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धार्मिक सुधारों के कानून मात्र बहुसंख्यकों के लिए क्यों?

हरिकृष्ण निगम

 

हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह से केंद्र को कानूनी प्रक्रिया को अल्पसंख्यकवाद के शिकंजे में फंसाने के लिए उत्तरदायी ठहराकर उसकी भर्त्सना की है वह किसी की भी आंखे खोलने वाला है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर समय-समय पर अनेक मुकद्मों में पहले भी कई बार ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को देश की राष्ट्रीय एकता व कानून के कार्यान्वयन में बाधा माना जा चुका है। हाल में तो राष्ट्रीय महिला आयोग की दिल्ली शाखा ने जब लड़कियों के विवाह की समान निम्नतम आयु के बारे में अनेक विरोधभासी मानदंडों की ओर संकेत दिया तब उस याचिका को सुनते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दो-टूक टिप्पणी की केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों के निजी कानूनों में समान रूप से बनाने में अत्यंत भयभीत क्यों रहती है? क्या सरकार सिर्फ हिंदुओं के वर्तमान कानूनों में ही अपना नियंत्रण जमाते हुए परिवर्तन करने को साहस दिखा पाती है? देश में हर नागरिक केवल कुछ सेक्यूलरवादी कहलाने वाले संशयग्रस्त, बुध्दिजीवियों को छोड़कर सामान्य नागरिक संहिता का समर्थक रहा है। अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकारों के नाम पर, उनके प्रति किसी भेदभाव न होने के नाम, उनको अपनी पहचान को बरकरार रखने के नाम पर सरकार की झुठी उदारता उन्हें एक ऐसा समुदाय बना रही हैजो बाक ी संप्रदायों से अनंतकाल तक पृथक व अघुलनशील बनी रहे। यदि सर्वोच्च न्यायालय खुद महसूस करे कि सरकार मात्र बहुसंख्यकों की निजी कानूनी दायित्वों में हस्तक्षेप कर सुधार ला सकती है तो हमारी संसदीय गरिमा एक गंभीर खतरे में पड़ी कही जा सकती है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि यदि निजी कानूनों में सुधार हिंदुओं के अतिरिक्त किसी अन्य संप्रादाय में लाना इस सरकार के लिए संभव नही है तब सरकार की यह शुतुर्मुर्गी दृष्टि अनैतिक भी है और असंवैधानिक भी। ”इन न्यायिक हस्तक्षेपों के प्रति हिंदू समुदाय अत्यंत सहिष्णु हैं पर यह प्रदर्शित करता है कि सरकार का पंथनिरपेक्षदाता के लिए प्रतिबध्दता झुठी है क्योंकि ऐसा हस्तक्षेप दूसरे धर्मों के संबंध में वह नहीं कर सकी है।” इस प्रकार की टिप्पणी के अतिरिक्त आस्था और कानून के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की भर्त्सना करते हुए कहा कि चाहे हिंदू विवाह अधिनियम हो या सन 2006 का बाल विवाह अधिनियम हो संसद की सारी ताकत मात्र हिदुंओं पर ही लागू होती हैऔर किसी और धार्मिक संप्रदाय के निजी कानूनों पर नहीं। उनके आधुनिकीकरण व बदलते समय की मांग के अनुसार संभावित व अपेक्षित परिवर्तन में की बहस करना भी सरकार के लिए मुश्किल है।

 

सरकार और सत्तारूढ़ दलों के सेक्यूलरवादी दर्शन का खोखलापन कितना स्पष्ट है, यह सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है। सच तो यह है कि स्वतंत्रता बाद से हर प्रशासन भारतीय समाज की इस कमजोरी को अपने हिंतों के लिए उछाला। समान नागरिक संहिता की मांग पर सेक्यूलरवादियों के हर विमर्श में उनका भड़कना जग जाहिर रहा है। वही खोखले तर्क फिर वर्तमान सरकार और सत्तारूढ़ दल दोहरा रहे हैं। सुधारों की परिधि से अल्पसंख्यकों को दूर रखना न तो न्यायसंगत है और न वैधानिक और सरकार के प्रशासन की कमजोरियो को ढकने का बहाना है। यदि कानून का शासन सभी नागरिकों पर एक रूप में बराबरी से लागू नहीं होता है तो वह प्रजातंत्र का माखौल है और विशेषज्ञों की दृष्टि में आपराधिक भी कहा जा सकता है।

 

यह नहीं कि मात्र भारत में ही यह मुद्दा उठता है और दुनियां के कई विकसित लोकतांत्रिक देशों जैसे वेल्जियम, फ्रांस और इंग्लैंड में यह भलीभांति खुलकर, बिना भारतीय विद्वानों की हीनताग्रंथि या अपराध बोध जैसे सांचे में, विमर्श का विषय बन रहा है। बहुसंस्कृतिवाद का मखौल उड़ाने के लिए ‘मल्टी-कल्टी’ जैसी टिप्पणियों या विशेषणों की भरमार हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने हाल के अपने भाषण में मुस्लिम जनसंख्या के अघुलनशील होने को कारण इस ब्राँड के बहुसंस्कृतिवाद की भर्त्सना की जो उनके राष्ट्र को कमजोर बना रहे हैं। उस सहिष्णुता और समावेशवादी भावना को त्याज्य मानते हैं जो धार्मिक समूहों को ‘पृथक सांस्कृतिवाद घेटोज’ में राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बदल दे। भारत में सामान्य विधि संहिता के अभाव में ऐसी स्थिति आ चुकी है और उदारवादी जीवन-मूल्यों की बात करने वालों को ढोंगी सिध्द कर रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय को सुधारों से अछूते रखने का निर्णय सबसे पहले नेहरूजी के समय में लिया गया था और यदि अल्पसंख्यकों को पिछड़ा रचाने की पृष्ठभूमि के लिए इतिहास किसी को उत्तरदायी ठहराएगा तो वह फोटोस ही होगी। अपनी आदर्शवादी सपनों की सार्थकता को सिध्द करने के उत्साह में दशकों बाद भी सच्चाई यह है कि हम संविधान में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्वों की आज भी लागू नहीं कर सके हैं।

 

मजे की बात यह है कि कथित प्रभावी अंग्रजी मीडिया हमारे देश में आज इस सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी को भी पचाने में असमर्थ दीखता है। ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 10 फरवरी, 2011 कें संपादकीय पृष्ठ पर जयकुमार की एक त्वरित टिप्पणी प्रमुख रूप से छपी है कि सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी में ‘कट्टरवादी हिंदुत्व’ के भक्तों को तो हर्ष होगा पर उन्हें अल्पसंख्यकों के निजी कानूनों से छेड़छाड़ करने के पहले सोचना होगा कि उनके लिए सुधार की मांग उनके ही भीतर से आनी चाहिए न कि कानून के हस्तक्षेप से। इस अनूठे सेक्यूलरवाद कुत्सित चेहरा जनता के सामने हैं।

 

* लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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1 Comment on "सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय सरकार की आलोचना"

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एल. आर गान्धी
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एक मुस्लिम महिला से उसके ससुर ने बलात्कार किया और मुल्लाजी ने शरियत कानून के हवाले से पीड़ित महिला को बलात्कारी स्वसुर की पत्नी और उसके पति को ‘पुत्र’ घोषित कर दिया….. और हमारे देश का क़ानून आँखों पर पट्टी बांधे देखता रह गया.
और लोक सभा में नारी सशक्ति करण और बलात्कारी को मौत की सज़ा का उद्घोष करने वाले सेकुलर शैतान गाँधी-मौनव्रत धरे वोट बैंक बैलेंस टटोलते दिखे.

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