मृदु-मंगल उपहार हो

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डा.राज सक्सेना मधुमय-मधुर कमल पांखों का, परिपूरित आगार हो | संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो | कज्जलकूट केश, कोमलतम्, गहन-बरौनी, अविरलभंगिम | मृगछौने सम, नयन सलोने, नहीं ठहरते, चंचल अग्रिम | तीव्र नासिका, अधर अछूते,  अमृत-मयी   बहार हो | संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो… Read more »