लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

आज टी.आर.पी. यानि टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट सभी टेलीविजन चैनलों के लिए दिल की धड़कन है। हिंदी में इसे आप दर्शक मीटर भी कह सकते हैं। यह वह पैमाना है जिसके द्वारा चैनलों की लोकप्रियता को प्रतिशत में एक निश्चित अवधि के लिए दर्शाया जाता है। चैनलों के अलावा टी.वी सीरियलों से लेकर समाचार कार्यक्रमों की लोकप्रियता को भी इसकी तराजू में तौला जाता है।

वर्तमान संदर्भ में चैनलों की टी.आर.पी. के स्रोत के बारे में जानने की जिज्ञासा एक आम आदमी के मन में उत्पन्न होना सहज है। पड़ताल से स्पष्ट है कि सिर्फ एसएमएस से टी.आर.पी. को नहीं मापा जा सकता है। मूल रुप से इसको मापने का काम करते हैं, मीडिया जगत में काम करने वाली कई मीडिया शोध संस्थान। टाम मीडिया शोध संस्थान का नाम इस क्षेत्र में काम करने वालों में अग्रणी है। ऐसे ही संस्थान बताते हैं कि किस चैनल की टी.आर.पी कितनी है? इसके लिए ये संस्थान बकायदा सर्वे करते और करवाते हैं।

समस्या तब ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब टी.आर.पी. के लिए टेलीविजन चैनल उलजुलूल कार्यक्रम दिखाने लगते हैं। कुछ साल पहले तक समाचार चैनलों की लोकप्रियता बहुत कम थी, क्योंकि ये चैनल समाचार के अलावा अपने दर्शकों के लिए मसाला नहीं परोसते थे। परिणामत: बहुत कम लोग समाचार को देखना पंसद करते थे।

टी.आर.पी के नाम पर या अपने दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए जब से समाचार चैनलों ने समाचार के नाम पर सनसनी, काल-कपाल-महाकाल, हँसोगे तो फँसोगे जैसे कार्यक्रमों को प्रसारित करना शुरु किया है, उनकी लोकप्रियता में जबर्दस्त इजाफा हुआ है।

कुछ टेलीविजन चैनल मसलन इंडिया टी,वी और आजतक तो आजकल बेसिर पैर के कार्यक्रम दिखा रहे हैं। अंधविश्वास और झूठी खबरों का प्रसारण धड़ल्ले से हो रहा है। खबरों की सत्यता को जाँचने वाला कोई भी नहीं है और न ही रिर्पोटर और चैनल के मालिकों की जबावदेही तय करने वाला। इसके बावजूद भी इस तरह के चैनलों को पुरस्कारों से नवाजा जाता है।

टी.आर.पी का महत्व टेलीविजन चैनलों के लिए इसलिए ज्यादा है, क्योंकि टी.आर.पी. और विज्ञापन के बीच में चोली-दामन का रिश्ता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस चैनल की टी.आर.पी. अधिक होगी, उसे विज्ञापन भी उतना ही ज्यादा मिलेगा। यही कारण है कि बदले हालात में सभी टी. वी चैनल टी.आर.पी. बढ़ाने के पीछे पागल हैं। दरअसल टी.आर.पी. के बढ़ने से ही उनका अस्तित्व बचा रह सकता है।

पूर्व में टी.आर.पी. टेलीविजन चैनलों के लिए या मीडिया इंडस्ट्री में एक आंतरिक प्रक्रिया होती थी। तब विवाद का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। जैसे ही टी.आर.पी. का रिश्ता पैसों से जुड़ गया, ठीक वैसे ही इसके साथ कई तरह के विवाद भी हमारे समक्ष उभरकर आये।

यहाँ विवाद का मूल कारण है टी.आर.पी. की विश्वसनीयता। अक्सर गलत टी.आर.पी रेटिंग के कारण अपात्र चैनल या कार्यक्रम को पुरस्कार मिल जाता है। बात इतने पर खत्म नहीं होती है, उस चैनल को ईनाम के तौर पर ढेर सारा विज्ञापन भी मिलता है।

अब हर तरफ से यह आवाज आ रही है कि एक दशक से स्थापित और लोकप्रिय टैम मीडिया शोध संस्थान द्वारा संचालित पैटर्न के तहत किए जा रहे सर्वे से टेलीविजन दर्शकों की संख्या को ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता है, क्योंकि भारत एक विविधतापूर्ण और अजूबों से भरा हुआ देश है। यही दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ हर बारह कोस पर बोली और पानी दोनों बदल जाता है। ऐसे देश में कोई भी संस्था एक खास कार्यक्रम को देखने वाले दर्शकों की संख्या के बारे में या उसके प्रतिशत को सही तरीके से कैसे बता सकता है? हो सकता है इस तर्क को कुछ लोग टी.आर.पी रहित चैनल की कारस्तानी मान सकते हैं, पर ऐसा हकीकत में नहीं है। अगर कोई इस सच को नहीं स्वीकार करना चाहता है तो यह कदम महज शुतुरमुर्ग की तरह बालू में अपना सिर छिपाकर खतरे से बचने की अनुभूति से लबरेज रहने के समान होगा।

जो भी हो इन विवादों से परे टाम मीडिया संस्थान लगातार अपने दर्शक मीटरों को बढ़ा रही है। इस तरह की दुकानों को विज्ञापन ऐजेंसी का भी सहयोग प्राप्त है। इसके अलावा मीडिया उत्पादों के सौदागरों को भी इसकी आवश्यकता है। सभी को अपनी दुकान चलानी है और सभी के फायदे एक-दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं।

इसके बावजूद भी ऐसे शोध संस्थान दूरवर्ती इलाकों में अपने दर्शक मीटर के लिए आधारभूत संररचना नहीं बनाना चाहते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि दूर-दराज के गाँवों के अलावा नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, अंडमान-निकोबर, जम्मू- कश्मीर जैसी जगहों पर उनके ग्राहकों का कोई विशेष फायदा नहीं होना है। इसके पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि उनके लिए यह पूरी कवायद केवल व्यवसायिक है। ज्ञानार्जन या समाज सेवा के के लिए ऐसी निजी संस्थाएं कोई काम नहीं करती हैं।

ऐसा नहीं है कि मीडिया, विज्ञापन ऐजेंसियों और शोध संस्थानों की हरकतों से सरकार बेखबर थी या है। विवादास्पद स्थिति की लगातार पुनरावृति से बचने के लिए सरकार ने कुछ साल पहले एक कमेटी का गठन किया था, जोकि टी.आर.पी के निर्धारण के तौर-तरीकों पर अपनी कड़ी नजर रखता था। उसके बाद इनपर नियंत्रण रखने के लिए एक संयुक्त समिति काम करती थी, जो खास करके टाम की गतिविधियों पर निगाह रखती थी। सन् 2007 में सरकार को लगा कि अब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा तो उसने पूर्व में काम कर रही संयुक्त समिति को भंग करते हुए ब्राडकॉस्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल का गठन किया। उद्देश्य था टी.आर.पी. के खेल में पारदर्शिता लाना, लेकिन यह समिति भी अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में पूरी तरीके से विफल रही।

आज टी.आर.पी. एक मजाक बनकर रह गया है। उद्देश्य और भूमिका दोनों इसके सही हैं, किंतु विज्ञापन के लालच, उघोगपतियों द्वारा रचे गये षडयंत्र और रिसर्च संस्थानों द्वारा निर्मित मायाजाल में उलझकर यह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।

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