मैं सच कहूं अगर तो तरफदार मत कहो – पंकज झा

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जुलाई 2004 की उनींदी सुबह। पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त एक युवक प्रदेश के एक राजनीतिक मीडिया में काम करने का नियुक्ति पत्र लिये रायपुर स्टेशन पर उतरा। साथ में एक झोला लिए, एक ऐसा झोला जिसमें निम्न मध्य वर्गीय परिवार के सपने बंद थे और थे दो जोड़ी कपड़े तथा अपने लिखे और प्रकाशित कुछ आलेख। अपने… Read more »