिक्षा के साथ-साथ सामाचार, मंनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान, हेल्थ और लाइफ स्टाइल तक के पहलुओं को अपने में समेट लिया। बुद्धु बक्से के बदलते इस परिवेश पर पेश है एक ख़ास रिपोर्ट..

21 वीं सदी की शुरूआत में बुद्धु बक्से के नाम से प्रचारित होते आये टेलीविज़न ने इस दशक की शुरूआत में भारतीयों पर अमिट छाप छोड़ी है। 21 वी सदी के पहले दशक में एक तरफ जहां जनमानस पर धारावाहिकों ने अमिट छाप छोड़ी तो दूसरी तरफ रिएलिटी शोज़ ने आम आदमी को सपने में जीने को मज़बूर कर दिया। एक तरफ बच्चों को 24 घंटों का कार्टून धमाल मिला तो दूसरी तरफ बुज़ुर्गों के एकाकीपन में आध्यात्मिक चैनल उनके साथी बन बैठे। वर्ष 2000 टीवी इतिहास के लिए एक नया मोड़ लेकर आया इस टीवी पर लोगों के सपनों को एक नया आयाम मिला। कौन बनेगा करोड़ पति के नाम से आये धारावाहिक ने लोगों के ज़नून को सबके सामने लाकर रख दिया। इस साल बड़े पर्दे के शहंशाह यानि अमिताभ बच्चन ने छोड़े पर्दे की ओर रूख़ किया और KBC ने सफलता के नये आयाम रच ड़ाले। स्टार प्लस पर आने वाले इस कार्यक्रम ने चैनल को टीआरपी की लाइन में अन्य चैनलों से सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। और इस दौर में टेलीविज़न पर छिड़ गई क्विज़ शो की एक जंग। क्विज़ शो के इस रेस एक बार फिर अपना ट्रेक चेंज़ किया 2001 में इस साल के शुरूआत में ही अभिताभ बच्चन की देखादेखी अन्य फिल्मी सितारों ने भी छोटे पर्दे की ओर रूख किया। गोविंदा ने एक तरफ जीता छप्पड़ फाड़ की एकरिंग का ज़िम्मा संभाला तो दूसरी तरफ एकता कपूर ने टीवी पर सास-बहु का इमोशनली ट्रेंड़ शुरू किया। एकता कपूर के धारावाधिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहु थी, ‘कहानी घर घर की’ और ‘कसौटी जिंदगी’ ने कुछ ही समय में लोगों के दिलों पर कब्ज़ा कर लिया। पार्वती औऱ तुलसी के किरदारों में स्मृति ईरानी भारतीय परिवारों में स्त्रियों के लिए के लिए आर्दश बन गये। इन धारावाहिकों से स्मृति ईरानी और साक्षी तंवर की शोहरत आसमान छूने लगी। इन धारावाहिकों में भारतीय परंपराओं के सम्मोहन, रिश्तों की मिठास से लेकर फैशन के टिप्स देने वाले परिधान और घरों का इंटीरियर तक सबकुछ था। 2001 से एकता कपूर का जलवा बरकार रहा। इस दौरान एक तरफ एकता के शोज़ का जलवा कायम था। तो दूसरी तरफ 2002 के शुरूआत के साथ ही युवाओं के लिए भी कई कार्यक्रम बनने लगे। संजीवनी, पारिवारिक शो कुमकुम काफ़ी सफ़ल रहे।. तो बच्चों के लिए बूम बूम जैसे कार्यक्रम ने भी सफलता ने भी सफलता का स्वाद चखा। जय माता दी से हेमामालनी ने…..तो मेट्रोमोनी शो ‘कहीं ना कहीं कोई है’ से धक धक गर्ल माधुरी दीक्षित ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। स्लीवलेस ब्लाउज के साथ ही ड़िजायनर साड़ियों का एक नया दौर मंदिरा बेदी ने छोटे पर्दे पर उतार दिया। ट्रांसपेरेट साड़ियां पहने जब मंदिरा सेट मेक्स पर एक्सट्रा इनिंग में खिलाड़ियों के साथ डिक्सन करती नज़र आई। तो जो लोग क्रिकेट नहीं देखते थे वे भी इस बुद्धु बक्से के आगे क्रिकेट पर चर्चा करते नज़र आने लगे। तो इसी साल गोल चश्मा लगाये सोनी पर जस्सी ने लोगों के घरों पर कब्जा कर लिया। इस धारावाहिक को जब़रदस्त सफलता मिली। जस्सी जैसी कोई नहीं को मिली ज़बरदस्त सफलता ने स्टार पर दिल से भोली लेकिन कम आर्कषक दिखने वाली लड़की की कहानी देखो मगर प्यार से शुरू किया। 2004 के दौरान टीवी पर इन कार्यक्रमों का जोर चलता रहा और 2005 में टीवी इतिहास में एक नया मोड़ आया और छोटे पर्दें पर शुरू हुआ रियलिटी शो का एक नया दौर। केबीसी की जब़रदस्त सफलता के बाद स्टार प्लस ने केबीसी 2 की शुरूआत की और दर्शकों का ज़बरदस्त रिस्पोंस पाया। हालांकि क्विज़ औऱ म्यूज़िकल शो शुरू से ही लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल कर रहे थे। इसी बीच कुछ नया दिखाने और दर्शकों को अपनी तरफ खींचने के लिए स्टार वन पर एक नये तरह का शो ‘द ग्रेट इंड़ियन लाफ्टर शो’ आया सीरियस टाइप के शोज़ से ऊब रहे इस शो दर्शकों को हंसने का एक नया कारण दिया। 2007 तक के आते-आते टीवी पर रियलिटी शो की भरमार तमाम चैनलों पर थी।..म्यूज़िकल शोज़ के चलते छोटे शहरों से प्रतिभाओं को अपनी पहचान बनाने की मौका मिला। तो इन शोज़ लोगों ने अपनी सेलिब्रिटीस को लड़ते झगड़ते भी देखा। कुल मिलाकर यह साल ऱियलिटी शो के निर्णायकों के झगडे का गबाह बनकर रह गया। एक तरफ क्योकि…से शिखर पर पहुंचने वाली तुसली कहीं गायब हो गई तो दूसरी तरफ एक बार बड़े पर्दे के चेहरों ने छोटे पर्दे पर दस्तक देनी शुरू कर दी। शाखरूख खान ने केबीसी3 के साथ छोटे पर्दे पर अपनी शुरूआत की। 2007 से 2009 के बीच इस बुद्धु बक्से के लिए कई बड़े मोड़ आये। टीवी पर गांव की पृष्ठ भूमि को लेकर एक नया युद्ध छिड़ा हुआ है। तमाम चैनल एक फिर गांव की तरफ लौट रहे है। इसी का परिणाम है कि लगभग सारे चैनल पर इस तरह के सीरियलों की बाढ़ आई हुई है।.

-केशव आचार्य

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