लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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drought in india
आज देश विश्व पटल पर एक समृद्धशाली और महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, और 21सवीं सदी में भारत को एक पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने की ओर प्रधानमंत्री मोदी जी लगातार दिन रात प्रयत्न कर रहे हैं।मेक इन इंडिया ,डिजिटल इंडिया,स्किल इंडिया,स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत,स्मार्ट सिटी,बुलेट टेªन,स्टार्टअप और कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित करने जा रहे हैं।देश के वैज्ञानिकों ,इंजीनियरों,डाक्टरों,सैनिकों, कुशल कारिगरों,रक्षा विषेक्षज्ञों,श्रमिकों आदि जो भी जिस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं अपनी भूमिका से देश के विकास और प्रगति में महत्वपूर्ण दे रहे हैं।जब देश में कई प्रकार की कुरीतियां, बुराइयां,कुप्रथायें,अंधविश्वास,रूढी़वाद चरम पर था ,जिसमें-सती प्रथा,बाल विवाह,पर्दाप्रथा,दहेज प्रथा,बलि प्रथा,दहेज प्रथा,जाति प्रथा,आदि प्रमुख हैं।इनके अंत और उन्मूलन के लिए कई समाज सुधारक पैदा हुए जिनमें भारतीय पुर्जागरण के जनक राजा राम मोहन राय, दयानंद सरस्वती,महात्मा ज्योतिबाराव फुले, स्वामी विवेकानंद,डा0 अंबेडकर,महात्मा गाँधी आदि प्रमुख हैं।कई संस्थायें,जिनमें-ब्रहम समाज,प्रार्थना समाज,आर्य समाज,रामकृष्ण मिसन,सत्य शोधक समाज,थियोसोफिकल सोसायटी,नामधारी आंदोलन,सर्वोदय आंदोलन आनि ने सामाजिक उत्थान और समतामूलक समाज की ओर देशवासियों को जागृत किया तथा महिलाओं,पिछडों़,वंचितों,और गरीबों के अधिकारों के लिए क्रांतिकारी आंदोलन किये ।जिसका ही परिणाम है कि आज हमारा देश कुछ प्रथाओं को तो शत-प्रतिशत समाप्त कर चुका है या यूँ कहा जाये कि भूल चुका है।कुछ बुराइयाँ कहें या कमजोरियां अभी भीहमारे सामाजिक पर्यावरण को प्रदूषित करने का काम कर रही हैं।जहाँ एक ओर संविधान और संवैधानिक सभ्यता को सामाजिक उत्थान के लिए हमारे सामाजसेवी,राजनेता,बुद्धिजीवी,और खुद प्रधानमंत्री जी जागरूकता फैलाने का ऐतिहासिक कार्य करने में जुटे हैं, जिसकी शुरूवात 14 अप्रैल को डा0 अंबेडकर जी की 125 वीं जयंती अवसर पर “ग्रामोदय से भारत उदय” कार्यक्रम की शुरूवात हो चुकी है जो निश्चित ही गाँव के के पिछडे़पन के साथ-साथ गाँव में अज्ञानता के कारण व्याप्त भेदभाव और महिलाओं को समृद्ध करने की ओर मील का पत्थर साबित हो सकती है।ऐसे खुशनुमा और सौहार्द्य भरे वातावरण में शंकराचार्य स्वरूपानंद जी द्धारा आजकल महिलाओं ,दलितों, साँई बाबा और आरक्षण पर बयानबाजी और टिप्पणियाँ समाज और देश के वर्तमान माहैल को क्या दिशा प्रदान करेगा यह चिंतन के साथ चिंता का भी विषय बन सकता है।आज जब महिलायें चाँद और अंतरिक्ष में कदम रख चुकी हैं पायलट से लेकर इंजीनियर, डाक्टर, और कुशल राजनेता बन चुकी है।इस वक्त ज्ञान के सागर और आध्यात्मिक गुरू माने जाने वाले शंकराचार्य कहते हैं कि “भूमाता ब्रिगेड” की महिलाओं ने शनिशिंगणापुर(महाराष्ट्र) के शनि मंदिर में प्रवेश किया है इसलिए देश में सूखा पडा़ है।ये कैसी विडंबना है कि एक ओर भारतीय ज्ञान के श्रोत वेद,पुराण,उपनिषद आदि पूजा पाठ को ही मानव के मुक्ति का मार्ग बताते हैं और दूसरी ओर महिलाओं के मंदिर में प्रवेश और पूजा करने पर आपत्ति जताते हैं।क्या महिलायें मानव समाज के अंतर्गत नहीं आती? यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता का पाठ सिर्फ सूक्ति मात्र रह गयी है? प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैरिल और एल्ड्रिज लिखते हैं“ सामाजिक आंदोलन रूढ़ियों में परिवर्तन के लिए अधिक या कम मात्रा में चेतन रूप से किये गये प्रयास हैं”।ऐसा नहीं कि देश में पहले सूखा या अकाल नहीं पडा़ हो। 1789-70 बंगाल में 1784 उत्तरी भारत में 1833 में गुंटूर में 1943-44 पूरे बंगाल में ब्डी़ मात्रा में सूखा पडा़ है।
प्राकृतिक आपदाओं का सीधा संबंध पर्यावरण से है।भारत में सूखे के कई कारण हैं। दक्षिण पश्चिम मानसून का देरी से आना,मानसून में लंबी अवधि का अंतराल,मानसून का समय पूर्व समाप्त होना तथा देश के विभिन्न भागों में मानसूनी वर्षा का असमान वितरण । इसके अलावा भू उपयोग में परिवर्तन ,अत्यधिक घास का चरना,वनों की कटाई,ग्लोबल वार्मिंग,ग्रीन हाउस प्रभाव जो मनुष्यों द्धारा निर्मित जलवायु परिवर्तन का कारण होती है।अब गौर करने ओर चिंतन करने का विषय यह हे कि-21सवीं सदी को ताक रहे नौलिहालों को हम प्राकृतिक आपदाओं के विषय में माननीय शंकराचार्य जी का पाठ पढा़येंगे या उपरोक्त कारण जो वैज्ञानिक प्रमाणें और पर्यावरणविदों की प्रमाणिकता और गहन खोज पर आधारित है?ऐतिहासिक गलतियों से कुछ हद तक हम उबरने की कोशिष कर रहे हैं।एक ओर देश में “भारत माता की जय”बोलने पर वाक युद्ध छिडा़ हुआ है,भारतीय दर्शन में “वसुधैव कुटम्बकम”और सत्यं शिवंम सुंदरम का संदेश है।माँ और मात्रृ भूमि स्वर्ग से भी गरीयसी माना गया है।अगर भारत भूमि माता है तो माता की ही कोख या गर्भ में मंदिर ,मस्जिद बने हुए हैं,फिर इन स्थलों पर महिलाओं को प्रवेश से वंचित रखना किस आधार पर न्यायोचित ठहराया जा सकता हैैै।क्या महिलायें माँ नहीं होती?एक ओर हम माँ की 9 रूपों में पूजा अर्चना करते हैं और साकार माँ को अस्पृष्य और प्रकृतिक आपदा का कारण मानते हैं।यह 21 स्वीं सदी का नहीं 21स्वीं सदी पूर्व की मानसिकता और सोच को ही प्रकट करती है।
मेरा मकसद शंकराचार्य जी का विरोध नहीं वरन मातृशक्ति की सच्चे दिल से इज्जत और सम्मान करना है।इसलिए ये वक्त यही कहने का है कि-
“सोच बदलो समाज जगाओ”

( आई0 पी0 हृयूमन)

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