लेखक परिचय

डॉ. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एमए, एमफिल और पीएचडी की उपाधि हासिल करने वाले मनीषजी राजनीतिक टिप्‍पणीकार के रूप में मशहूर हैं। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में लंबी पारी खेलने के बाद इन दिनों आप प्रिंट मीडिया में भी अपने जौहर दिखा रहे हैं। फिलहाल आप देश के पहले हिंदी साप्‍ताहिक समाचार-पत्र चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं।

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supreme courtसमलैंगिक सेक्स अपराध है या नहीं इस पर मंगलवार यानि 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा. ऐसा लगता है कि मीडिया समलैंगिकता को वैधता दिलाने के पक्ष में है, लेकिन फैसला तो सुप्रीम कोर्ट को करना है. कोर्ट को यह तय करना है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला सही है या गलत. 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को जायज ठहराया था. फिर ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. दिसंबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया और फिर से समलैंगिक सेक्स को गुनाह करार दिया. इस फैसले के खिलाफ लोगों ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिसका फैसला 2 फरवरी को होना है.

अंग्रेजी मीडिया और देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग समलैंगिकों के समर्थन में खड़े हैं. ये लोग या तो अनजाने में या फिर जानबूझ कर उन ताक़तों का साथ दे रहे हैं जो तीन खरब डालर की सेक्स इंडस्ट्री के पीछे है. दुनिया भर के कमज़ोर और उदार देशों में सेक्स की मंडी खोलने के बाद अब उनकी नज़र भारत पर टिकी है. फिर भी, अरनब गोस्वामी जैसे लोगों को धारा 377 हटाने की जल्दबाज़ी है. ये वही लोग हैं जो देश में वेश्यावृति को भी वैधता देने की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसलिए पूरे मामले को समझना जरूरी है.

मीडिया में जो बहस चल रही है, वह मुख्य तौर पर समलैंगिकता को लेकर सामाजिक धारणाओं (स्वीकृति या अस्वीकृति) पर केंद्रित है. क़ानून पर (आपराधिक या ग़ैर-आपराधिक) आधारित नहीं है. इससे मीडिया के खोखलेपन भी उजागर होता है. टाइम्स नाऊ के अरनब गोस्वामी भी इस मामले को भारत में समलैंगिकता को स्वीकृति देने वाला फैसला समझने की गलती कर और 21 वीं सदी की जरूरत बता इसे ऐतिहासिक साबित करने पर तुले हैं. इस बहस में शामिल हुए अधिकतर लोगों को तो इसकी जानकारी ही नहीं है कि असल में ये मामला क्या है. यह कहने की ज़रूरत ही नहीं कि अधिकतर विचार तो अधकचरी सूचनाओं या विकृत सूचनाओं पर आधारित हैं.

सबसे पहले यह जानते हैं कि आईपीसी की धारा 377 में क्या है. इसकी भाषा असल में कुछ इस तरह की है- अप्राकृतिक अपराधः- जिसने भी अपनी मर्ज़ी से प्राकृतिक व्यवस्था के विपरीत किसी आदमी, औरत या जानवर के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उसे उम्रक़ैद की सज़ा दी जाएगी, या दस वर्षों तक की क़ैद दी जाएगी और ज़ुर्माना भी लगाया जाएगा. (व्याख्याः- इस धारा में बताए अपराध के लिए शारीरिक संबंध बनाने का मतलब यौनांग के प्रवेश से है.)

इसी धारा के विरोध में 2001 में नाज़ फाउंडेशन नाम एक एनजीओ ने मामला दायर किया. नाज़ फाउंडेशन ने दलील दी कि एड्स को रोकने के उनके प्रयासों को धारा 377 की वजह से नुक़सान पहुंच रहा है. तर्क यह दिया कि समलैंगिक मर्द हाई रिस्क ग्रुप में आते हैं. चुंकि धारा 377 उन्हें अपराधी बना देता इसलिए वो अपनी पहचान जाहिर नहीं करते इसी वजह से उनको स्वास्थ्य-सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता. 2001 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को अकादमिक बता कर सुनने से ही इंकार कर दिया था. मतलब यह कि पूरा मामला एड्स के इलाज में आने वाली दिक्कत को दूर करने की है.

समझने वाली बात यह है कि धारा 377 बहुत ही कारगर साबित हुई. क़रीब 130 वर्षों से इस क़ानून ने देश से समलैंगिकता के दुष्परिणामों को दूर रखा है. यह माना जाता है कि समलैंगिकों की प्रवृत्ति सामूहिक सेक्स और कई पार्टनर के साथ यौन संबंध बनाने की होती है और इस तरह के संबंध तो शारीरिक स्तर पर भी शिकार को नुक़सान पहुंचाते हैं. धारा 377 के ख़त्म होने से समलैंगिक पुरुष अब सामने आएंगे और पहले की तुलना में अब उन्हें नए पार्टनर आसानी से मिलेंगे. इससे एड्‌स के ज़्यादा तेज़ी से फैलने का ख़तरा बढ़ जाएगा. इसलिए नाज फाउंडेशन की दलील एक तरह से कुतर्क है.

ये लोग मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस हाईकोर्ट में भेज दिया. इसके पांच साल बाद नाको (नेशनल एड्‌स कंट्रोल आर्गनाइजेशन) ने स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर 17 जुलाई 2006 को एक जवाबी हलफनामा दायर किया. नाको ने मुख्य तौर पर उन रणनीतियों की बात की, जो एड्स रोकने के लिए उसने बनाई थी. इसमें एमएसएम (मर्द के साथ मर्द का सेक्स) ग्रुप में हस्तक्षेप की रणनीति भी थी, जो नाको के मुताबिक अधिक ख़तरे वाले समूह में से एक है. नाको ने अपने आंकड़ों के ज़रिए यह बताया कि एमएसएम में एचआईवी का ख़तरा आठ फीसदी तक है, जबकि सामान्य जनसंख्या में यह महज़ एक फीसदी है. इस तरह नाको के मुताबिक धारा 377 इस आबादी में एड्स को रोकने की राह में रोड़ा साबित हो रही है. यानी, नाको की दलील ने याचिकाकर्ता का समर्थन किया.

लेकिन, जैक (ज्वाइंट एक्शन काउंसिल, कन्नूर) ने एमएसएम समूह में एड्‌स का ख़तरा होने के नाको के आंकड़ों को चुनौती दी, क्योंकि नाको ने उन्हीं एनजीओ की रिपोर्ट को आधार बनाया जिन्हें एचआईवी रोकने का काम दिया गया है. ये एनजीओ एड्स के खतरे को बढ़ा चढ़ा कर पेश करती ताकि उनके फंड में कभी कोई कमी न हो. इसमें उनके स्वार्थ निहित हैं, इसलिए आंकड़ों में घालमेल करने की आशंका रहती है. दूसरी बात, ये आंकड़े 2006 में जुटाए गए थे, याचिकाकर्ता के कोर्ट में जाने के पांच वर्षों बाद. इसका मतलब यह है कि जिस समय नाज़ फाउंडेशन ने यह दलील दी थी, तब तक ऐसी कोई स्टडी या रिसर्च नहीं था जिससे साबित किया जा सके कि एमएसएम सचमुच एक हाई रिस्क ग्रुप है. इस तरह इनकी चोरी पकड़ी गई.

समलैंगिकों के अधिकार के लिए लड़ने का स्वांग रचने वाले ये फाइव स्टार एनजीओ एक्टिवस्ट्स की दलील बहुत बेतुकी है. लेकिन, मीडिया में इनकी पैठ एसी है कि असल मुद्दे पर बहस ही नहीं होता है. मजेदार बात ये है कि देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और अवार्ड वापसी गैंग व उनके समर्थक इनके साथ खड़े हैं. एक कानूनी लड़ाई को सामाजिक क्रांति साबित करने पर तुले हैं. कानून की नजर में इस मामले में ज्यादा दम नहीं है. पहली बात यह है कि याचिकाकर्ता स्वयं भुक्तभोगी नहीं है इसलिए याचिका कमजोर हो जाती है. कोई दूसरा नुक़सान उठा सकता है, यह वजह याचिका दायर करने की नहीं हो सकती है. रज़ामंदी का मामला भी अप्रासंगिक है. यह एक स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी ग़ैरक़ानूनी अधिकार इस वजह से क़ानूनी नहीं हो जाता, क्योंकि दोषी या शिकार आदमी की इसमें सहमति है.

निजता का अधिकार भले ही अविवादित है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के लहजे से सार्वजनिक अधिकारी को हस्तक्षेप का भी उतना ही अधिकार है. इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने इस बात का भी कोई सबूत पेश नहीं किया कि धारा 377 एचआईवी को रोकने में बाधक बन रही है. मजेदार बात तो यह है कि दो रज़ामंद वयस्कों के निजी में बनाए यौन-संबंधों को धारा 377 के तहत मामला बनाया गया हो इसका भी कोई सबूत कोर्ट में पेश नहीं किया गया. इसका मतलब यह है कि याचिका कही-सुनी बातों पर आधारित है. इन्ही कारणों की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने नाज फाउंडेशन की याचिका और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया.

मजेदार बात यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद मीडिया में यह प्रचार किया गया कि समलैंगिकता अब ग़ैरकानूनी नहीं है. कुछ महान पत्रकारों ने तो इसे समलैंगिक विवाह को वैधता प्रदान करने वाला फैसला बता दिया. कोर्ट के फैसले को लेकर भी कई भ्रांतियां फैल गई हैं. असलियत यह है कि कोर्ट ने स़िर्फ यह कहा कि निजी तौर पर अगर दो वयस्क की रज़ामंदी से सेक्स करते हैं तो वह अपराध नहीं है. लेकिन कोर्ट ने गे मैरिज की छूट नहीं दी है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला एक अंतरिम आदेश था और स़िर्फ दिल्ली में लागू होना था.

इस फैसले से एक अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई कि बिना शादी किए दो पुरुष आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बना सकते हैं, लेकिन अगर यही काम कोई मर्द किसी औरत के साथ करना चाहे तो उसे अवैध करार दिया जाएगा. इसमें कोई शक़ नहीं है कि इस क़ानून के ख़त्म होते ही पुरुष वेश्यावृत्ति को खुली छूट मिल जाएगी. उन ताक़तों को मौका मिल जाएगा जो पूरी दुनिया में सेक्स का बाज़ार चलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट अगर नाज फाउंडेशन के पक्ष में फैसला करती है तो यह स्थिति फिर से पैदा हो जाएगी.

यह बात भी सही है कि केवल संसद ही नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था, भद्रता वग़ैरह को ध्यान में रखकर क़ानून में बना सकती है या बदलाव कर सकती है. देखना तो यह है कि घारा 377 पर सरकार कोर्ट में क्या कहती है. एड्स रोकने के नाम पर धारा 377 के विरोध में चलाया जा रहा आंदोलन और कुछ नहीं, बल्कि सेक्स को संस्थागत बनाने और देश में एक ताक़तवर सेक्स इंडस्ट्री स्थापित करने का उपाय है. जहां तक मेरा मानना है तो धारा 377 को खत्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

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