मैं बुंदेलखंड बोल रहा हूँ

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रवि उपाध्याय/अतुल मोहन सिंह “बेदम, बदनसीब, बीहड़ और अब बंजर में तब्दील हो चके बुंदेलखंड की यही किस्मत है. न जाते कितने ही बाग़ी और रहनुमाओं को ख़त्म होते देख चुके बुन्देली माटी के बाशिंदे अब उपेक्षा का स्यापा नहीं करते बल्कि अपने हालात को नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं कभी अतिवृष्टि कभी ओलावृष्टि… Read more »