लेखक परिचय

धीरेन्‍द्र प्रताप सिंह

धीरेन्‍द्र प्रताप सिंह

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के बक्शा थाना क्षेत्रान्तर्गत भुतहां गांव का निवासी। जौनपुर के तिलकधारी महाविद्यालय से वर्ष 2005 में राजनीति शास्त्र से स्नात्कोत्तर तत्पश्चात जौनपुर में ही स्थित वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में भी स्नात्कोत्तर की उपाधियां प्राप्‍त की। पत्रकारिता से स्नात्कोत्तर करने के दौरान वाराणसी के लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र आज से जुड़े रहे। उसके बाद छह महीने तक लखनऊ में रहकर दैनिक स्वतंत्र भारत के लिए काम किया। उसके बाद देश की पहली हिन्दी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े। उसमें लगभग दो वर्षों तक मैं चीफ रिपोर्टर रहे। उसके बाद तकरीबन ग्यारह महीने दिल्ली-एनसीआर के चैनल टोटल टीवी में रन डाउन प्रोडयूसर रहे। संप्रति हिन्दुस्थान समाचार में उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख के तौर पर कार्य। पत्रपत्रिकाओं और वेब मीडिया पर समसामयिक लेखन भी करते रहते हैं।

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भारत में सूचना क्रांति के साथ आये राइट टू इनफॉर्मेशन आरटीआई यानि सूचना अधिकार अधिनियम 2005 को लागू हुए आगामी 12 अक्टूबर 2010 को पूरे पांच साल हो जाएगें। इन पांच सालों में इस कानून ने क्या उपलब्धियां हासिल की, इसके सामने क्या समस्याएं आई और इसका भविष्य के भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इन्हीं सब बिंदुओं पर 1971 बैच के आईएएस और देश के प्रसिद्ध सूचनाविद् व वर्तमान में उत्तराखंड के मुख्य सूचना आयुक्त का दायित्व संभाल रहे श्री आरएस टोलिया से इस कानून के विभिन्न पहलुओं पर धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश-

सूचनाधिकार अधिनियम 2005 को आप किस तरह देखते है।

देखिए उत्तराखंड में कुल 272 के लगभग अधिनियम है जिसमें मैं सूचनाधिकार अधिनियम को सबसे महत्वपूर्ण मानता हूं। ये अधिनियम एक मात्र ऐसा अधिनियम है जो नागरिकों को सिर्फ अधिकार देता है और बदले में कोई कर्तब्य नहीं आरोपित करता है। इसके माध्यम से नागरिक अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। सैकड़ों सालों के प्रशासनिक विकास के क्रम में देखा जाए तो यह अधिकार आम नागरिक के लिए बरदान सरीखा है। इस अधिनियम में सौ फीसदी व्यवहारिकता है। जैसे हमारे न्यायालय कहते है शासन प्रशासन में पारदर्षिता होनी चाहिए लेकिन व्यवहार में देखे तो न्यायालय के कार्यो में खुद कोई पारदर्षिता नहीं दिखाई देती। लेकिन इस अधिनियम के लागू के होने के बाद न्यायालय को भी अपनी पारदर्षिता का पालन करना पड़ेगा।

इसके साथ ही इसका दूसरा व्यवहारिक पहलू देखे तो हमारे यहां समय के पालन में बड़ी लापरवाही दिखती है। यानि किसी काम के होने की कोई समय सीमा नहीं दिखाई पड़ती लेकिन ये कानून समय सीमा का कड़ाई से पालन करवाता है। ये कानून कहता है कि किसी नागरिक ने अगर कोई सूचना मांगी तो उसे अधिकतम 30 दिन में सूचना देनी ही होगी अन्यथा संबंधित के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होगी। इस अधिनियम में एक शब्द है यथाशील यानि सूचना मांगने वाले को ष्षीघ्र सूचना दी जाए लेकिन ये ष्षीघ्रता 30 दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए।

उत्तराखंड के संदर्भ में इस कानून की बात करे तो उसमें कोई उल्लेखनीय प्रगति के बारे में बताएं।

सही प्रश्‍न पूछा आपने। उत्तराखंड में इस कानून के लागू होने से प्रशासन के कार्यो में रेकॉर्ड रखने की आदत बनी। हमारे यहां के 58 विभागों ने 17 खंडों में अपने विभागीय मैनुवल तैयार किए है आने वाले भविष्य में ये कार्य प्रशासन की पारदर्शिता के लिए वरदान साबित होंगे।

इस कानून का जिस तरह से बेतहाशा लोगों ने प्रयोग शुरू किया है उससे इसके दुरूपयोग होने की बाते भी सामने आ रही है। इस बारे में आप का क्या मत है।

देखिए जैसे हर आदमी अच्छा नहीं होता तो वैसे ही हर आदमी बुरा भी नहीं होता। इसलिए इसके दुरूपयोग के डर से इसके क्रियान्वयन न होने का कोई तर्क नहीं है। हमारे सेबी के मुखिया श्री भावे कहते है कि इसका दुरूपयोग हो सकता है। लेकिन इसके लाभ को देखते हुए उस दुरूपयोग के खतरे को उठाया जा सकता है। दूसरा इस अधिनियम ने भारत की एक बहुत ही पुरानी परंपरा यानि प्रश्‍न पूछने की परंपरा को फिर से जीवित कर दिया है। प्राचीन काल में भारतीय लोगों में प्रश्‍न पूछने की समृद्धशाली परंपरा रही है। नचिकेता जैसा एक सामान्य बालक यमराज से प्रष्न पूछकर उसे अनुत्तरित और आष्चर्यचकित कर देता है तो इस कानून ने ज्ञान के स्त्रोत को मजबूत किया है।

विश्‍व में सूचना कानून की स्थिति को लेकर आप क्या सोचते है।

देखिए विश्‍व के परिप्रेक्ष्य में देखे तो यूरोप के समृद्ध देषों को छोड़ दे तो राष्ट्र मंडल देषों में इस कानून को लेकर अभी कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं हुआ है। पिछले दिनों दिल्ली में राष्ट्रमंडल देशों की सूचना कानून पर एक संगोष्ठी हुई जिसमें सभी देशों ने भारत में सूचना को लेकर किए गए कार्यों को न केवल सराहा बल्कि आष्चर्य भी व्यक्त किया कि यहां सूचना के लिए कितना कुछ किया जा चुका है। नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका अफगानिस्तान आदि देशों ने इस कानून को जितना भारत में लागू किया जा चुका है उतना ही अपने यहां लागू होने में कई सालों की जरूरत बताई।

सूचना अधिनियम के तहत कौन कौन सी सूचनाएं मांगी जा सकती है।

ये अधिनियम अपने आप में ही बहुत काम का है। इसके तहत कोई भी सूचना मांगी जा सकती है और संबंधित विभाग को सूचना देने की बाध्यता होगी। कुछ सूचनाएं ऐसी भी है जिन्हें देशहित में देने से मना भी किया जा सकता है। लेकिन ये सूचनाएं 10 श्रेणीयों के तहत सूचीबद्ध है। इसके तहत 3 पूर्णत: निषिद्ध है तो अधिनियम की धारा 8 के तहत 7 श्रेणीयों को सशर्त छूट प्रदान की जाती है। तीन जो पूर्णत: निशद्ध है उनमें राष्ट्र सुरक्षा, सौर्वभौमिकता और राष्ट्र हित से संबंधित सूचनाएं है जो इन बातों को देखते हुए आम नागरिक को देने से मना की जा सकती हैं। इसके साथ ही जिनमें छूट दी जाती है उनमें भी अगर कोई ऐसी सूचना है जिसके देने से समाज का हित हो रहा है जबकि न देने से कुछ लोगों का हित हो रहा है तो ऐसी परिस्थितियों में समाजहित को सर्वोपरि रखते हुए सूचनाएं दी जाती है। कहने का मतलब जो छूट दी जाती है वह सशर्त होती है।

समय से सूचना न देने की मानसिकता को रोकने के लिए आयोग क्या करता है।

सूचना समय से न देने और सही सूचना देने में आनाकानी करने वाले पक्ष को आर्थिक दंड से दंडित करने का अधिकार आयोग को है। आर्थिक दंड से प्राप्त राषि राजकोश में जमाकर दी जाती है। इसके साथ ही सूचना मांगने वाले को यदि सूचना मिलने में हुई देरी के चलते कोई आर्थिक हानि होती है तो उसकी भी क्षतिपूर्ति की व्यवस्था आयोग द्वारा की जाती है।

अगले पांच सालों में उत्तराखंड में सूचना अधिकार का भविष्य क्या होगा।

देखिए अभी तक प्रदेश में सूचनाधिकार को लेकर जो प्रगति हुई है उसके आधार पर हम कह सकते है आगामी पांच साल में उत्तराखंड इस कानून के क्रियान्वयन में देश में आदर्ष स्थापित करेगा। आयोग ने भी इसके प्रचार प्रसार के लिए पूरी कोषिश की है। इसके तहत साहित्य प्रकाशन और अन्य प्रचार के तौर तरीके अपनाए जा रहे है। इसके साथ ही आयोग ने इस कानून को दुर्गम क्षेत्रों और गांवों तक पहुंचाने के लिए मोबाइल वीडियो वैन की व्यवस्था की है जिसके माध्यम से हम गांवों तक इसको पहुंचा रहे है। इसके तहत मोबाइल वैन में ही शिकायत दर्ज करवा सकते है। इस तरह की व्यवस्था करने वाला उत्तराखंड सूचना आयोग देश का शायद पहला आयोग है। हालांकि हम लोग इतने से ही संतुष्ट नहीं है बल्कि इस दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति के लिए निरन्तर प्रयास चल रहे है।

क्या किसी विशेष समय में सूचनाओं की मांग बढ जाती है।

जी हां जब चुनाव का समय आता है तो एकाएक सूचनाओं को मांगने की संख्या बढ़ जाती है। लेकिन आयोग तब भी पूरी कोशिश करता है कि मांगी गई सूचनाएं समय से लोगों को मिल सके। अभी तक का जो रेकॉर्ड हमारे पास है उसके अनुसार 7 अगस्त 2010 तक 93970 आवेदन सूचना के पड़ चुके है। इस हिसाब से देखे तो बीस लाख की आबादी पर एक लाख लोग सूचनाधिकारी का प्रयोग कर रहे है तो एक तरह से ये सुखद संकेत और शुभ लक्षण है। ये कानून सामान्य नागरिक की जानकारी बढाने के लिहाज से बहुत ही एंपावरिंग कानून कहा जा सकता है।

आप से कुछ आकड़ों का प्रश्‍न करे तो क्या आप बता सकते हैं कि किस विभाग के संबंध में सूचनाएं सर्वाधिक मांगी जाती है।

देखिए अभी तक हमारे पास जो रेकॉर्ड है उसके अनुसार शिक्षा विभाग से संबंधित सूचनाएं सर्वाधिक मांगी गई है। इसके तहत अभी तक कुल 13341 लोग सूचना मांग चुके हैं। दूसरा नंबर आता है राजस्व विभाग का इस विभाग से संबंधित सूचनाओं के मांगे जाने की संख्या है। 10013। इसी तरह गृह विभाग से संबंधित 9851, सिंचाईं 4838, आवास-4799,लोक निर्माण विभाग-3946 सूचनाएं मांगी गई। इसी तरह से 2005 जब से यह अधिनियम लागू हुआ उसकी प्रगति रिपोर्ट देखे तो वह काफी उत्साहजनक है।

2005-06 में 1385 लोगों ने सूचना अधिकार का प्रयोग किया वहीं 2006-07 में 9691, 2007-08 में 15640, 2008-09 में 27148, 2009-10 में 27311 लोगों ने सूचनाधिकार का प्रयोग किया। इस तरह इस अधिनियम को लेकर लोगों के उत्साह का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसी तरह 31 अगस्त 2010 तक प्रदेष के कुल 58 विभागों के जनसूचनाधिकारीं ने 93977 आवेदन स्वीकार कर चुके हैं। जबकि आवेदन पत्रों से मिली 939770 रूप्ए की राषि राजकोष में जमा की जा चुकी है। उत्तराखंड सूचना आयोग ने वर्ष 2009-10 में 6886 शिकायतें दर्ज की जिसमें से 6501 षिकायतों का निपटारा किया जा चुका है।

सूचना आयोग के कार्यों का सरकारी विभागों को क्या फायदा हुआ है।

देखिए सूचना आयोग की सक्रियता से सभी विभागों में पत्रावलियों के रखरखाव का जहां एक सुव्यवस्थित सिस्टम विकसित हुआ हैं वहीं सभी कार्यालयों में सूचनाधिकार की पट्टिका लगी होने से लोगों में जागरूकता बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप जहां पहले आम जनता थानों में जाने से डरती थी वह इस कानून के बल पर अब वहां धड्ल्ले से जा रही है और पुलिस वाले भी जानते है कि यदि वे दर्ुव्यहार करेंगे तो उन पर भी सूचना आयोग का डंडा पडं सकता है।

अंतिम प्रश्‍न आप यहां से सेवानिवृत्ति के बाद क्या करेंगे। राजनीति में आएंगे या फिर कुछ और करेंगे।

बहुत सही सवाल किया आपने। मैं आपकों बताना चाहता हूं कि मैने लगभग चार दशक जन सेवा में ही बिताए है और अब आगे न तो मैं राजनीति में आ रहा हूं और न ही किसी प्रकार की सर्विस में। सेवानिवृत्ति के बाद मै पिथौरागढ़ की मुनिस्यारी तहसील स्थित अपने गांव टोला लौट जाउंगा और वहां गांव वालों की सेवा करूंगा और साथ अपने पढ़ने लिखने का शौक भी पूरा करूंगा।

आम जनता को कोई संदेश देना चाहेंगे।

मैं आम लोगों से अपील करता हूं कि वे लोग सूचना के अधिकार के बारे में अधिक से अधिक जाने और उसका अधिक से अधिक प्रयोग करे। इससे समाज में जागरूकता बढ़ेगी और जो सूचनाधिकार कानून और सूचना आयोग के गठन का जो उद्देश्‍य है वह पूरा हो सकेगा।

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2 Comments on "सूचनाधिकार बदलेगा भारत की सूरत: आरएस टोलिया"

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ASHISH SINGH CNEB NEWS
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सुचना के अधिकार से लोकतंत्र को बहुत मजबूती मिले है यह अधिकार जनता के लिए बहुत ही मददगार साबित होगा

श्रीराम तिवारी
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आर टी आयी से हो रहा ,लोकतंत्र बलवान …
अभियोजन की जटिलता ,लेत नहीं संज्ञान …

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