लेखक परिचय

चंडीदत्त शुक्‍ल

चंडीदत्त शुक्‍ल

यूपी के गोंडा ज़िले में जन्म। दिल्ली में निवास। लखनऊ और जालंधर में पंच परमेश्वर और अमर उजाला जैसे अखबारों व मैगजीन में नौकरी-चाकरी, दूरदर्शन-रेडियो और मंच पर तरह-तरह का काम करने के बाद दैनिक जागरण, नोएडा में चीफ सब एडिटर रहे। फोकस टीवी के हिंदी आउटपुट पर प्रोड्यूसर / एडिटर स्क्रिप्ट की ज़िम्मेदारी संभाली। दूरदर्शन-नेशनल के साप्ताहिक कार्यक्रम कला परिक्रमा के लिए लंबे अरसे तक लिखा। संप्रति : वरिष्ठ समाचार संपादक, स्वाभिमान टाइम्स, नई दिल्ली।

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चण्डीदत्त शुक्ल

मधुमिता शुक्ला, कविता चौधरी, शशि और ऐसे ही ना जाने कितने नाम। यूपी की सियासत को बहुत-से सेक्स स्कैंडल दागदार कर चुके हैं। ऐसा ही एक मामला था शीतल बिरला और बुलंदशहर के डिबाई विधायक श्रीभगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित का। कासगां की रहने वाली शीतल ने बसपा विधायक पर आरोप लगाया कि गुड्डू ने पहले उनका शोषण किया और अब जान से मार देना चाहते हैं। इसके उलट, गुड्डू ने इसे सियासी प्रपंच-षड्यंत्र करार दिया था। आगरा कॉलज की रिसर्च स्टूडेंट शीतल का आरोप था कि वो तो नेताजी से प्रेम करती थी, लेकिन वह उसे कीप की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, जो उसे स्वीकार नहीं है। यह विवाद इतना बढ़ा कि शीतल कई दिन तक गायब रही और बाद में उसने बताया कि विधायक के गुंडों से बचने के लिए वह फ़रार थी। यह मसला ज्यादा तो नहीं बढ़ा, लेकिन एक समय में खूब गरमाता रहा।

• ऐसी ही एक घटना में महाराजगंज के सपा विधायक श्रीपत आजाद को जेल तक जाना पड़ा था। उन पर एक महिला को ज़िंदा जला देने का आरोप लगा था। श्रीपत कई दिन तक फरार हे, लेकिन सियासी दबाव के बाद उन्हें सरेंडर करना पड़ा। आजाद पर आरोप था कि उन्होंने सावित्री देवी नाम की महिला के घर जाकर उस पर कैरोसीन डालकर आग लगा दी थी। 90 फीसदी जलने के बाद सावित्री को अस्पताल में दाखिल कराया गया था, जहां बाद में उसकी मौत हो गई।

ऐसे अनगिनत किस्से हैं। सेक्स और सियासत की काली-कथा अनंत है। यह वो काजल की कोठरी है, जहां कैसो ही सयानो जाय, उसके दामन पर दाग लगते ही हैं। प्रेम, छल व यौन संबंधों के ये किस्से काल्पनिक नहीं हैं, ना एक-दो दिन में तैयार हुए हैं। ऐसा भी नहीं कि ऐसा कालापन किसी एक वज़ह से पैदा हुआ है।

किसी ज़माने में दुश्मन देशों के राज़ जानने के लिए स्त्रियों को विषकन्या के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। ऐसी महिलाएं देह से लेकर छल-कपट के सारे समीकरण अपनाती थीं। जिन महिलाओं का नेताओं से शारीरिक संबंध रखने के कारण कत्ल हुआ, उनमें से भी बहुतेरी ऐसी हैं, जिन्हें विरोधियों ने प्रतिद्वंद्वी को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया। यही नहीं, इस क्रम में ये स्त्रियां राजनीतिक शीर्ष तक पहुंचने और खुद सत्ता पर काबिज होने की लालसा से भी घिरी हैं।

शशि और मधुमिता शुक्ला की हत्याओं के पीछे क्या कारण थे, यह तो पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन बिहार के विधायक सरोज और सुल्तानपुर के अनूप संडा के उनकी तथाकथित प्रेमिका से विरोध की गाथाएं बताती हैं कि नेताजी के करीब रहने के बाद कई महिलाएं ये ज़रूर चाहने लगी होंगी कि वो भी सत्ता के केंद्र में रहें।

कई राजनेता अपने प्रेम-यौन संबंधों के चलते कु-चर्चा में रहे हैं। चर्चित पोर्टल नेटवर्क-6 के मॉडरेटर आवेश तिवारी साफ करते हैं—ऐसे मामले सिर्फ नेताओं की कुत्सित इच्छाओं के चलते नहीं होते। साफतौर पर वो महिलाएं भी दोषी हैं, जो ऊंचा मुकाम हासिल करने के लिए शॉर्टकट अपनाने से बाज नहीं आतीं। हालांकि जब नेताओं पर बदनामी के छींटे पड़ने लगते हैं, तो वो ऐसी महिलाओं से किनारा करने के लिए कुछ भी कर गुजरने से नहीं चूकते।

मनोविज्ञानी चंदन झा की मानें, तो जनता के हाहाकार करते रहने से कुछ नहीं होने वाला। सेक्स और सियासत के कॉकटेल को निष्फल तभी किया जा सकता है, जब दागदार नेताओं को चुनावों में पूरी तरह असफल कर दिया जाए। खैर, तर्क-वितर्क हज़ार हैं और सियासत में कीचड़ भी खूब ज्यादा, लेकिन इस बात से इनकार शायद ही कोई करेगा कि जब तक स्त्री की देह को उपभोग के नज़रिए से देखने की सोच कायम रहेगी, उनसे जुड़े विवाद हर क्षेत्र में नज़र आते रहेंगे, चाहे वह सियासत हो या फिर मीडिया।

युवा विचारक हिमवंत के मुताबिक, सेक्स के प्रलोभन से बचना मुश्किल है, लेकिन जो लोग बड़े उद्देश्यों की ख़ातिर काम करने के लिए विचार-रणभूमि में आए लोगों को संयम तो रखना ही चाहिए। समाजसेवी चंद्रशेखर पति त्रिपाठी साफ़ कहते हैं, सब जानते हैं—भारतीय लोकतंत्र के इन रक्षकों का स्तर कितना गिरा हुआ है। त्रिपाठी व्यंग्य करते हैं, हालांकि ये बात मेरी समझ में नहीं आती है कि इन महिलाओं के प्रेम को कैसे और क्या समझा जाए। हम मधुमिता शुक्ला की मृत्यु के प्रति इतनी भावुकता दिखाते हैं, लेकिन उनके प्रेम में शामिल स्वार्थ से इनकार क्यों कर देते हैं? क्या मधुमिता और रूपम को पता नहीं था कि हमारे माननीय विधायकों की सोच का स्तर क्या था? इन महिलाओं के साथ जो कुछ हुआ, वह कहीं से न्यायोचित नहीं है, लेकिन ऐसे संबंधों का अंत भी इसी तरह और ऐसा ही होता है।

राजनीति में सेक्स का घालमेल कितना बुरा और घृणित माना जाता है, इसका अंदाज़ा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि कई क्रांतिकारी और विद्रोही दलों में ऐसे संबंधों, (चाहे वो प्रेम ही क्यों ना हो), को पूरी तरह बैन कर दिया गया है। बिहार में भाकपा माओवादी के दर्जनों नेताओं को पुलिस ने महज इसलिए आसानी से धर-दबोचा, क्योंकि वो प्रेम संबंधों में तल्लीन होने के चलते अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो गए थे। अपने कैडर वर्करों की तथाकथित मोहब्बत से परेशान भाकपा माओवादी के नेताओं ने सर्कुलर जारी कर ताकीद की कि विवाहेतर संबंधों से बचा जाए। संगठन ने अपने अखबार लाल चिनगारी के एक इश्यू में भी ऐसे मामलों से दूर रहने के लिए कहा।

…चलिए, देर से ही सही, राजनीति के आंगन में चहलकदमी करने वाली पार्टियों को भी अहसास हो रहा है कि सेक्स से सियासत को दूर ही रखा जाए तो भला…देखने वाली बात ये होगी कि पूंजीवादी राजनीति करने वाले सियासी दल कब ऐसा कदम उठाएंगे और अपने नेताओं को उच्च आदर्शों का पालन करने की हिदायत देंगे।(समाप्‍त)

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