लेखक परिचय

अखिलेश आर्येन्दु

अखिलेश आर्येन्दु

वरिष्‍ठ पत्रकार, टिप्पणीकार, समाजकर्मी, धर्माचार्य, अनुसंधानक। 11 सौ रचनाएं 200 पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। 25 वर्षों से साहित्य की विविध विधाओं में लेखन, अद्यनत-प्रवक्ता-हिंदी।

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डॉ. स्वामी सत्य प्रकाश के महाप्रयाण 18 जनवरी पर विषेश

अखिलेश आर्येन्दु

आर्य समाज के इतिहास में विज्ञान, धर्म, वेद, समाज और साहित्य को अतुलित ऊंचाई प्रदान करने वालों में स्वामी सत्य प्रकाश का नाम सर्वोपरि है। यह आर्य समाज को ही गौरव प्राप्त है कि एक संन्यासी, वैज्ञानिक, साहित्यकार, दर्शनशास्त्री और विश्‍व प्रसिद्ध वेदज्ञ हुआ। और आर्य समाज को ही यह गौरव प्राप्त है कि पिता और पुत्र दोनों महान दर्शनशास्त्री, धर्मवेत्ता और दार्शनिक हुए।

एक महान पिता के महान बेटे की बात कही तो जाती है लेकिन जिस रूप में होनी चाहिए वैसी नहीं होती है। करोड़ों में कोई जन्म लेता है जो पिता की कीर्ति को आकाश जैसी ऊंचाई देने में सक्षम हो पाता है। उन्हीं महान बेटों में स्वामी सत्य प्रकाश जी थे, जो संन्यास लेने के पहले डॉ. सत्य प्रकाश के नाम से जाने जाते थे। स्वामी जी ऐसे अग्निपुरुष युगधर्मी महामानव थे जिन्होंने जन्मगत जाति-पांत और ऊंचनीच जैसी समाज की कुश्ठ कही जाने वाली बुराइयों को समाप्त करने के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे। गृहस्थ जीवन में रहते हुए उन्होंने गृहस्थाश्रम का एक आदर्श प्रस्तुत किया वहीं पर संन्यास की दीक्षा लेकर एक आदर्श संन्यासी का आदर्श प्रस्तुत किया। वे कपड़ा रंगने की अपेक्षा मन को संन्यासाश्रम के अनुकूल रंगने को अधिक महत्तव देते थे। वैदिक परम्परा में एक सच्चा संन्यासी वह होता है जो ‘कामावसायी’ हो। जिसमें निज के साथ-साथ समाज, धर्म और मानवता का संवाहक हो। महर्शि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में संन्यासियों को पक्षपात रहित, न्यायाचरण, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग, वेदोक्त ईश्‍वर की आज्ञा का पालन, परोपकार और सत्य भाषण करने की बात लिखी है। अर्थात् जिनमें ऐसे लक्षण न पाए जायें वे संन्यासी कहलाने लायक नहीं है। स्वामी सत्य प्रकाश जी संन्यासियों के इन लक्षणों को संन्यास धर्म के पालन के लिए आदर्श मानते थे।

स्वामी सत्य प्रकाश का जन्म 24 अगस्त 1905, जन्माश्टमी के दिन विश्‍व के महान दार्शनिक और साहित्यकार पं. गंगा प्रसाद उपाध्याय के ज्येश्ठ पुत्र के रूप में हुआ। बचपन से ही इन्हें धर्म, साहित्य, दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान और चिन्तन का वातावरण प्राप्त हुआ जिसका असर बालक सत्य प्रकाश पर भी गहरे तक पड़ा। जि मेधा और प्रज्ञा बुद्धि की बात वेदों में वर्णित है स्वामी जी में ये बचपन से ही दिखाई पड़ने लगी थी। जो एक बार सुन लेते थे वह हमेशा के लिए स्मरण हो जाता था। इन्हें विज्ञान, गणित, साहित्य और दर्शन विषय से अत्यन्त लगाव था। इनकी रुचि देखकर पिता ने हिन्दी माध्यम से विज्ञान के शिक्षा दिलाने का प्रबन्ध किया। इसका प्रतिफल यह हुआ कि सत्य प्रकाश जी विज्ञान के अधिकारी विद्वान बन गए, और आगे चलकर देश के एक महान वैज्ञानिक हुए।

इलाहाबाद के सांस्कृतिक, शैक्षिक, धार्मिक, राजनीतिक और साहित्यिक वातावरण का असर जिस पर पड़ जाता है वह कभी न कभी किसी एक या अनेक क्षेत्रों में दक्षता प्राप्त ही कर लेता है। इसके प्रमाण के रूप में उपाध्याय जी का परिवार ही नहीं बल्कि हजारों की संख्या में है। विद्यार्थी जीवन में ही कुशाग्र बुद्विचेता सत्य प्रकाश की कई पुस्तकें विज्ञान, अध्यात्म, साहित्य और गणित विशय की प्रकाशित हो चुकी थीं। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में उच्च शिक्षा- डी.फिल की उपाधि प्राप्त कर सत्य प्रकाश जी इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में ही रसायन विभाग में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुए। इनकी लिखीं अनेक पुस्तकें अनेक विश्‍व विद्यालयों में पढ़ाई जाती थी। यह कोई एक विशय पर नहीं थीं बल्कि अनेक विषयों की थी।

अपनी योग्यता के बलपर जहां देश के विज्ञान के जाने-माने प्रोफेसर के रूप में प्रसिद्ध हुए वहीं रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष जैसे प्रतिष्‍ठा वाला पद प्राप्त किया। प्रोफेसर रहते हुए ही 30 से अधिक पुस्तकों के लेखक बन चुके थे। देश ही नहीं विदेशों में भी इनकी पुस्तकें चर्चित हो चुकी थीं। स्वामी जी तब डॉ. सत्य प्रकाश, महज एक वैज्ञानिक, साहित्यकार, दर्शनशास्त्री, तर्कशास्त्री, भाशाविद् और शिक्षाशास्त्री ही नहीं थे बल्कि स्वाधीनता संग्राम में जेल भी गए। इलाहाबाद की नैनी जेल में लाल बहादुर शास्त्री, बाबू पुरुषोत्तम दास टण्डन और फिरोज गांधी के साथ रहे। इसी प्रकार हिन्दी को राष्‍ट्रभाषा के गरिमामय स्थान दिलाने के लिए हिन्दी आन्दोलन में भी भाग लिया और सरकार द्वारा अंग्रेजी थोपने की मंशा का विरोध किया।

एक प्रखर वेदवादी और अध्यात्मवादी परिवार के होने के कारण शिक्षक पद से अवकाश लेने के बाद गृहस्थाश्रम को परित्याग करके डॉ. सत्य प्रकाश जी ने 1971 में संन्यासाश्रम में पदार्पण किया। संन्यासी बनने का इनका उद्देष्य केवल कपड़ा बदलकर संन्यासी कहलाना नहीं था बल्कि मानवता, मानव धर्म, वेद, विज्ञान, साहित्य, संस्कृति और समाज के गिरते स्तर को सुधारना भी था। विज्ञान परिषद की स्थापना कर विज्ञान को हिन्दी माध्यम के द्वारा सर्वसाधारण तक पहुंचाने का ऐतिहासिक कार्य किया।

संन्यासी बनने के बाद तो इनके जीवन का रंग ही बदल गया। वेदों में ‘ऋषि’ के रूप में मन्त्रों के साक्षात्कर्ताओं का जैसा वर्णन किया गया है वैसी ही जीवन संन्यासी बनने के बाद स्वामी सत्य प्रकाश की भी थी। संन्यासी होने के पहले स्वामी जी वेद-वेदांगों और विज्ञान तथा वेदों पर अनेक चर्चित पुस्तकें लिख चुके थे। संन्यासी होने के उपरान्त इन्होंने जो सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कार्य किया, वह चारों वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद है। इनकी चर्चित पुस्तकों में वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा, प्राचीन भारत में रसायन का विकास, फाउण्डर्स ऑफ साइसेंज इनएंशिएण्ट इण्डिया, प्राचीन भारत के वैज्ञानिक कर्णधार, भारत की सम्पदा और थ्री हैजर्ड्स ऑफ लाइफ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त महर्षि दयानन्द के दर्शन पर आधारित पुस्तक’ द क्रिटिकल स्टडी ऑफ द फिलासफी ऑफ दयानन्द, दयानन्द-ए फिलासफर, दि आर्य समाज, मैन ऐण्ड हिज डिवाइन लव के अलावा ऐसी अनेक पुस्तकें लिखीं, जो धर्म, समाज, विज्ञान, भाशा और दूसरे विशयों पर आधारित हैं।

स्वामी जी का सानिध्य प्राप्त कर देश के ही नहीं विदेशों के भी अनेक रिसर्च स्कालरों ने वेद, उपनिषद, भारतीय संस्कृति, भाषा, पर्यावरण और अन्य अनेक विषयों को अपने शोध का विशय बनाया। अनेक धर्म, अध्यात्म और साहित्य जिज्ञासु के धर्म, अध्यात्म और भाषा की गूढ़ताओं को समझने के लिए आगे आए। चारों वेदों का अंग्रेजी में अनुवाद से वेदों को विश्‍व स्तर पर समझने की धारा को गति मिल सकी। इसी प्रकार विज्ञान और धर्म या विज्ञान और अध्यात्म की पूरकता को समझाने की जो षैली स्वामी जी ने अपनाई, उससे धर्म और विज्ञान को विरोधी मानने वाले लोगों को नई दिशा मिली। यज्ञ हवन को दकियानूसी मानने वालों को भी स्वामी जी ने अपने शोध और तर्कों से समझाकर उसे विज्ञान और समाज के लिए बेहतर सिद्ध किया। अध्यात्म और विज्ञान की पूरकता बताते हुए उन्होंने कहा था-‘विज्ञान के पास शक्ति है, उसके पास हृदय भी होना चाहिए। इसके लिए विज्ञान को अध्यात्म में लगाना होगा। इसी प्रकार वेद के बारे में उनके स्पश्ट विचार थे। उन्होंने तेरा-मेरा का अलगाव समाप्त करते हुए एक बार अपने उद्बोधन में कहा था-‘मैं तो पश्चिमी लोगों से कहा करता हूं कि वेद जितना मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी। क्योंकि इनके द्रष्‍टा(तुम्हारी दृष्टि में रचयिता)

मेरे और तुम्हारे दोनों के पूर्वज थे। तब कोई धर्म था ही नहीं। सारा विभाजन वेदों के बाद का है। ”

स्वामी जी केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी जाकर वेद, विज्ञान, भारतीय विज्ञानिकों, भारतीय दर्शन, भारतीय साहित्य, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म और आर्य समाज का प्रचार-प्रसार किया। 20 से अधिक देशों में जाकर अनेक वेद, विज्ञान और दर्शन पर आयोजित सम्मेलनों में भाषण देकर भारतीय संस्कृति, वेद, धर्म और अध्यात्म के सही रूप को प्रस्तुत किया। इसके कारण विदेशों में भी स्वामी जी के अनेक ‘फालोअर’ बन गए।

समाजिक सुधारों और देश के विकास में भी स्वामी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

समाज में प्रचलित जन्मगत भेदभाव, छुआछूत, जाति-पांत, अन्धविश्‍वास और पाखण्डों को दूर करने के लिए वे हमेशा तत्पर रहते थे।

एक सदगृहस्थ का आदर्श जीवन जैसा होना चाहिए वैसा ही उनका गृहस्थाश्रम था। एक सच्चे अर्थों में वीतराग संन्यासी कैसा होना चाहिए वैसे ही वे तपस्वी और वैरागी थे। एक वैज्ञानिक, दार्शनिक और साहित्यकार का सादा जीवन उच्च विचार वाला कैसा होना चाहिए, उसके वे प्रतीक ही थे। वेदधर्मी और विज्ञानधर्मी की महानता उनमें थी तो वे महान शिक्षाविद् और धर्मवेत्ता के रूप में समाज के लिए एक आदर्श थे। हजारों हजार लोगों को राह दिखाने वाले और हजारों विद्वानों को सही दिशा देने का जो कार्य स्वामी जी ने किया उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। जीवनभर विज्ञान, अध्यात्म, दर्शन, भाशा, वेद और शास्त्रों की नई धारा देने वाले स्वामी सत्य प्रकाश ने अपने 90 वर्श के जीवन में इतना किया जिसका मूल्यांकन सहज नहीं है। संन्यासी का धर्म जो वैदिक परम्परा में बताया गया है उसे जिंदगीभर निभाते रहे। यहां तक कि अपने खासमखास के किसी मरण या उत्सव में वे शामिल नहीं होते थे। बीमारी की हालात में भी बहुत कहने पर भी न तो परिवार और न तो शुभेच्छुओं की सेवा स्वीकार की। बहुत कहने पर अपने परम शिष्‍य पं. दीना नाथ की सेवा लेनी स्वीकार की। मानवता और धर्म तथा अध्यात्म के इस अग्निपुरुष ने 18 जनवरी 1995 को अंतिम सांस लीं। इस प्रकार विज्ञान, अध्यात्म, साहित्य, दर्शन और समाज की सेवा करने वाला यह महामानव का तिरोधान, आर्य जगत् के लिए ही नहीं बल्कि विज्ञान, धर्म, अध्यात्म और दर्शन की धारा की अपूर्णीय क्षति हुई। आने वाली पीढ़ी, स्वामी सत्य प्रकाश की विज्ञान और मानवता की महान सेवा को स्मरणकर प्रेरणा ग्रहण करती रहेगी।

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1 Comment on "स्वामी सत्य प्रकाश : विज्ञान, धर्म और अध्यात्म के युगधर्मी संवाहक"

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sunil patel
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बहुत अछि जानकारी स्वामी सत्य प्रकाश जे के बारे मैं. धन्यवाद अखिलेश जी.

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