लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिन्दुस्थानी
विज्ञान के क्षेत्र में भारत के नाम एक और उपलब्धि शामिल हो गई है। पीएसएलवी सी-35 नामक विशेष सैटेलाइट से महत्वपूर्ण उपग्रह सौरमंडल की कक्षा में भेजकर भारत ने जो सफलता हासिल की है, उसका भारत देश पहले से ही हकदार रहा है। लेकिन पहले हमारे देश के महानतम वैज्ञानिकों को सरकारों ने कभी इस योग्य नहीं समझा। हमारा विज्ञान जगत तो प्रतिभा दिखाना चाहता था, लेकिन हम हमेशा विदेशी शक्तियों के माध्यम से ही अपने आपको आगे ले जाने का कार्य करते रहे हैं। हमारे वैज्ञानिकों ने श्रीहरिकोटा से जो उपग्रह भेजा है, वह विश्व के कई देशों के लिए एक सपना ही हो सकता है। इसमें महानतम उपलब्धि यह है कि भारत के इस स्कैटसेट वन में अमेरिका और कनाडा जैसे देशों के भी उपग्रह शामिल हैं।
भारत ने विदेशी उपग्रह भेजने में जो कामयाबी हासिल की है, उससे भारत का मस्तक विश्व जगत में फिर से ऊंचा हुआ है। इससे भारत ने विज्ञान जगत में एक नया अध्याय स्थापित किया है। इसके साथ ही जिन देशों ने भारत की विज्ञान शक्ति के सहारे यह उपलब्धि हासिल की है, वहां भी भारत की इस उपलब्धि पर वैज्ञानिकों द्वारा विजय उत्सव मनाया जा रहा है।
भारत का यह अंतरिक्ष में छलांग लगाने वाला अभियान निसंदेह वैश्विक दृष्टि से महानतम उपलब्धि तो है ही, इसके लिए भारत के वैज्ञानिक एक दूसरे को बधाई भी दे रहे हैं। लेकिन इसके अलावा यह इस मायने में भी अति महत्वपूर्ण है कि भारत की इस उपलब्धि पर विश्व के कई देशों से बधाइयाँ मिल रहीं हैं। यह अपने देश के नागरिकों के लिए गौरव की बात है। पीएसएलवी सी-35 ने चेन्नई से लगभग 110 किलोमीटर दूर स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह नौ बजकर 12 मिनट पर उड़ान भरी। यह पहली बार है, जब भारत का इस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष की दो कक्षाओं में एक साथ कई उपग्रह स्थापित किए हैं। पीएसएलवी सी-35 स्कैटसैट-1 एक के माध्यम से भारत ने महानतम उपलब्धि भी हासिल की है कि वह मौसमी घटनाओं के बारे में सटीक भविष्य वाणी कर सकता है। इसके साथ देश के साथ विदेश में घटित होने वाली घटनाओं की भी भविष्यवाणी कर सकने का सामथ्र्य भी भारत ने प्राप्त कर लिया है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में ओशनसैट-2 उपग्रह द्वारा ले जाए गए एक ऐसे ही पेलोड की क्षमताएं पहले से बढ़ा दी हैं। स्कैटसैट-1 के साथ जिन दो अकादमिक उपग्रहों को ले गया है, उनमें आईआईटी मुंबई का प्रथम और बेंगलूरू बीईएस विश्वविद्यालय एवं उसके संघ का पीआई सैट शामिल हैं। प्रथम का उद्देश्य कुल इलेक्ट्रॉन संख्या का आकलन करना है जबकि पीआई सैट अभियान रिमोट सेंसिंग अनुप्रयोगों के लिए नैनोसेटेलाइट के डिजाइन एवं विकास के लिए है।
पीएसएलवी अपने साथ जिन विदेशी उपग्रहों को ले गया है, उनमें अल्जीरिया के- अलसैट-1बी, अलसैट-2बी और अलसैट-1एन, अमेरिका का पाथफाइंडर-1 और कनाडा का एनएलएस-19 शामिल हैं। इसरो ने कहा कि पीएसएलवी सी-35 के साथ गए सभी आठ उपग्रहों का कुल वजन लगभग 675 किलोग्राम है। स्कैटसैट-1 का वजन &71 किलोग्राम है। अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजना विश्व के कई देशों के लिए आज भी जोखिम भरा काम है। विदेशों से सैटेलाइट लॉँच कर पाना अब भी बहुत आसान नहीं है। सरकारी उपग्रह एजेंसी के रॉकेट से विदेशी व्यवसायिक उपग्रह को भेजने की प्रक्रिया काफी जटिल है। इसमें नियम, समझौते और कानून जैसी कई अड़चनें हैं। इसके अलावा वैज्ञानिकों को अब दूसरे देश की स्पेस एजेंसियों से ही नहीं, बल्कि स्पेस एक्स जैसी निजी कंपनियों से भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। भारत अभी तक केवल छोटे और हल्के विदेशी सैटेलाइट ही लॉँच कर रहा है। पीएसएलवी की मदद से भारत ने अभी तक लगातार 5 सफल लॉँच पूरे किए हैं।
भारत के इस अंतरिक्षीय सफल अभियान के बाद विश्व के वैज्ञानिक जगत को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। इसमें एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे भारी सैटेलाइट लॉँच करने से होने वाली कमाई भी बहुत बड़ी होती है। इसलिए सैटेलाइट क्षेत्र में काम करने वाली कई कंपनियों ने भारत के इस अभियान के बाद अपने तरीके से छूट देने का प्रावधान करने के लिए तैयारियां शुरु कर दी हैं। कई कंपनियों ने अपनी दरों में कटौती इसलिए की है ताकि उन्हें ज्यादा व्यापार मिल सके। इस सैटेलाइट के लांच किए जाने से भारत ने ऐसे कई देशों को बहुत पीछे छोड़ दिया है, जो इसके लिए अभियान चलाने का केवल विचार कर रहे थे। आगे चलकर अब होगा यह कि कई सैटेलाइट कंपनियों और इसको स्थापित करने वाले देशों ने अभी से भारत से संपर्क स्थापित करना शुरु कर दिया  है ऐसे में  भारत इससे अरबों डॉलर की कमाई कर सकता है।
स्कैटसेट 1 की विशेषताएं
– पीएसएलवी सी-35 की यह 37वीं और एक्सएल मोड में यह 15वीं उड़ान है।
– इसरो का ये पहला मिशन है, जिसमें सैटेलाइट्स को दो अलग-अलग कक्षाओं (ऑर्बिट) में स्थापित किया है।
– यह मौसम और समुद्र के अंदर होने वाली हर हलचल यानी साइक्लोन और तूफान पर नजर रखेगा और अहम जानकारी भेजेगा।
– इसकी लागत 120 करोड़ रुपए आई है। भारत इस सैटेलाइट का वजन 377 किलोग्राम है।
– मुंबई आईआईटी के छात्रों द्वारा बनाया गया ‘प्रथम और बेंगलुरु यूनिवर्सिटी का सैटेलाइट ‘पिसाट भी अंतरिक्ष कक्षा में स्थापित किया है।
– ‘प्रथम का वजन 10 किग्रा और बेंगलुरु यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स का बनाया ‘पिसाट 5.25 किग्रा है।

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