लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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आदिम मनुष्य अनेक क्रियाओं और घटनाओं के कारणों को नहीं जान पाता था. वह अज्ञानवश समझता था कि इनके पीछे कोई अदृश्य शक्ति है. वर्षा, बिजली, रोग, भूकंप, वृक्षपात, विपत्ति आदि अज्ञात तथा अज्ञेय देव, भूत, प्रेत और पिशाचों के प्रकोप के परिणाम माने जाते थे. ज्ञान का प्रकाश हो जाने पर भी ऐसे विचार विलीन नहीं हुए, प्रत्युत ये अंधविश्वास माने जाने लगे. आदिकाल में मनुष्य का क्रिया क्षेत्र संकुचित था इसलिए अंधविश्वासों की संख्या भी अल्प थी। ज्यों ज्यों मनुष्य की क्रियाओं का विस्तार हुआ त्यों-त्यों अंधविश्वासों का जाल भी फैलता गया और इनके अनेक भेद-प्रभेद हो गए. अंधविश्वास सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं. विज्ञान के प्रकाश में भी ये छिपे रहते हैं। अभी तक इनका सर्वथा उच्द्वेद नहीं हुआ है. जादू-टोना, शकुन, मुहूर्त, मणि, ताबीज आदि अंधविश्वास की संतति हैं. इन सबके अंतस्तल में कुछ धार्मिक भाव हैं, परंतु इन भावों का विश्लेषण नहीं हो सकता. इनमें तर्कशून्य विश्वास है। मध्य युग में यह विश्वास प्रचलित था कि ऐसा कोई काम नहीं है जो मंत्र द्वारा सिद्ध न हो सकता हो. असफलताएँ अपवाद मानी जाती थीं। इसलिए कृषि रक्षा, दुर्गरक्षा, रोग निवारण, संततिलाभ, शत्रु विनाश, आयु वृद्धि आदि के हेतु मंत्र प्रयोग, जादू-टोना, मुहूर्त और मणि का भी प्रयोग प्रचलित था। मणि धातु, काष्ठ या पत्ते की बनाई जाती है और उस पर कोई मंत्र लिखकर गले या भुजा पर बाँधी जाती है. इसको मंत्र से सिद्ध किया जाता है और कभी-कभी इसका देवता की भाँति आवाहन किया जाता है। इसका उद्देश्य है आत्मरक्षा और अनिष्ट निवारण.
योगिनी, शाकिनी और डाकिनी संबंधी विश्वास भी मंत्र विश्वास का ही विस्तार है। डाकिनी के विषय में इंग्लैंड और यूरोप में 17वीं शताब्दी तक कानून बने हुए थे। योगिनी भूतयोनि में मानी जाती है. ऐसा विश्वास है कि इसको मंत्र द्वारा वश में किया जा सकता है. फिर मंत्र पुरुष इससे अनेक दुष्कर और विचित्र कार्य करवा सकता है। यही विश्वास प्रेत के विषय में प्रचलित है। फलित ज्योतिष का आधार गणित भी है. इसलिए यह सर्वांशतः अंधविश्वास नहीं है। शकुन का अंधविश्वास में समावेश हो सकता है. अनेक अंधविश्वासों ने रूढ़ियों का भी रूप धारण कर लिया है.
अंधविश्वासों का सर्वसम्मत वर्गीकरण संभव नहीं है. इनका नामकरण भी कठिन है. पृथ्वी शेषनाग पर स्थित है, वर्षा, गर्जन और बिजली इंद्र की क्रियाएँ हैं, भूकंप की अधिष्ठात्री एक देवी है, रोगों के कारण प्रेत और पिशाच हैं, इस प्रकार के अंधविश्वासों को प्राग्वैज्ञानिक या धार्मिक अंधविश्वास कहा जा सकता है. अंधविश्वासों का दूसरा बड़ा वर्ग है मंत्र-तंत्र। इस वर्ग के भी अनेक उपभेद हैं. मुख्य भेद हैं रोग निवारण, वशीकरण, उच्चाटन, मारण आदि. विविध उद्देश्यों के पूर्त्यर्थ मंत्र प्रयोग प्राचीन तथा मध्य काल में सर्वत्र प्रचलित था.मंत्र द्वारा रोग निवारण अनेक लोगों का व्यवसाय था। विरोधी और उदासीन व्यक्ति को अपने वश में करना या दूसरों के वश में करवाना मंत्र द्वारा संभव माना जाता था. उच्चाटन और मारण भी मंत्र के विषय थे. मंत्र का व्यवसाय करने वाले दो प्रकार के होते थे-मंत्र में विश्वास करने वाले, और दूसरों को ठगने के लिए मंत्र प्रयोग करने वाले.
भारत के कई प्रमुख टीवी चैनल और समाचार चैनलों पर दरबार लगा है. बड़ी संख्या में भक्तों के बीच चमत्कारी शक्तियों का दावा करने वाले शख्स सिंहासन पर विराजमान हैं. लोग प्रश्न पूछते हैं और बाबा जवाब देते हैं. सामान्य परेशानी वाले सवालों के असामान्य जवाब. एक छात्रा पूछती है, बाबा मैं आर्ट्स लूँ, कॉमर्स लूँ या फिर साइंस. बाबा कहते हैं- पहले ये बताओ आखिरी बार रोटी कब बनाई है, रोज एक रोटी बनाना शुरू कर दो. एक और हताश और परेशान व्यक्ति पूछता है, बाबा नौकरी कब मिलेगी. बाबा कहते हैं क्या कभी साँप मारा है या मारते हुए देखा है. ये है निर्मल बाबा का दरबार. जनता मस्त है और बाबा भी. बाबा की झोली लगातार भर रही है. बाबा के नाम प्रॉपर्टी भरमार है. होटल हैं, फ्लैट्स हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं. कई अखबार दावा करते हैं कि जनवरी से बाबा के बैंक खाते में हर दिन एक करोड़ रुपए आ रहे हैं. ये है 21वीं सदी का भारत. आधुनिक भारत. अग्नि-5 वाला भारत. कौन कहता है भारत में पैसे की कमी है. गरीब से गरीब और धनी से धनी बाबा के लिए अपनी संपत्ति कुर्बान कर देना चाहता है.
कई प्रमुख टीवी चैनलों और समाचार चैनलों पर जगह बना चुके निर्मल बाबा पर एकाएक मीडिया की तिरछी नजर पड़ गई है. अब टीवी चैनल निर्मल बाबा की पोल खोलने के लिए कमर कस चुके हैं. कितनी अजीब बात है कई समाचार चैनल बाबा की बैंड बजाने पर तुले हैं और उन्हीं के चैनल पर बाबा अपने भक्तों को बेमतलब का ज्ञान बाँट रहे हैं.
बाबाओं को लेकर भारतीय जनता का प्रेम नया नहीं है. कभी किसी बाबा की धूम रहती है तो कभी किसी बाबा की. कभी आसाराम बापू और मोरारी बापू टीवी चैनलों की शान हुआ करते थे, तो आज निर्मल बाबा का समय आया है. ये बाबा भी बड़ी सोच-समझकर ऐसे लोगों को अपना लक्ष्य बनाते हैं, जो असुरक्षित हैं. आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत छोटी लकीर होती है, जिसे मिटाकर ऐसे बाबा अपना काम निकालते हैं. लेकिन नौकरी के लिए तरसता व्यक्ति या फिर बेटी की शादी न कर पाने में असमर्थ कोई गरीब इन बाबाओं का टारगेट नहीं. इनका टारगेट हैं मध्यमवर्ग, जो बड़े-बड़े स्टार्स और व्यापारिक घराने के लोगों की ऐसी श्रद्धा देखकर इन बाबाओं की शरण में आ जाता है. बच्चन हों या अंबानी, राजनेता हों या नौकरशाह- इन बड़े लोगों ने जाने-अनजाने में इस अंधविश्वास को बल दिया है. ऐश्वर्या राय की शादी के समय अमिताभ बच्चन का ग्रह-नक्षत्रों को खुश करने के लिए मंदिरों का दौरा, अंबानी बंधुओं में दरार पाटने के लिए मोरारी बापू को मिली अहमियत. चुनाव जीतने के लिए बाबाओं के चक्कर लगाते नेता. दरअसल समृद्धि अंधविश्वास भी लेकर आती है. वजह अपना रुतबा, अपनी दौलत कायम रखने का लालच. जो जितना समृद्ध, वो उतना ही अंधविश्वासी. और फिर समृद्धि के पीछे भागता मध्यमवर्ग, इस मामले में क्यों पीछे रहेगा. इसलिए इन बाबाओं की पौ-बारह हैं. फिर क्यों न निर्मल बाबा डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को खीर खाने की सलाह देंगे. आखिर हमारी मानसिकता ही तो ऐसे तथाकथित चमत्कारियों को समृद्ध बना रही हैं.

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