तुम, मेरी देवी-विजय निकोर

Posted On by & filed under कविता

भोर की अप्रतिम ओस में धुली निर्मल, निष्पाप प्रभात की हँसी-सी खिलखिला उठती, कभी दुपहर की उष्मा ओढ़े फिर पीली शाम-सी सरकती तुम्हारी याद रात के अन्धेरे में घुल जाती है । निद्राविहीन पहरों का प्रतिसारण करती अपने सारे रंग मुझमें निचोड़ जाती है, और एक और भोर के आते ही कुंकुम किरणों का घूँघट… Read more »