लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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सीबीआई के शिकंजे में आला अधिकारी

भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसने की दृश्टि से सर्वोच्च न्यायालय ने अहम् फैसला दिया है। हालांकि भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन देने की जवाबदेही विधायिका की है, लेकिन जब विधायिका भ्रष्टाचार पर पर्दा डाले रखने के काम में लग जाए, तब न्यायालय की यह पहल अनुकरणीय है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की ताकत में विस्तार किया है। संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मामले में अब जांच शुरू करने से पहले सीबीआई को सरकार से इजाजत लेने की जरुरत नहीं होगी। अदालत ने इस ऐतिहासिक फैसले में महज इतना किया है कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम’ (डीएसपीईए) की धारा 6-ए को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया है। इसी अधिनियम के तहत ‘केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो’ का गठन हुआ है। इस धारा के अस्तित्व के चलते ही सीबीआई को आला नौकरशाहों से जुड़े मामलों में जांच से पहले अनुमति लेना अनिवार्य थी। यह फैसला भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनाया गया है।

हमारे देश के कानून की विडंबना रही है कि कई ऐसे वैकल्पिक, विरोधाभासी और समानांतर कानून वजूद में बने हुए हैं, जो ताकतवर राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों से जुड़े गैरकानूनी मामलों में जांच प्रक्रिया को पूरी करने में बाधा पैदा करते हैं। ‘भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता’ में कई ऐसी वैकल्पिक व विरोधाभासी धाराएं हैं, जिन्हें आधार बनाकर शक्तिशाली लोग पतली गली से बच निकलते हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कई रुलिंग भी नौकरशाही को बचाने का काम करती हैं। लिहाजा लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ से ऐसी धाराओं की समीक्षा कराकर उन्हें विलोपित करने की मांग की जा रही है, लेकिन मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति सामने न आ पाने के कारण इस दिशा में कोई पहल नहीं हो पा रही है।

शीर्ष न्यायालय इसी तर्ज पर जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को असंवैधानिक ठहरा चुकी है। इसके पहले अदालत ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कदाचरण से जुड़ी विभागीय जांच के आधार पर पुलिस या अदालत में चल रहे मामलों को चलने देने की इजाजत दी थी। इस प्रकृति के मामलों में होता यह था कि यदि कर्मचारी विभागीय जांच में निर्दोश साबित हो जाता था, तो पुलिस प्रकरण भी समाप्त कर दिया जाता था। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट की ही एक रुलिंग के आधार पर बदस्तूर थी। अब न्यायालय ने इसे परिभाषित करते हुए साफ कर दिया कि विभागीय जांच से आपराधिक मामले का कोई वास्ता नहीं है। यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी पर आपराध कायम हुआ है तो उसका निपटारा अदालत से ही होगा।
धारा 6-ए का प्रावधान संवैधानिक नहीं था। यह संविधान के अनुच्छेद- 14 में दर्ज प्रावधानों के विरुद्ध भी है। छोटे-बड़े पद के आधार पर भ्रष्टाचारी को भेद की नजर से नहीं देखा जा सकता। लेकिन केंद्र सरकार ने वरिष्ठ अधिकारियों को संरक्षण देने की दृश्टि से 2003 में एक आदेश जारी कर डीएसपीईए की धारा-6 ए के प्रावधानों को सीबीआई की संचालन नियमावली में दर्ज कर लिया था। इस पृष्ठभूमि में सरकार की दलील थी कि किसी आला अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से न केवल उनकी छवि खराब होती है, बल्कि विभाग की छवि को भी हानि पहुंचती है। इस लिहाज से सरकार ने धारा 6 ए का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद- 14 में जोड़ दिया था, ताकि सरकार शिकायत की गंभीर निष्पक्षता से जांच कर सके। लेकिन सरकार कोई जांच कराने की बजाय, जांच दबाए रखने का काम ज्यादा करती थी। अब अदालत ने साफ कर दिया है कि ‘ भ्रष्टाचार देश का दुश्मन है। भ्रष्टाचारियों को अलग-अलग वर्गों में बांट कर विभाजित दृष्टि से देखना कतई उचित नहीं है। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ बने कानून की भी अवहेलना है’। जाहिर है, लागू प्रावधान संविधान सम्मत नहीं था। हालांकि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने के लिए संविधान में दर्ज कुछ अनुच्छेदों में बदलाव की जरूरत है, जिसे संसद ही अंजाम तक पहुंचा सकती है। हालांकि इस बाबत खुद सीबीआई केंद्रीय विधि और कार्मिक मंत्रालय को सिफारिश कर चुकी है। इसके मुताबिक यदि सरकार भ्रश्टाचार मुक्त प्रशासन चाहती है तो सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा भ्रष्ट आचरण से अर्जित संपत्ति को जब्त करने की कोशिशों को भी बल मिलना चाहिए। इस लक्ष्यपूर्ति के लिए संविधान के अनुच्छेद 310 और 311 में बदलाव की जरूरत सीबीआई ने जताई थी, क्योंकि यही दोनों अनुच्छेद ऐसे सुरक्षा कवच हैं, जो देश के लोकसेवकों के भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति को संरक्षण देते हैं। अभी तक भ्रष्टाचार निवारक कानून में इस संपत्ति को जब्त करने का प्रावधान नहीं है।

यहां गौरतलब यह भी है कि जो भाजपा विकास और सुशासन के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है, उसी भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इसी तरह के फैसले को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक ऐसी ही कोशिश बहुचर्चित जैन हवालाकांड में कर चुकी है। तब अदालत ने जांच में बाधा उत्पन्न न हो, इस नजरिए से धारा-6 जैसे एकल प्रस्ताव को असंवैधानिक ठहराकर रद्द कर दिया था। लिहाजा सीबीआई को जांच के लिए सरकार से स्वीकृति लेना अनिवार्य शर्त नहीं रह गई थी। लेकिन सीबीआई को सरकार पर आश्रित बनाए रखने की दृश्टि से तात्कालीन राजग सरकार ने एक विधायी प्रावधान लाकर इस न्यायिक निर्देश को निष्प्रभावी कर दिया था। केंद्र में बनने वाली नई सरकार इसी तरह का विधायी प्रावधान या अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को रद्द करने को स्वतंत्र है। ज्ञात हो 10 जुलाई 2013 को जब शीर्ष न्यायालय ने दागी सांसद-विधायकों को संरक्षण देने वाली जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-8 (4) को असंवैधानिक ठहराया था, तब अदालत के इस फैसले को बेअसर करने के नजरिए से मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन ऐन वक्त पर राहुल गांधी ने इस अध्यादेश को रद्दी का टुकड़ा बताकर अदालत का मान रख लिया था।

सीबीआई के वजूद को खंगालें तो पता चलता है कि फिरंगी हुकूमत के दौरान 1946 में ‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम’ बनाया गया था। इसका कार्यक्षेत्र केवल केंद शासित प्रदेशों तक सीमित था। यह इंटिलिजेंस ब्यूरो के अधीन थी। तब इसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलनों और उनके आय के स्त्रोतों का पता लगाना था। 1948 में सीबीआई को पुलिस महानिरीक्षक के पद का सृजन कर उसके अधीन कर दिया गया। आजादी के बाद इसके कार्यक्षेत्र में विस्तार किया गया। 1963 में इसके दायरे में भारतीय दण्ड विधान की अपराध को संज्ञान में लेने वाली 91 धाराएं जोड़ दी गईं। साथ ही 16 अन्य केंद्रीय अधिनियम और भ्रष्टाचार निरोधक कानून भी इसे सौंप दिए। बाद में 1 अप्रैल 1963 को गृह मंत्रालय के सचिव वी. विश्ननाथन ने एक प्रस्ताव बनाया और इसे कार्मिक मंत्रालय के मातहत कर दिया। हालांकि वर्तमान में सीबीआई देश का एक मात्र ऐसा अनूठा संस्थागत ढांचा है, जो एक साथ गृह, कानून और कार्मिक मंत्रालयों के नियंत्रण में है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पिंजरे का तोता कहने के साथ स्वायत्त संस्था बनाने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था। जिससे देश की यह महत्वपूर्ण संस्था एक तो राजनीतिकों के हाथ का खिलौना न बनी रहे, दूसरे इसकी भूमिका न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और नियंत्रक एवं लेखा महानिरीक्षक के समकक्ष बन जाए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कुछ समय पहले ही गुवाहटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई को ही एक फैसले में असंवैधानिक करार दे दिया था। हालांकि तत्काल सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को स्थगन आदेश के जरिए निष्क्रिय कर दिया था, लेकिन सवाल तो यथावत बना हुआ है। 16 मई के बाद केंद्र में बनने वाली नई सरकार का उत्तरदायित्व बनता है कि वह सीबीआई संसदीय वैधता देने के साथ स्वायत्त एवं सक्षम भी बनाने का काम करे।

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