लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

संदर्भ :- भारतीय दंतचिकित्सक सविता की मौत से जुड़ा आयरलैंड का मामला।

आमतौर से पश्चिमी देश दुनिया को मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते हैं। इन देशो में भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश उनके निशाने पर प्रमुखता से रहते हैं। भारत को तो वे मदारी और सपेरों का ही देश कहकर आत्ममुग्ध होते रहते हैं। वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामी मान्यताओं के चलते महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने की निंदा करते हैं। अब आयरलैंड में भारतीय मूल की दंत चिकित्सक सविता हलप्पनवार की मौत ने तय कर दिया है कि चर्च के बाध्यकारी कानूनों का पालन करने वाला पश्चिमी समाज कितना पाखण्डी है ? सविता की कोख में 17 माह का सजीव गर्भ विकसित हो रहा था। पर गंभीर जटिलता के कारण गर्भपात की स्थिति निर्मित हो गर्इ। 31 साल की सविता को गैलवे के अस्पताल में भर्ती कराया गया। चूंकि सविता खुद चिकित्सक थी, इसलिए जांच रिपोर्टों के आधार पर उसने जान लिया था कि गर्भपात नहीं कराया गया तो उसकी जान जोखिम में पड़ सकती है। इसलिए उसने खुद पति प्रवीण हलप्पनवार की सहमति से चिकित्सकों को गर्भपात के लिए कहा। लेकिन चिकित्सकों ने माफी मांगते हुए कहा, ‘दुर्भाग्य से आयरलैण्ड कैथोलिक र्इसार्इ देश है। यहां के र्इसार्इ कानून के मुताबिक हम जीवित भ्रूण का गर्भपात नहीं कर सकते। हलप्पनवार दंपतित ने दलील दी कि हम हिंदू धर्मावलंबी हैं, लिहाजा हम पर यह कानून थोपकर हमारी जान खतरे में न डाली जाए। किंतु अंधविश्वासी आयरलैंड समाज के चिकित्सकों ने इन दलीलों को ठुकरा दिया और सविता की मौत हो गर्इ। बाद में शव-परीक्षण से पता चला कि सविता की कोख में घाव था, जो सड़ चुकने के कारण सविता की दर्दनाक मौत का कारण बना।

कहने को ग्रेट ब्रिटेन से 1922 में अलग हुआ आयरलैंड एक आधुनिक और प्रगतिशील देश है। दुनिया के सर्वाधिक धनी देशो में इसकी गिनती है। यहां के शत-प्रतिशत नागरिक साक्षर व उच्च शिक्षित हैं। 2011 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित मानव विकास सूचकांक में आयरलैंड विकसित देशो की गिनती में सातवें स्थान पर है। इस सब के बावजूद चर्च के बाध्यकारी व अमानवीय कानूनों के चलते यह देश मानसिक रुप से कितना पिछड़ा है, इस तथ्य की तसदीक सविता की मौत ने कर दी है। हालांकि कटटर र्इसार्इ कानून की इस अमानवीयता ने दुनिया भर संवेदनशील लोगों को झकझोरा है। आयरलैंड, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और भारत समेत दुनियाभर में हुए प्रदर्शनो में उमड़े जनसैलाव, मीडियाकर्मियों और सोशल साइटों पर आ रही प्रतिकि्रयाओं ने सविता की मौत की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इस जानलेवा चर्च के कानून को तत्काल बदलने की मांग की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था पर भी जनप्रदर्शनकारियों ने दबाव बनाया है कि वह आयरलैंड शासन-प्रशासन पर पर्याप्त हस्तक्षेप कर इस रुढि़वादी कानून को बदलवाए।

हालांकि इस कानून को बदला जाना इतना आसान नहीं है। क्योंकि आयरलैंड सरकार चर्च कानून के दिशा-निर्देशो से ही संचालित होती है। इसलिए वहां इस कानून में परिवर्तन के समर्थन में बहुमत नहीं है। करीब 20 साल पहले भी एक एक्स-प्रकरण ने भी आयरलैंड को झकझोरा था। इस मामले में 14 साल की एक स्कूली छात्रा दुष्कर्म के चलते गर्भवती हो गर्इ थी। इस छात्रा के पालकों ने प्रशासन से गर्भपात की अनुमति मांगी थी। किंतु कानून की ओट लेकर इजाजत नहीं दी गर्इ और लड़की ने आत्महत्या कर ली थी। तब आयरिश सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि भ्रूण और मां दोनों को जीने का समान अधिकार है। इसलिए आत्महत्या की आशंका के चलते गर्भपात की इजाजत मिलनी चाहिए। लेकिन न्यायालय की इस दलील को खारिज कर दिया गया और इस क्रूर व अमानवीय कानून में अभी तक कोर्इ बदलाव संभव नहीं हुआ।

दरअसल आयरलैंड में गर्भपात न किए जाने का जो कानून वजूद में है, उसके पीछे मूल-भावना यह निहित हो सकती है कि जीवन को किसी भी हाल में नष्ट न किया जाए। यह कानून तब तक तो ठीक था, जब तक अल्टासाउंड जैसी आधुनिक चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार नहीं हुआ था और यह समझना मुश्किल था कि कोख में शिशु किस हाल में हैं। किंतु अब ऐसी जांच तकनीकें असितत्व में आ गर्इ हैं, जिनसे कोख में विकसित हो रहे शिशु की पल-पल की जानकारी ली जा सकती है। सविता के मामले में भी जांचों से साफ हो गया था कि कोख में घाव पक रहा है। इसलिए सविता का गर्भपात किया जाना नितांत जरुरी था। ऐसा नहीं हुआ, इसलिए अजन्मे शिशु के साथ 31 साला सविता की भी मौत हो गर्इ। यदि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून को ही सही मानें तो मां के जीवन के खतरे को यदि भांप लिया जाए तो सुरक्षित व कानून के दायरे में गर्भपात कराना महिला का मौलिक अधिकार है। किंतु ‘कानून शब्द आ जाने से इस दलील की अंतरराष्ट्रीयता, किसी देश की राष्ट्रीयता के दायरे में आ जाती है और आयरलैंड में चर्च कानून किसी भी प्रकार के गर्भपात पर रोक लगाता है। लिहाजा जरुरी है कि इस कानून पर पुनर्विचार हो और इसे चर्च की जड़ता से मुक्त किया जाए।

ज्यादातर पश्चिमी देश दुनिया के दूसरे देशो के धर्मों पर न केवल सवाल खड़े करते हैं, बलिक उन देशो के धर्मों की खिल्ली उड़ाने वाले बुद्धिजीवी अथवा लेखकों को अपने देशो में शरण भी देते हैं। सलमान रुष्दी को इसलिए ब्रिटेन में शरण मिली हुर्इ है। बांग्लादेश की क्रांतिकारी लेखिका तस्लीमा नसरीन को भी ब्रिटेन अपने देश बुलाना चाहता है। भारतीय देवी-देवताओं के अपतितजनक चित्र बनाने पर मकबूल फिदा हुसैन का जब भारत के कटटरपंथियों ने विरोध किया तो उन्हें भी ब्रिटेन शरण देना चाहता था, किंतु वे खुद दुबर्इ जाकर रहने लगे थे।

आधुनिकता का दंभ भरने वाली र्इसाइयत मध्ययुगीन अंधेरे में कितनी जकड़ी है, यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि जब भारतीय मूल की दिवंगत नन, सिस्टर अल्फोंजा को वेटिकन सिटी में पोप ने संत की उपाधि से विभूषित किया था, तब उसके पीछे मध्ययुगीन पाखण्डी मानसिकता ही काम कर रही थी दरअसल ऐसा इसलिए किया गया था, क्योंकि अल्फोंजा का जीवन छोटी उम्र में ही भ्रामक दैवीय व अतीनिद्रीय चमत्कारों का दृश्टांत बन गया था। जबकि इस उपाधि की वास्तविक हकदार र्इसार्इ मूल की ही मदद टेरेसा थीं। जिन्होंने भारत में रहकर हजारों कुष्ठ रोगियों की निर्लिप्त भाव से सेवा की। अपना पूरा जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। किंतु जन-जन की इस मदद टेरेसा को ‘संत की उपाधि से अलंकृत नहीं किया जाता, क्योंकि उनका जीवन चमत्कारों की बजाय यथार्थ रुप में मानव कल्याण से जुड़ा था। मानवीय सरोकारों के लिए जीवन अर्पित कर देने वाले व्यकितत्व की तुलना में अलौकिक चमत्कारों को संत शिरोमणि के रुप में महिमामंडित करना किसी एक व्यकित को नहीं पूरे समाज को दुर्बल बनाता है। यही अलौकिक कलावाद धर्म के बहाने व्यकित को निशिक्रय व अंधविश्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईश्वरीय तथा भाग्य आधारित अवधारणा को प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। यही कारण है कि आयरलैंड में 20 साल पहले एक्स प्रकरण सामने आने और सर्वोच्च न्यायालय की हिदायत के बावजूद इस कानून को आज तक नहीं बदला जा सका है। अब डा सविता की मौत के बाद आयरलैंड के प्रधानमंत्री इनडा केनी कह रहे हैं कि जांच के बाद कोर्इ प्रभावी कदम उठाएंगे। दरअसल इस मामले जांच से कोर्इ चिकित्सकों की जबावदेही तय नहीं की जानी है, जिसके लिए जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जाए। चिकित्सकों ने तो कानून के चलते न करने की लाचारी जतार्इ थी। इसलिए जरुरी है इस कानून में वैसे तो आमूलचूल परिवर्तन हो ही, फिर भी यदि चर्च का मान रखना भी पडे़ तो आयरिश सरकार इस कानून में इतनी छूट तो तत्काल दे ही, जिसके चलते अन्य धर्मविलंबियों को आयरलैंड में गर्भपात कराने की छूट मिलें और डा सविता जैसी मौत की पुनरावृतित न हो ?

 

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