लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दक्षिण सूडान में जारी गृह युद्ध में फंसे सैकड़ों भारतीयों को सुरक्षित निकालने के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए अभियान ‘ऑपरेशन संकटमोचन’ की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम होगी। केंद्र की भाजपा सरकार के साथ विशेषकर सुषमा स्वतराज और वी.के. सिंह भी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्हें विदेश में रह रहे भारतीयों का दुख-दर्द तत्पकरता से दिखाई देता है, नहीं तो कई देश ऐसे भी हैं कि वे अपने नागरिकों की चिंता इतनी मुस्तैदी और त्वरितता से सभी संसाधन होने के बाद भी नहीं कर पाते हैं।sankatmochan
‘ऑपरेशन संकटमोचन’ विदेश मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय के सहयोग से चलाया हुआ है। दक्षिण सूडान से भारतीयों को एयरलिफ्ट करने के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत अपनी टीम के साथ विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह जूबा में डटे हुए हैं। पिछले साल वे अपने सफल नैतृत्व के जरिए युद्धग्रस्त यमन से 5000 भारतीयों के साथ अपने पड़ौसी मुल्कों के नागरिकों को सुरक्षित निकाल पाने में सफल रह चुके हैं। ऐसा ही एक और वाकया पिछले वर्ष का है, जब हज के दौरान पवित्र शहर मक्का में 24 सितंबर को हुई भगदड़ में 769 जायरीनों की मौत हुई थी, जिसमें 58 भारतीय नागरिकों की मौत होने के साथ ही 78 लोग लापता हो गए थे। इस हादसे में जो गायब थे, उनकी खोज-खबर लेने और मृतकों के शरीर को सुरक्षित भारत लाने में जनरल वीके सिंह की भूमिका अहम रही थी ।
इस बार पहले दस्तेह में वे अपने 146 से अधिक नागरिकों को दक्षिण सूडान की राजधानी जूबा से सुरक्षित निकाल लाए हैं। एक अनुमान के मुताबिक, जूबा व इसके आसपास के इलाकों में 600 या अधिकतम 1000 भारतीय हो सकते हैं। हालांकि अभी तक भारतीय दूतावास के पास सिर्फ 300 भारतीयों ने ही वापसी के लिए अपना पंजीयन कराया है।
इस बीच, सूडान में फंसे भारतीयों में से कई ऐसे भी हैं, जो कि इस मिशन के जरिए भारत आने में रूचि नहीं ले रहे हैं, लेकिन सच यही है कि जो हालात इन दिनों दक्षिण सूडान के हैं, उनको देखकर नहीं लग रहा कि आगामी कई दिनों बाद तक भी यहां की स्थिति सामान्य हो पाएगी। विदेश मंत्रालय में पंजीयन कराने के बावजूद बहुत सारे भारतीय जो स्वदेश वापसी से इंकार कर रहे हैं, उन्हें भी यह समझना होगा कि ज्यादा हालात खराब होने के बाद भारत सरकार भी चाहकर उन्हें यहां से बाहर नहीं निकाल पाएगी, क्योंकि हर देश की अपनी संप्रभुता और परिस्थितियां होती हैं।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा ट्विटर के जरिये की गई अपील पर उन सभी भारतीयों को गंभीरता से सोचना चाहिए, जो कि अब भी विपरीत परिस्थितियों के वाबजूद भी दक्षिण सूडान में रहने की जिद पर अड़े हुए हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सीधे ट्वीट के माध्यम से इन सभी से जुडक़र यह कहने की कोशिश की है कि आगे हालात और खराब होने पर आपको निकाल पाना हमारे लिए संभव नहीं होगा, और यही वह सच्चाई है, जिसे दक्षिण सूडान में जान की कीमत पर रह रहे भारतीयों को समझनी होगी। क्योंकि जीवन से बढक़र कुछ नहीं सिर्फ ‘स्वदेश’ होता है।

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